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कोन ह कोन ला चलावात हे

19-Jul-2024
ददा _दाई कहिथे घर ला में चलावत हो।
बेटा _बहू कहिथे घर ला में चलावत हो।।
आप सबो मनखे मन जानत हो संगी हो।
आज हमर घर ला सरकार हा चलवात हे।।

जनम ले मरन तक योजना उही बनावत हे।
पूरा करे बर गाँव मन मा तिहार मनावत हे।।
कोनो कहीं छुटगे त ओखर बर तंत्र लगा के।
शमशान घाट मा घलो खोजे बर जावत हे।

क्रिकेट,सिनेमा,सरकार सब ला भरमावत हे।
काम कम विज्ञापन ला जादा बतावत हे।।
आज कोनो ला समझ नइ आवत हे भाई।
जनता या सरकार कोन देश चलावत हे।।

राजनीति सबके धंधा बनत जावत हे।
दल बदलू मन सत्ता के सुख पावत हे।।
स्कूल कालेज नशा पानी के अड्डा बनगे।
धरती महतारी रो _रो के गोहरावत हे।।

                         तुलेश्वर कुमार सेन
                          सलोनी राजनांदगांव

सुनो भाई उधो, अरे तोला का भइगे..?

16-Jul-2024
  ( शोर संदेश )  परमानंद वर्मा स़ोचिये, सब  कहीं कानून व्यवस्था, मर्यादा व परम्पराओं को तोडना शुरू कर दें, न माने तब संसार व सृष्टि का क्या होगा। बरसात ठेंगा दिखा रहा है, धरती सूखी पडी है, कंठ प्यासे हैं। सबकी निगाहें आसमान की ओर है। इसी संदर्भ में पेश हे यह छत्तीसगढी आलेख....।

देखत हौं, एकर चाल ला? अभी हकन  देहूं, ठठा देहूं तब जउन ए इतरावत हे ना तउन सब घुसड़ जाही। जान दौ... जान दौ काहत हौं तब एकर मतलब ए तो नइ होवय के मुड़ी चढ़के मूतय, छानही मं होरा भुंजय?
गुड़ी चंवरा मं बइठ के भकाड़ू पइरा डोरी बरत रहिथे तब नंदू ढेरा चलावत पटवा डोरी बनावत रहिथे ततके बेर महावीर भइया बजार कोती ले आवत रिहिसे तउन हा दूनो झन ल साहेब बंदगी, सत कबीर काहत जय जोहार करथे। 
भकाड़ू पूछथे- कते डहर ले आवत हस साहेब, गजब दिन मं दीखत हस? तब ओहर बताथे- काला बताबे भइया, अरे अमलेसर मं गुरु साहेब के सत्संग चलत रिहिसे उहिचे गे रेहेंव। परन दिन आय हौं, चलव धान बोनी, खेती किसानी के दिन आगे हे, अब भिड़े जाय। 
अब देख न साहेब, ये बादर हा तो आंखी-कान ल निच्चट मूंद दे हे गा, एको बूंद तो भला टपकतिस? भकाड़ू के बात ल सुनके महावीर कहिथे- टपकही कहां ले, रुख-राई, नदिया-नरवां, जंगल, पहाड़ के तो सतियानास करत हौ। प्रकृति दाई के आंसू ल जाके तो भला देखव, रो-रो के बारा हाल होगे हे। ओकर लोग लइका, शेर-भालू, चीता, हिरण, हाथी, कोलिहा, हुड़रा, बेंदरा अउ चिरई-चिरगुन के बसेरा उजारत हौ, उजार दे हौ। ओमन कहां रइही, कहां जांही, का खाही, का पिही, हे कहूं कोनो मेर ओकर मन के ठिकाना। 
साहेब तोर बात हे तो सोला आना सही, फेर सरकार ला विकास करे खातिर काम तो कुछ करे ले परही ना। भकाड़ू बताथे- जंगल मं ही तो सबो खनिज संसाधन भरे परे हे, खदान के तो दोहन करे ले परही ना?
ककरो घर ल उजार के, बरबाद करके देस-परदेस के विकास करई कोनो विकास नोहे भकाड़ू। तोर संग कहूं अइसने भला हो जही तब तोला कइसे लगही? 
भयरा ठेठवार घला अतके बेर आ जथे अउ ओकर मन के बीच मं जउन गोठ-बात चलत रिहिस तउन ल कान टेढ़ के सुने ले धर लिस।  मुड़ी मं बड़ेक जनिक पागा बांधे राहय तउन ल खोल देथे अउ पूछथे- का गोठियावत हौ जी तुमन। 
नंदू के ढेरा घला घूमना बंद होगे रिहिसे। भैरा ठेठवार उही ल पूछथे- कस रे नंदू, का-का गोठियावत हौ?
भैरा के बात ल सुनके भकाड़ू थोकन तमके असन कहिथे- ये निपोर भैरा गतर के हा, कांही ल सुन पाही न समझ पाही अउ काहत हे का-का गोठियावत हौ?
नंदू हा ओला महावीर साहेब जउन रुख-राई, नदिया-नरवा, तरिया, कुआं, जंगल, पहाड़ के विनाश के बात सुनाथे तब ओहर कहिथे- बने बात तो काहत हे महावीर साहेब हा। अरे जब पेड़-पौधा नइ रइही, जंगल-पहाड़, नदिया नइ रइही, कुंआ बवली नइ रइही तब जंगली जानवर, पशु-पक्षी ल छोड़ मनखे के बारा हाल हो जही। भाड़ मं जाय तुंहर सरकार के विकास के काम, जनता के जीवन ल पहिली देखव।
महावीर साहेब कहिथे- देख, एको अक्षर नइ पढ़े-गुने हे, गाय-भइस चराथे तेन अतेक सब बात ल समझथे अउ तुंहर सब झन के आंखी मुंदागे हे, पथरा परगे हे, गोबर भरगे हे दिमाग मं। कहां ठेंगवा ल बरसही पानी हा?
ओहर कहिथे- चाहे कतको पूजा-पाठ, हवन, जग, गीता-भागवत, सत्संग करा लौ, दाई, बेटी, बहिनी अउ गोसइन के आंखी डहर ले कहूं आंसू झरत रइही तब ओकर परिवार, समाज अउ देश मं सुख-शांति कभू नइ आ सकय। ये प्रकृति कोन हे, इही दाई, बहिनी, बेटी मन तो आय। रुख-राई, जंगल, पहाड़, नदी-नरवा खुलेआम नीलाम होवत हे, ओकर मन के छाती मं बुलडोजर चलत हे। ओकर मन के दुख ल उही मन जानही?
भैरा ठेठवार पूछथे- का काहत हे साहेब हा गा? तब भकाड़ू कंझावत कहिथे- अरे काला का सुनाबे गा, कहिबे आन तब सुनही आन। तभो ले नंदू हा सबो बात ल ओला सुनाथे, समझाथे। 
ठेठवार कहिथे- बने काहत हे साहब हा, धरती मं पाप बढ़गे हे, पेड़ के जउने डारा मं बइठे हौ अउ ओकरे ऊपर टंगिया चलाहौ तब मरिहौ ते बाचिहौ? जा उही पाके पानी नइ गिरत हे तुंहर परदेस मं। आन कोती देख कइसन बरसत हे चारों मुड़ा पानी-पानी। बांधा फूटत हे, पुल-पुलिया टूटत हे, घर-दुआर बोहावत हे अउ छत्तीसगढ़ ल देख बादल हा मुंह अइठ ले हे। जइसन करनी तइसन भरनी। कतको चिल्लावौ, गोहार पारौ, अरे तोला का भइगे... फेर ओकर खेल ल उही जानही। 
जाती-बिराती
आगे असाड़ गिरगे पानी
धर ले नांगर धर ले तुतारी
चल रे बइला अररर, त-त-त
चल रे बइला अररर, त-त-त।

सुनो भाई उधो, नाटक जिनगी के...

12-Jul-2024
 परमानंद वर्मा ( शोर संदेश )  लोग किसी का सुख, आगे बढ़ते, खाते-पीते, विकास के नए सोपान गढ़ते नहीं देख सकते, क्योंकि तकलीफ होती है जबकि अपनी मेहनत और पुरुषार्थ से आगे बढ़ते हैं। सुख, आनंद और विकास पर किसी एक व्यक्ति का, वर्ग का एकाधिकार तो नहीं है। लेकिन हां, समाज में ऐसी विद्रुपता, बुराई देखने को मिलती है। बढ़ते हुए व्यक्ति, वर्ग व समाज का ऐसा टांग खींचते हैं, गिरा देते हैं कि एक गिलास पानी के लिए तड़पता रह जाता है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी तथा-कथा...
परछी मं अलदहीन काकी मइरसा मं दही ला बिलोवत रिहिसे। ओ डाहर एक कोती ढेकी मं सुकवारो अउ रामहीन एक बोरा धान ला कूटत राहय। फेकन काकी हा खोवत राहय तब दुकलहीन हा कुटे चाउंर ला छीनत-निमारत राहय। 
फेंकन काकी हा अलदहीन ला पूछथे- कस ओ दीदी, एक-डेढ़ घंटा ले ऊपर होगे, दही ला बिलोवत अभी ले लेवना नइ निकले हे का?
आधा मइरसा ले ऊपर हे फेकन दीदी दही हा, देख ना बिलोवत-बिलोवत थकासी असन लगे ले धर ले हे, तभो ले ये चंडाल लेवना हा निकले के नांव नइ लेवत हे। ओकर बात ल सुनके फेकन हा मजाक करत कहिथे- सिद्धो मं लइका नइ होय रे अलदहीन, बारा कुंआ मं बांस डारबे तब कहूं जाके सिद्ध परथे, हांसत-खेलत लइका ल पाबे?
कहां के बात ल कहां घुमा फिराके कोन कोती ले जाय के अक्कल तो तहीं सीखे हस बहिनी, हमन अइसन लटर-पटर ला नइ जानन। फेकन अउ अलदहीन मं अइसने हास-परिहास चलत रिहिसे ततके बेर सुकवारो आथे अउ बताथे- तोर बहू सतवंतीन हा कलहरत हे। 
दही बिलोवत रिहिसे तउन बुता ल गनेसिया ल देथे अउ कहिथे- मंय देखत हौं का बात हे। बहू के हरू-गरू होय के समे आगे रिहिसे। ओकर कुरिया मं जाके देखथे तब बहू दरद के मारे छटपटावत, कलहरत, चिल्लावत हे- मरगेंव दाई, मरगेंव ददा, मोर परान छटके लेवत हे, बचा ले दाई। 
अलदहीन जानगे, जचकी के बेरा हे। अपन बहू तीर जाथे तब ओकर  हाथ ल कस के पकड़ लिस अउ कहिथे- दाई मोर परान ल बचा ले, नइ बाचौं तइसे लागथे। 
अपन गोसइया शिव परसाद करा अलदहीन हा गांव मं जचकी कराथे तउन दाई केजिया बाई ल बलवाय बर संदेश भेजवाथे। ओहर आथे अउ ओ दे घंटा भर के भीतर सुंदर एक बेटा के जनम के होथे। 
केजिया परछी मं आके सबो झन ल बेटा अवतरे हे कहत बधाई देथे, सबो झन के चेहरा मारे खुशी के फूले नइ समाइस। शिव परसाद केजिया ला सौ रुपिया के नोट निछावर मं देथे। खोर मं एक ठन दनाका फटाका फूटिस तब जानगे, शिव  परसाद  इहां लइका अवतरे हे। 
समे गुजरत का लगथे, थोरको पता नइ चलय। एक दिन ये हांसत-खेलत परिवार ऊपर अइसे पहाड़ टूटगे के गांव के मालगुजार चालाकी करके ओकर जम्मो जायदाद ल तोर बाप हा मोर से करजा ले रिहिसे कइके छीन लिस। रोइस, गिड़गिड़ाइस फेर शिव परसाद के एक नइ सुनिस ओ गौंटिया हा। 
बेघरबार शिव परसाद उही दिन गांव छोड़े के परन कर लिस। शहर आके बनी-भूती करके अपन लोग-लइका के लालन-पालन  करे लगिस। शिव परसाद अउ अलदहीन अब बाजार मं सब्जी बेचे के धंधा करिस। 
बहू के जउन बेटा होय रिहिसे तेन मिस्त्री बनगे अउ घर-मकान बनावत-बनावत, सुंदर जमीन खरीद के खुद के अपन घर बना डरिस। धंधा चल परिस। अब मिस्त्री घला समे बीते के बाद अपन बेटा के बिहाव करथे। साल-दू-साल बाद ओकरो एक झन सपूत बेटा के जन्म होथे। दिन बहुरत समे नइ लागय कहिथे तइसने कस अलदहीन के भाग लहराय ले लग गे, फेर अपन ठेला पेलके बाजार जवई अउ साग-सब्जी बेचना आज ल नइ छोड़े हे। 
भगवान भरपूर भर देहे घर ला, डोकरा होगे हे शिव परसाद धकर-धकर करत हे फेर डोकरी ओला भसेड़त कइसनो करके बाजार ले जथे अउ ओला कहिथे- मरते दम तक हम धंधा ल नइ छोड़न। जेकर परसादे अतेक बढ़े हन, पनके हन, ओला तियागन नहीं, इही हमर मालिक हे, भगवान हे। 
देख तो देख अलदहीन अउ शिव परसाद के भाग ला, ओकर नाती गया परसाद बेंगलोर मेकेनिकल इंजीनियर बनगे हे। पच्चीस लाख के पैकेज हे ओ बाबू हा अपन दादी-दादा ल लाख मनाय के कोशिश करथे अउ कहिथे- अब तुमन ला ये धंधा करे के जरूरत नइहे। अतेक करेव। मैं ठाढ़ होगे हौं, कमाहौं, तुंहर घर ल भरिहौं, लबालब कर देहौं। 
नाती के बात ल सुनके अलदहीन अउ शिव परसाद के आंखी डहर ले आंसू झरे ले धर लेथे अउ ओकर सिर मं हाथ फेरत कहिथे- तोर मुंह मं दूध-भात बेटा। तोर बिहाव कर देथौं, सुंदर पुतरी कस बहू ला देथौं तहां ले ना छोड़ देबो ये धंधा ला। 
शिव परसाद गांव के मालगुजार के अतियाचार के सुरता करत ओकर धियान अपन जुन्ना घर-दुआर कोती चले जाथे। कइसे रेहेन, कइसे होगेन। बने दिन बहुरिस तेकर बर भगवान ल बधाई देवत कहिथे- जय होवय मालिक, जय होवय तोर। मोला जइसे दिन देखाय हस तइसे अउ कोनो ल झन देखावे।
 

 


सुनो भाई उधो,काला का कहिबे, कंउवा लेगे कान ल ...?

27-Jun-2024
परमानंद वर्मा बोरसी (बेमेतरा),  ( शोर संदेश )  बस्तर और बलौदाबाजार में दनादन बाजा बज रहा है। कहीं बारूद, कहीं बंदूक की गोलियां तो कहीं तोड़फोड़, उत्पात। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सुशासन के स्वर लहरी छत्तीसगढ़ भर में गूंज रही है। छत्तीसगढ़ हम ही बनाए हैं तो हम ही इसे संवारेेगे भी। साय साहब सत्ता संभालते ही घट रही इन घटनाओं से 'सांय... सांय... कर रहे हैं तो वहीं जनता 'रांय... रांय... कर रही है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख...

मुसुआ ल देख के बिलई भागत हे, बिलई ल देखके कुकुर दुम हिलावत कोलकी कोती जाके जीव लुकावत हे, कुकुर ल देख के बेंदरा पेड़ मं जाके परान बचावत हे, मछरी ल देख के कोकड़ा दुबकत हे, मनखे ल देख के मगर तरिया भीतर पानी मं बूड़ जावत हे। अउ  चोर-डाकू ल देखके पुलिस डेर्रावत हे। याहा का उलटा नदिया-नरवा बोहाय ले धर ले हे। वइसन कस हाल जनता ल देखके सरकार घला डेर्राय कस होगे हे। 
समे अउ इतिहास अपन आप दुहराथे, कहिथे तउन सही बात हे का? कोनो-कोनो सियान, गुनी अउ पंडित-महराज मन अब अइसे केहे ले धर ले हे, बने खुलके तो नइ काहत हे फेर आधा डर-आधा बल करके ये काहत हे, कलजुग के मियाद खतम होगे हे या फेर ओकर चला-चली के बेरा हे तेकर सेती जाते जात अपन 'अटपट राजा चउपट नगरी, टका सेर भाजी टका सेर खाजा कस खेल देखावत हे। 
जइसन कभू नइ होय हे, कभू देखे-सुने ले नइ मिले हे तइसन-तइसन चरित्तर होय ले धर ले हे। सब नाक-कान कटा डरे हे। जुन्ना संस्कार, संस्कृति, रहन-सहन, बोली-बतरा, खान-पान, पहिनावा-ओढ़ावा सब धीरे-धीरे, एक-एक करके नंदावत जात हे। ये कलजुग जाती-बिराती हद करत हे। दाई, बहिनी, बेटी, बहू का करत भये... सुनबे देखबे ते बक्खाय असन लगथे। मुंह मं कपड़ा बोज के राह, आंखी ल मूंद के राह तभे कलियान हे, कुछु बोले, केहे तब खैर नइहे। 
होनी तो होके रहिथे, ओला कोनो रोक नइ सकय। कहिथे नहीं, कुछ करनी कुछ करम गति, कु्छ पुरबल के भाग, जाम्बुक तो अइसा कहे तैं का के हे रे काग? नदिया, नरवा,तरिया, ढोलगा, जंगल, पहाड़, रुख-राई, पशु-पक्षी सब रोवत हे। बड़ करलई के दिन आगे हे। दुख के पहाड़ सब के ऊपर खपलागे हे। सब भागे-भागे फिरत हे। कहां जाही, कोन बचाही, कोन हे मालिक?
लंका ल कोन जलइस बेंदरा। अशोक वाटिका ल कोन उजारिस बेंदरा? जउन जघा गलत काम होथे, तउन मन गलत करथे वइसन जघा ल जलाय अउ उझारे के काम बेंदरा मन करथे। बेंदरा मन कोन हे भगवान राम के गण होथे, सेना, सिपाही होथे। धरम के हियाव, रक्षा करना ओकर मन के धरम हे, काम हे, जइसे एक बेंदरा ला देख के लंका के राक्षस मन मैदान छोड़ के भाग गे, वइसने कस काम बलौदाबाजार मं होगे। जब-जब जउन मन धरम ल हानि, नुकसान पहुंचाथे, धरम देवता रूप धर के अपन गण ल उहां भेज देथे। भगवान केहे हे- 'धर्म संस्थापनार्धाय संभवामि युगे-युगे...। 
अब सब एती गुना-भाग करे मं लगे हे के ये कइसे होगे, कोन करिस, काबर करिस। अतेक दिन ले उहां खिचड़ी चुरत रिहिसे, तब सरकार, जनप्रतिनिधि अउ नौकरसाह का आंखी-कान मूंद के बइठे रिहिन हे? तरिया-कुआं, नदिया मं जइसे कोनो बूड़त रहिथे तब भगवान वइसन मनखे ल बचाय खातिर तीन बार मौका देथे। उझाल देथे ताकि कोनो देख सकय त बूड़त जीव के रक्षा कर दय। कोनो नइ देखिही तहां ले ओकर सीताराम हो जथे वइसने कस हाल बलौदाबाजार के होगे। 
सब जीव-जन्तु परेशान, हाथी, बेंदरा, सियार, शेर, भालू सब अब गांव-गांव भटके ले धर ले हें। जंगल साफ होगे हे, नदिया-नरवा, तरिया सब झुक्खा परगे हे, ए जानवर मन मनखे मन ल खाय बर दउड़ावत हे, पटकत हे, मारत हे। अब एती का होही, कइसे होही तेला भगवान जानय अउ सरकार।
 

सुनो भाई उधो,मोदी के राजनीतिक मुजरा

24-Jun-2024
परमानंद वर्मा ( शोर संदेश )। जिसके पास जाने से अशांत, परेशान मन शांत हो जाता है, मुरझाया, कुम्हलाया चेहरा सदाबहार फूलों की तरह प्रफुल्लित और महकने जैसा लगने लगता है, वह कौन लोग हैं, यह मुजरा कर जीवन निर्वाह करने वाली तवायफें ही हैं। इनके प्रति अशिष्ट भाषा, गलत धारणा, विचार व सोच रखना उचित नहीं जान पड़ता। राजनीति अपनी जगह है और कला, संस्कृति, गीत, नृत्य, साहित्य अपनी जगह पर। राजनीतिक दुर्भावनावश किसी व्यक्ति, समाज, प्रदेश की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं चाहिए। इसी संदर्भ में छत्तीसगढ़ी में पढि़ए यह आलेख...।

फिलिम मन म मुजरा तो दू तीन ठन देखे रेहेंव फेर असली मुजरा साकछात ओ  दिन दैखे ले मिलिस जब एक झन संगवारी के भाई के बिहाव म मुजरा रखे रिहिसे। बलाय ले आगे। बिहान भर परीक्षा अउ रात के मुजरा। दुनों झन एम ए फाइनल म रेहेन। बात ल ओकर टार नइ सकेंव अउ पहुंचगेन कुरुक्षेत्र के मैदान म। उहां दू झन बुलेंदरी, चुलबुली, रंगरुप ल झन पूछव बतावत म लाज लागत हे। देखते साठ मुंह कोती ले लार चुचुवाय ले धर लिस। कइसनो कर के  मन ल संभालेंव अउ फटकारेंव,,भोसाना हे का बेटा तोला। दु ठन डांस देखेन तहां ले घर आगेन। पुस्तक कापी ल खोलथौं पढे बर तब  कहां के पढाई होना हे, उही बुलेंदरी मन आंखी आंखी म झूले लगिस। केहेंव, पढ डरे बेटा, साल भर के कमई म तोर आगी लग गे तइसे लागत हे। सांखियकी के परचा रिहिसे। तीन ठन सवाल बनायेंव अउ दू ठन गद्य। जान बची लाखों पाये कस सौ म पचासी अंक पायेंव। मंय ओ मुजरावाली मन ल बधाई देंव अउ केहेंव,,जय होवय दाई हो तुंहर बने किरपा करेव। अइसने मोरे कस फांदा म फंसगे परधान मंतरी नरेन्द्र मोदी। मुजरा अउ गुलामी देखे के लालच म बिहार जा परिस। उहां ओला लेना के देना परगे।
वइसे तो गुजरात मं रास गरबा, डांडिया उहां के संस्कृति मं रचे-बसे हे, अउ मउका-बेमउका कोनो परब या फेर तिहार पर जथे तब ये नृत्य ओकर मन के देखे ले मिल जथे। परधान मंतरी नरेन्द्र मोदी तो नाचे-गाए के घला शौकीन हे। अइसन मउका ल ओहर कभू नइ छोडय़। फेर जब ले देश के बड़े पद ल संभाले हे तब थोकन एमा कमी आ गे हे। 
वइसने कस हाल बिहार के हे। उहां रास गरबा नहीं मुजरा के चलन जादा हे। कोन गांव, कोन कस्बा, अउ कोन शहर नइहे, जिहां मुजरा के नांव सुनथे तहां ले उहां एकमई हो जथे, जुरिया जथे, मुजरा देखे बर। मोदी सही लालू घला शौकीन हे मुजरा देखे के। एक ले बढ़के एक अप्सरा, सुंदरी, मेनका असन परी ल चुन-चुन के बलाथें। देखथे रातभर मुजरा।
परधान मंतरी मोदी ल मुजरा के बारे म ओतेक रस-कस मालूम नइहे, फेर ओकर अनुभवी अप्सरा मन सही चकाचक ले पुतरी बरोबर तवायफ के रोल करे हेमामालिनी, जयप्रदा, जया बच्चन, सत्यभामा,  मायावती, माधुरी दीक्षित, ममता कुलकर्णी, ममता बनर्जी जइसन कतको हे। जब मोदी जी ल बिहार आना रिहिस तब मुजरा के बारे म ओकर मन ले सलाह मशविरा कर लेना रिहिसे, या फेर ओमे से दू-चार झन ल संग मं ले आना रिहिसे। 
कोनो-कोनो बतइन के स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी, जया बच्चन, स्वाति मालीवाल अउ राधिका खेड़ा आय रिहिस हे मोदी के संग राजनीतिक मुजरा करे खातिर। मोदी जी ल जब गुलामी अउ मुजरा के ऊपर गीत-गजल ''चलते-चलते मुझे कोई मिल गया था... सरे राह चलते-चलते... गाना अउ हाथ मटका के नाचे बर शुरू करिस तब हेमा मालिनी टोकत कहिथे अउ खुद कइसे हाथ-पांव, आंखी के भव  भंगिमा, होंठ मं मुसकाय के तरीका बताथे, तब मोदी जी वइसने नाचे अउ मटकाये ले धर लेथे। 
जया बच्चन ल लगथे मुजरा बने ढंग के नइ कर पावत हे मोदी जी हा, तब ओला उठेवा मारत कहिथे- एहर राजनीति नोहय भइया, ये मुजरा हे, नाचे गाये के रियाज करे ले परथे तब तवायफ मन के रोटी-पानी के जुगाड़ हो पाथे।  
मोदी जी कहिथे- तब समझा न कइसे नाचव, गावौं, मटकवौ ? तब जया बच्चन हा स्मृति ईरानी ल बलाथे अउ कहिथे- चलव तुमन दुनो झन जइसे मैं नाचिहौं, गाहौं तइसने तहूं मन वइसने करिहौ। 
मोदी जी कहिथे- जया, 'इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा ओ रिकार्डिंग बजवा अउ चलव आवौ सबो हिरोइन मन नाचबों, गाबो। फिल्म पाकीजा मं ये गीत ऊपर स्व. मीना कुमारी डांस करे रिहिसे। गीत बजथे- 
इन्हीं लोगों ने, इन्हीं लोगों ने 
इन्हीं लोगों ने, इन्हीं लोगों ने 
इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा
हां जी हां... हां जी... दुपट्टा मेरा
हमरी न मानो तो रंगरेजवा से पूछो
हां जी हां... रंगरेजवा से पूछो
बीच गलिन में छीन लिनी दुपट्टा मेरा
हां जी हां... हां जी हां... दुपट्टा मेरा। 
बिहार के चुनावी सभा म हजारों के भीड़ मं मोदी राजनीतिक मुजरा ल उहां के जनता मन देखिन फेर ओकर मन के मनमाफिक नइ होइस। अपन चुनावी भासन मं मोदी जी कहि दीस- बिहार के चिन्हारी हे गुलामी अउ मुजरा। चुनाव जीते खातिर ककरो गुलामी करौ, मुजरा करना हे ते करत राहौ फेर मैं एससी, एसटी अउ ओबीसी के संग खड़े रइहौं। राजद लालटेन ले के मुजरा करइया के जमात हे। मोदी के ये शब्द बिहारी मन ल चुभगे, अपमान असन लगिस। 
मोदी के बिहार मं ये चुनावी मुजरा उहां आगी लगा दीस। भड़कगे जनता। मुजरा के अपमान, तवायफ मन मोदी के निंदा करत हे। सही बात हे कोनो देस, परदेस, कला, संगीत, गीत, नृत्य अउ संस्कृति के हिनमान नइ करना चाही। कोनो गुजरात के कला संस्कृति, साहित्य के अइसने अपमान करिहीं तब ओमन ल कइसे लागही। परधान मंतरी के पद मं आसीन अइसन नेता के मुंह ले ये बात शोभा नइ देय। 
जाती-बिराती
नजर लागे राजा तोरे बंगले में
हां.. हां... तोरे बंगले में।
मैं तो होती राजा बन की कोयलिया
हां... हां.. बन की कोयलिया
कुहुका उठती राजा तोरे बंगले में
मैं तो होती राजा बेला -चमेलिया
हां..हां.. बेला चमेलिया
लिपट रहती  राजा तोरे तन बदन में
हां... हां... तोरे अंगने में
नजर लागी राजा...।

 


बंधना चोरी के डोरी के

20-Jun-2024

 कोई दिल की चोरी करता है तो कोई नींद की। सत्ता, सुंदरी और शील हरण भी कोई कम नहीं हो रहा है। धन, विद्या, कला, संगीत, ज्ञान, विज्ञान के अलावा भी अनेक प्रकार की चोरियां हैं, जिन्हें हम नहीं जानते, बेखौफ हो रही है। इसी संदर्भ में पेश है छत्तीसगढ़ी आलेख....


बंधागे हंव गा, छंदागे हंव रे
संगी मया म तोर, अलबेला रे मोर
फंदागे रे हंव जोड़ी निरमोही मोर
मया म तोर लपटागेंव हंव ना।।
-जुगनू जायसवाल, कोरबा 

चोरी करही एक ठन सुग्घर कला हे, जउन ल ए कला आथे ओमन ल एकर भरपूर उपयोग करना चाही। अउ जउन मन ल नइ आवय ओमन ल सीखे के कोशिश करना चाहीए कला ल सीखे मं अड़बड़ फायदा हे। गरीबी दूर हो जथे। चार दिन, महीना अउ सालभर मं देखते देखत अइसन मन मालामाल हो जथे। गांव, कस्बा, शहर अउ देश-विदेश मं अइसन-अइसन लाखों नामी-गिरामी मनखे हे जउन मन ए कला के बदौलत फकीरचंद ले अमीरचंद बन बइठे हें। बैंक बैलेंस बना डरे हें, झोपड़ी के रहवइया आज महल-अटारी मं ठसन अउ शान-ए-शौकत मं रहत हें। 
दुनिया मं कोन अइसे मनखे होही जउन ए  काहय भला के ओमन चोरी नइ करे होही या नइ करत होही? अब ये अलग बात हे के सरकार ह एला अपराध के दायरा मं ला दे हे अइसन-अइसन करइया मन बर सजा के प्रावधान कर दे  हे। जइसन ये कला हे ओइसने चोरी करइया मन घला एक ले बढ़के एक कलाकार हे। अतेक बारीकी अउ सफाई से चोरी करथें ते कोनो ल कानो कान खबर नइ लागे। जादूगर मन सही अतेक सफाई से चोरी करथे। अइसन माहिर कलाकार मनके तो जिला, राज्य अउ राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान होना चाही। जइसन दूसर क्षेत्र के कलाकार मन के सम्मान करे जाथे। 
चोरी नींद के करथे, दिल के करथे, धन, विद्या, सोना-चांदी, सत्ता, सुंदरी के करथे। गांव मन ले गाय-भंइस, नांगर, कोला बारी ले आमा, भाटा, पाताल तक के चोरी करे के खबर मिलत रहिथे। ककरो बहू, बेटी, गोसइन तक ल चोरहा मन नइ छोडय़। रावन कस भगा (चोरी) करके ले जथे। अइसन घटना तो आजकल खुलेआम होय ले धर ले हे। चोरी-छुपे अइसन करम करत जउन बेटी, बहू अउ गोसइन पकड़ागे तब तो ओमन दांत निपोर देथें। चोरी आखिर कब तक छिपही। 
चोरी कतको परकार के होथे। ज्ञान-विज्ञान, तंत्र-मंत्र, कल-कारखाना, जमीन-जायदा, घर-द्वार, गाड़ी, घोड़ा, गीत, गजल, कविता, साहित्य तक मं चोरी करे के शिकायत मिलत रहिथे। पटवारी, आरआई, तहसीलदार बड़े-बड़े चोरहा मन के लम्बरदार होथे। जतके बड़े मनखे, नेता, मंतरी, नौकरशाह, सेठ, उद्योगपति होथे, ओतके ओमन बड़े चोर होथे। कोनो मनखे, संस्था ऊपर आरोप नइ लगावत हन, अदालत मं जइसन आज सैकड़ों मामला चोरी-चकारी, गबन, धन के अफरा-तफरी अउ भ्रष्टाचार चलत हे, ओकर ये सबूत हे, गवाह हे। है ना ए बहुत बड़े कला, चोरी के कतेक ताकत हे, हैसियत हे। इही तो ये कला के कमाल हे। रंक ले राजा बना देथे। 
परदा कूद के ककरो बारी, घर मं खुसरे के का मतलब होथे? सपड़ मं आगे तहां ले दे कुटाई। याहा दइसन ढंग के चोरी घला होथे। बात पंचायत मं जाथे तब असली बात ल नइ बकर के अंते-तंते गोठियाथे। फेर चोर के दाढ़ी मं तिनका असन बात ल पंच मन पकड़ लेथे अउ फेर कर देथे दंड। 

~परमानंद वर्मा

चोरी के कलाबाजी मं भगवान कृष्ण के नांव जादा उजागर होय हे। दूध, दही अउ मक्खन के का कमी रिहिसे नंद बाबा के घर मं फेर नहीं जेकर टकराहा (आदत) पर जथे चोरी करे के ओहर छूटय नहीं। रोज कहूं न कहूं चोरी करत पकड़ा जाय। कभू दूध, दही बेचे ल जात राहय तउन गोप-गुवालिन मन ल छेक (रोक) के ओकर मन के मटका फोर दय, लूटपाट मचावय। बहुत उतलंग (उत्पात) करय। 
महराज मन कथा-भागवत मं एक ठन अनफभक कथा सुनाथे, जेला सुने मं हांसी लगथे। अब तरिया मं नहावत रिहिन गोप-गुवालिन मन तेकर लुगरा (साड़ी) ल चोरी करके पेड़ मं टांग के तमाशा देखे के का मतलब होथे। बताथे- ओमन नग्न होके नहावत रिहिसे। तब साड़ी संग मं ओकर मन के ब्रेजियर, ब्लाउज, पेटी कोट अउ जांघिया ल घला लुका ले रिहिस होही? अब ये कथा मं बात कतका सही हे अउ कतका लबारी हे तेला उही मन जानय। फेर जब ये कथा चलथे, सुनइया मन कान टेड़के के चाव से सुनथे। 
चोरी के अइसन कतको परसंग हे, घटना हे। सब जुग मं चोरी के इतिहास हे। अली बाबा चालीस चोर अउ चरणदास चोर के कहिनी ल तो सबो झन सुन डरे हवौ। किसम-किसम के चोरी, किसम-किसम के चोर, छोटे चोर, बड़े चोर। फेर छोटे चोर फंस जाथे, बड़े बुलक जाथे, सालों चलत रहिथे अदालत मं मामला। चोर पुरान इति...।
जाती-बिराती

दुनियादारी छोड़ पिया जी, बोल मया के बोली ला।
नींद चैन लेगेव संघरा, छोड़व हँसी ठिठोली ला।।

घेरी-बेरी सुरता आथे, मुचमुच हाँसत दिखथस जी।
बुता घलो हा होवत नइहे, कइसे अलहन करथस जी।
 रद्दा देखव ले के आबे ,कब कहार अउ डोली ला।।
नींद चैन लेगेव संघरा, छोड़व हँसी-ठिठोली ला।।

-डॉ. दीक्षा चौबे, दुर्ग

*सुनो भाई उधो*

20-Jun-2024

चुनाव : नारद जी के भारत दौरा

 

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे

समवेत्ता युयुत्सव:।

मामका:  पांडवाश्चैव,

किम  कुर्वत संजय:।। 

 

परमानंद वर्मा

 

कुरुक्षेत्र के मैदान में जिस प्रकार चुनाव रिपोर्टिंग संजय नामक पत्रकार करते थे और प्रतिदिन की खबर धृतराष्ट्र को सुनाया करते थे। उसी प्रकार की रिपोर्टिंग देवर्षि नारद जी अभी कर रहे हैं। भारत और अमेरिका में हो रहे चुनाव और नेताओं की गतिविधियों की जानकारी भगवान शिव और लक्ष्मीनारायण को दे रहे हैं। उनके निर्देश पर ही भारत भ्रमण कर रहे हैं और जिन निर्वाचन क्षेत्रों में विशेष दंगल व टकराहट की स्थिति है वहां उनके कैमरामेन और रिपोर्टर तैनात है। इसी संदर्भ में पढिय़े यह छत्तीसगढ़ी आलेख...

 

बोलो सटक नरायण

बोलो सटक नरायन

गोविन्द के गुन गाना जी

बोलो सटक नरायण

 

गोविन्द बोलो हरि गोपाल बोलो

राधा रमन हरि गोपाल बोलो...

 

नारद मुनि महाराज हाथ मं करताल अउ बीना धरे, बजावत झुलपाहा बड़े-बड़े चूंदी अउ बीता भर दाढ़ी, मुड़ी ल मटकावत, पांव में खड़ऊ पहिने, पता नहीं, कोन कोती ले किंजरत मोर दुकान कोती आवत रिहिसे। जनम के बड़ा गियानी अउ भक्त सही जब ओ महराज मोर दुआरी मेर अइस तब घोलन के साष्टांग, दंडासरन पांव परेंव। 

खुसी राह बेटा, चिरंजीवी भव काहत आसिरवाद दीस। ओला मोर दुकान मं गद्दी मं बइठारेंव। ओहर पूछथे- तोर सियनहा, नइ दीखत हे बाबू, कहूं गेहे का? 

ओला बताथौं- महाराज के बछर होगे ओला गुजरे। मोला सुरता आवत हे, नानपन के रेहेंव, पढ़े बर इस्कूल जात रेहेंव तबके तोला देखें हौं। के बछर बाद तोर आगमन होवथे?

हां बेटा, तैं सही काहत हस। कइसे करबे साधु-जोगी मन तो नदिया-नरवा के पानी कस तो आन, आज इहां तो काल उहां। का ठिकान हमर मन के?

सियान गुजरगे कइके बतावत हस तउन ल सुनके बड़ दुख लगिसे। संत बरोबर रिहिसे हे सेठ हा। 

त पहाटिया ल बलावौं महाराज जेवन पानी के बेवस्था करही। तैं ठहरथस तउन खोली खाली हे?

गरमी बहुत परत हे बेटा, लस्सी, नइते अउ कोनो ठंडई के बेवस्था हो जाए, तेला कर दे। हौ महराज काहत सतानंद ल हुद कराके बलाथौं अउ मोला बड़े गिलासभर लस्सी बनाके लाय बर केहेंव। 

पूछथौं- कोन कोती ले तोर आगमन होवत हे महराज, धन हमर भाग, कोन कोती के पुन्न जागिस हे के हमर गांव मं, हमर घर-दुकान मं तोर चरन परिस हे। 

नौकर सुदामा ल कहिथौं- अरे जा तोर भउजी अउ बहू हा लोटा मं पानी अउ थारी धर के आही। महाराज के पांव पखारबो, चरनामृत लेबो। मुड़ ढाके सेठानी अउ मोर बहू आथे, सबो झन पांव पखारेन, चरनामृत लेन अउ दछिना घला देना।

 

सतानंद गिलास भर ठंडई  डार के लाय रिहिसे तउन लस्सी ल खखाय, भुखाय बरोबर नारद मुनि सपा-सप गटकगे। दाढ़ी अउ मेंछा मं हाथ फेरत कहिथे- आह... अब थोकिन शांत लगिस बेटा। 

पूछथौं- कोन कोती ले आवत हस महाराज, कइसे हमर गांव कोती के तोला सुधि अइस?

देख बेटा- साधु, महात्मा अउ भगवान के तो एक ओकर से आय-जाय के कारन नइ पूछे जाय, ओमन आथे तेमा कलियान के बात समाय होथे?

-गलती होगे महराज- छोटे बुद्धि के हौं, क्षमा कर देहौ, अक्कल नइ पुरिस त पूछ परेंव। 

कोनो बात नहीं बेटा- अब तैं जब पूछ परे हस तब तोला बतई देथौं। मंय कैलाश परवत ले बाबा भोलेनाथ अउ माई पारबती करा ले आवत हौं। ओकर पहिली बिसनूपुरी में रेहेंव, तिहां भगवान लक्ष्मी-नारायण संग भेंट करेंव। तब उहू हा तोरे सही पूछ परिस- कहां ले आवत हौ नारद जी। बताएंव भोले बबा करा ले आवत हौं। 

भगवान बिसनु ओकर मन के कुशलक्षेम पूछिस तब बताएंव- हां बने-बने हे महराज, फेर ओकर मन के चिंता धरती लोक मं बढ़त दुख-करलेस, अउ परेशानी मं जादा दिखिस। 

- कइसे दुख, काकर परेशानी?

- कई ठन देश मं युद्ध माते हे, मरत-कटत हे। रूस, यूक्रेन, इजराइल, ईरान, लेबनान। नान-नान लोग लइका, माईलोगिन बिना मौत के मौत मारे जात हे। भारत मं तो गदर माते हे, चुनावी युद्ध चलत हे। अइसे लगत हे जइसे कुरुक्षेत्र के मैदान हे, अउ दूनो भाई कौरव-पांडव असन लड़त हे। समझ नइ परत हे कोन कौरव हे अउ कोन पांडव?उहां तो सत ईमान, धरम, इज्जत खुलेआम दांव मं लगत हे। कोन सती-सतवंतीन हे, तब कोन कोठा मं, चकलाघर मं बइठे किसबिन हे तइसे कस चरित्तर विधायक, सांसद, प्रतिनिधि अउ पारटी कार्यकर्ता मन होगे हे। सब बिकत हे, लड़त हे, मरत हें। 

- अइसन नइ हो सकय नारद जी तैं मोर भारत देश के अपमान करत हस, जिहां निस-दिन गंगा-जमुना के निरमल धारा बोहावत हे, जेन भूमि मं श्रीकृष्ण जी गीता के गियान सुनइस ओ धरती के वासी मन के अतेक पतन हो जही, गिर जही- ये बात ल तोर पतियावौं नहीं। देवी लक्ष्मी नारादजी के बात ल सुनके खखुवागे अउ भगवान बिसनु ओकर तमतमाय तेवर ल देखिस तहां ले कहिथे- शांत हो देवी... शांत...।ओला बताथे- देवी लछमी, नारद जी, स्वर्ग लोक के मीडिया समूह के चीफ हे, ओकर खबर ओकर रिपोर्ट बीबीसी लंदन के खबर जइसे विश्वसनीय अउ अकाट्य होथे। तोला ओकर खबर अउ रिपोर्ट ऊपर भरसो नइहे तब तैं तोर भारत के कोनो विश्वसनीय न्यूज चैनल के संपादक, रिपोर्टर करा ले खबर के मगवी दरयाप्त कर ले। लछमी के सिंहासन मं बइठे के बाद नारदजी अउ बहुत कुछ चुनाव के खबर सुनइस जइसन आज तक के चुनाव मं नइ होय हे। सब पारटी वाले मन डरे हें, भस्मासुर जइसे राज चलत हे। अखबार, न्यूज चैनल के मालिक, संपादक, पत्रकार के मुंह बंद होगे हे, कलम सही खबर लिखना  बंद कर देहे। सब इही काहत हे- राम ही राम हे, राम ही सत्य हे, राम ही भारत हे, राम मं ही कलियान हे। राम के छोड़ कोनो दूसर नांव नइ लेवत हे। लछमी-नारायन ल परनाम करत नारद जी बीना-करताल बजावत उहां ले खिसकते रिहिसे तब भगवान बिसनू पूछथे- कहां चले नारद जी, तब बताथे- अभी बड़का नेता मन के चुनाव प्रचार चलत हे। उलट-पुलट कपि लंका जारी कस काम चलत हे। लम्बा खरीद-फरोख्त चलत हे। ओकर रिपोर्टिंग करना हे। 

बोलो सटक नरायन सटक नरायन

गोविंद के गुन गाना जी

बोलो सटक नरायन।


*छोटी सी बात की बड़ी सजा*

20-Jun-2024

छोटे व बड़ों सबके लिए मर्यादाएं बनी हुई है, निर्धारित की गई है और उसी की सीमा के अंदर रहने से ही सदा, सर्वदा, सुख-शांति बनी रहती है। उल्लंघन करने पर हानि ही हानि है। लेकिन देखा यह जा रहा है कि नीतियों और मर्यादाओं का उल्लंघन करना आम हो गया है। कोई भी इसकी परवाह नहीं करता, यह सोचते हैं कि यह तो छोटी सी बात है, इसमें कोई बनने-बिगड़ने वाला नहीं है। बात छोटी-सी भले ही हो लेकिन यह क्यों भूल जाते हैं कि छोटी-सी दिखने वाली चीटीं विशालकाय शरीरधारी हाथी को भी पटखनी दे देता है। बांधों और सरोवरों को छोटा-सा समझने वाला छिद्र भी एक दिन उसे तोड़ देने का समर्थ रखता है। यह गलती भूल और अपराध कभी भी नहीं करना चाहिए, यह नहीं सोचना चाहिए कि इतनी-सी बात है- कह दिया, कर दिया तो इससे क्या होने और बिगड़ने वाला है। तत्क्षण तो दिखाई नहीं देता, बुद्धि समझ नहीं पाती लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होते हैं। जब वही बात बाद में बड़ी हो जाती है, विकराल रूप धारण कर लेती है तब स्थिति को संभालना मुश्किल हो जाता है। यह बात सही है कि छोटे, बच्चे, चंचल प्रवृत्ति के होते हैं और वे सदा छोटे ही बने रहना चाहते हैं, ठीक है, छोटे हैं, बने रहना चाहते हैं तो इसमें कोई गलत व बुरी बात नहीं है लेकिन छोटे-बड़ों का लिहाज भी कोई मायने रखता है। यह नहीं  कि बड़े कुछ बोल नहीं रहे हैं ऐसी बात नहीं है। बड़े  कुछ समझ व जानकर भी नजर अंदाज कर रहे हैं इसका मतलब यह नहीं है वे नासमझ हैं, मूर्ख हैं। उनकी बड़प्पन है, कुछ नहीं बोल रहे हैं लेकिन तुम्हारी गलतियां भूल और अपराध यही सजा का कारण बनता जाता है। मर्यादाओं की अवज्ञा बहुत बड़ा अराध है अक्षम्य है। बड़े चाहते भी नहीं हैं सजा देना लेकिन अपराध ही बहुत बड़ी सजा दे देता है।

ऐसी सजा कि पछताने व अफसोस करने को विवश कर देता है लेकिन तब होता क्या है जब चिड़िया चुग गई खेत। सीता जी जब पंचवटी में थी तब एक दिन उसकी नजर सोने की हिरण पर पड़ गई। राम जी से आग्रह करती है कि उसे वह पाना चाहती हैं, दिली इच्छा है। उसकी इच्छा को पूरी करने के लिए राम निकल पड़ते हैं। थोड़ी दूर जाने के बाद ऐसा लगता है कि राम जी किसी संकट में पड़ गए हैं, कराहने की आवाज आने लगती है, सीताजी लक्ष्मण को आदेशित करती है और कहती है लक्ष्मण लगता है तुम्हारे भैया किसी संकट में है। लक्ष्मण धनुष बाण लेकर निकलने से पहले पंचवटी के चारों ओर बाण से लकीर खींच देता है और कहता है- मेरे आते तक इस लकीर से बाहर भूलकर भी नहीं निकलना नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। इसके बाद वह चला जाता है। उसके जाते ही आगे क्या होता है यह कथा सभी जानते हैं और समझते हैं। तात्पर्य यह कि बात है तो छोटी-सी लकीर के बाहर नहीं निकलने का था। सीता जी ने उसे सामान्य समझकर नजर अंदाज कर दिया। इसकी सजा कितनी बड़ी मिली। द्रौपदी की गलती व अपराध छोटी नहीं थी, क्षम्य नहीं था। वाणी पर संयम न रखने के कारण कितनी लज्जाजनक स्थिति से गुजरना पड़ा। आखिरकार वही मुद्दा महाभारत का कारण बन गया।  और आज तो स्थिति यह है कि कौन छोटा है कौन बड़ा, क्या होता है नियम कायदे और मर्यादाएं सभी  उतारकर फेंक दिए हैं। हिजाब फेंक दिए हैं। खुल्लम-खुल्ला जो जी चाहे करने, बोलने , चलने, फिरने, पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने के लिए निकल पड़े हैं। इसका परिणाम चाहे जो हो देखा जाएगा। अपराध इस कदर बढ़ गए हैं कि रोकना असंभव हो गया है। पुलिस, वकील और जजों को फुर्सत ही नहीं प्रकरणों को निपटाने में। हमारी छोटी सी गलती, भूल और अपराध हमें किस मुकाम तक ले गई है, इसका कभी अंदाज भी नहीं था और आज नाहक सजा भुगत रहे हैं। थाने, कोर्ट  में भटक रहे हैं।

 
~परमानंद वर्मा

 


*अम्मट बासी-चटा गोंदली*

20-Jun-2024

बटकी म बासी जागे,

मलिया म जागे साग।
कंवरा ढेलवानी जागे,
माटी म जागे भाग।।
बदरी बिशाल, परमानंद
 
छत्तीसगढ़ में  बोरे बासी का अपना विशिष्ट स्थान है। खासकर गांवों में तो यह ग्रामीणों का प्रमुख आहार है। गर्मी के दिनों में तो दोनों जून इसका सेवन करते हैं। इसीलिए 'अम्मट बासी चटा गोंदली, नंदलाल सखी पुनिया डोकरी  नामक लोक गीत प्रचलित है। शहर के किसी होटलों, मालों में 'बासी मांगने पर नहीं मिलता। भूतपूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे प्रचारित करने की दिशा में कदम तो उठाया था लेकिन...? छत्तीसगढ़ी में पढ़िए यह आलेख...
 
बाप रे बाप, जान दे एसो के जेठ महीना तेकर ले नवा तपा, का तपिश ते सब के जीव हलाकान करके रख दीस। ऊपर से ये नवपंचक बाचे-खुचे हे तउनो आगी मूतत हे। अइसन गरमी के बखत मं ये चुनाव का झपागे, कतको मनखे रेंग दीस ऊपर कोती। आगी अंगरा कस तपत हे घाम हा। 
काबर अतेक घाम करत हे, ओकर कारन का हे तउन ला अब जाने ले परही। जम्मो रुख-राई, जंगल, पहाड़, नदिया, नरवा, तलाब सब रोवत हे। ओकर विपदा, दुख, करलेस के कोनो हियाव करइया नइहे। लगथे ये धरती मं कोनो राक्षस मन उतरगे हे। ओकर नजर मं सिरिफ अउ सिरिफ विकास दीखत हे तब ये विकास कइसे आही... सब जंगल-झाड़ी, परबत, नदिया ल विनास करे मं। जब सब साफ हो जाही तब ये जमीन के भीतर जउन हंडा गड़े हे उही मं तो विकास छिपे हे। 
छत्तीसगढ़ के भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी के हे रिहिसे- इहां के अमीर धरती मं गरीब जनता निवास करथे। बासी खा-खा के जीवन गुजार दीन फेर पुरखौती जउन जायदाद हे ओला लुका (छिपा) के रखिन, नइ कोनो ल बतइन। जानत रिहिन हे, कहूं ये खजाना ला जान परही तब एक नइ बचाही। 
ओ खजाना ल जान डरे हें। ये परदेसी मन सगा बनके अइन अउ आज इही सगा मन छत्तीसगढ़िया मन के छाती मं चढ़के शासन करे ले धर लीन। छत्तीसगिढ़या बासी खाते रहिगे अउ ओमन जउन हाथ पसारे अइन आज मॉल, पांच सितारा होटल के मालिक बने बइठ गे। अउ माल मसाला झड़कत हे। 
ओमन कहिथे अउ आज जेने आथे तउने मन तको कहिथे- 'छत्तीसगढ़िया-सब ले बढ़िया । काबर ये नारा ला  राग धर के कोनो गीत, गजल, कव्वाली, शेर अउ गीता, रमायन, वेद, पुरान के इसलोक, मंत्र असन गाथे, दुहरावत रहिथे? कोनो तो गीता रहस्य बरोबर ये नारा के रहस्य होही?
ये भारी रहस्य हे, ओ रहस्य ल ओ दिन अंतराष्ट्रीय कथावाचक सिहोर वाले महराज पं. प्रदीप मिश्रा हा तीन-चार लाख के भीड़ भरे सभा मं सबके आगू मं बताइस- शांत, सरल, मीठ-गुरतुर बोली, सहज सुभाव, छल-कपट, प्रपंच, झूठ-लबारी ले कोसों दूर, जउन मिलगे तउन मं संतोष, उदारता- जलन ले दूर, ये गुन के रहस्य भाव छत्तीसगढ़िया मन हे। 
महाराज जी हा आगू किहिस- इही मन असली छत्तीसगढ़िया हे अउ अब जउन मन इहां पेट बिगारी, रोजगार धंधा, कारोबार, उद्योग, राजनीति करे के नांव ले के बस गे हे, ओमन नोहय छत्तीसगढ़िया, ओमन का जानही इहां के माटी के मरम ल। ये सप्तरिसी अऊ राम के महतारी कौशिल्या के  तपोभूमि हे, तेकर अइसन संतान हे। सीधा-साधा, भोला-भाला हे इहां के मनखे। बासी-पानी, पेज पसइया खाके आजो ओमन अपन जीवन ल गुजारना जानथे। फेर ककरो दुआरी मं भीख मांगे ल नइ जाय न चोरी चकारी अउ गलत कारोबार, धंधा करय। ये तो बाहिर वाले मन इहां आके जब बसना शुरू करिन हे तब अपन दुरगुन अउ जहर ल बगरावत जात हे। 
बासी आज घलो इहां के मुख्य भोजन हे, बड़काहा मनखे मन तात भात खाथें नइते बासी ल आज ले नइ छोड़े हे इहां के निवासी मन। सुरता आवत हे सन् बैंसठ-पैंसठ पर भयंकर अकाल परिस, एक दाना नइ होइस, तब कहां अमरीका ले सरकार हा चांउर (चांवल) मंगाय रिहिसे। ओकर न भात मिठावत रिहिसे न बासी। बासी ल हाथ मं धरते ते पच-पच ले हो जात रिहिसे। अइसन ओ बइरी देस हे, जेन हा सड़े-गले चावल अउ गहूं ल भेजे रिहिसे। ओ अनाज ल जानवर मन खाथे, तेला भारत मं भेज रिहिस हे। छिनमिनहा छत्तीसगढ़ कइसनो करके जीव परान ल बचाना रिहिसे, ओ बिपत के दिन ले गुजारिन।
ओ अकाल ह छत्तीसढ़िया मन ल हिला के रख दीस। इही पइत ले गांव के मनखे मन शहर कोती झांकना शुरू करिन हे, रोजी-रोटी कमाय खातिर शहर वाले मन घला, भोला-भाला सिधवा जान के लुटे मन कोनो कमी नइ करिन। 
गरीब के कोनो देखइया, सुनइया नइहे। न तब रिहिस, न आजो हे। सरकार, उद्योगपति, सेठ, साहूकार अउ बड़े-बड़े मन के बोलबाला हे। सब ठगराज बने बइठे हे। मस्त हे गरीब बासी खा-खाके, बासी ही ओकर मन के माखन  मिसरी हे। नवतपा मं तो सब बोरे बासी झड़के हे अथान के चटनी अउ गोंदली के संग मं। एकर ले बड़े सुख अउ का लेबे?
जाती-बिराती
 
बटकी मं बासी अउ चुटकी मन नून।
मंय गावत हौं ददरिया तंय कान दे के सुन। 
ओ चना के दार राजा, चना के रानीचना के दार  चना के दार गोंदली,
कडकत हे रे।
टुरा परबुधिया,
होटल म भजिया,
धडकत हे रे।
चना के दार राजा,
चना के दार रानी,
हो हो होई रे,,,,
 
 
-परमानंद वर्मा 

अगहन मास : इस माह में लक्ष्मी जी को ऐसे करें प्रसन्न, जानें क्या हैं उपाय

29-Nov-2023

हिन्दू पंचांग का 9वां महीना अगहन (मार्गशीर्ष) धर्म कर्म की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना गया है। वैदिक मान्यताओं के अनुसार सभी माह में मार्गशीर्ष को विशेष महत्व प्रदान दिया गया है। मार्गशीर्ष में किए गए धार्मिक अनुष्ठानों, जप, तप और योग का जीवन में बहुत ही शुभ फल प्राप्त होता है। मार्गशीर्ष मास में अन्न का दान करना सर्वश्रेष्ठ पुण्य कर्म माना गया है। ऐसा करने पर हमारे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं। वहीं इस माह में नियमपूर्वक रहने से अच्छा स्वास्थ्य तो मिलता ही है, साथ में धार्मिक लाभ भी मिलता है। यही नहीं इस माह में आप धन की देवी मां लक्ष्मी को भी प्रसन्न कर सकते हैं इसके लिए आपको इस माह के हर गुरुवार को खास पूजा करनी होगी। क्या करना होगा इस दिन, आइए जानते हैं...


व्रत करें पदमपुराण में
यह व्रत गृहस्तजनों के लिए बताया गया है। इस पूजा को पति पत्नी मिलकर कर सकते हैं। अगर किसी कारण पूजा में बाधा आए तो औरों से पूजा करवा लेनी चाहिए पर खुद उपवास अवश्य करें। उस गुरुवार को गिनती में न लें। अगर किसी दूसरी पूजा का उपवास गुरुवार को आए तो भी यह पूजा की जा सकती है। दिन या रात में भी पूजा की जा सकती है। दिन में उपवास करें तथा रात में पूजा के बाद भोजन किया जा सकता है। इस व्रत कथा को सुनने के लिए अपने आसपड़ोस के लोगों को, रिश्तेदारो को तथा घर के लोगों को बुलाएं व्रत कथा को पढ़ते समय शान्ति तथा एकाग्रता रखें। गुरुवार को सुबह ब्रह्म मुहूर्त से ही माता लक्ष्मी की भक्तिभाव के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद उन्हें विशेष प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अगहन महीने के गुरुवारी पूजा में माता लक्ष्मी को प्रत्येक गुरुवार को अलग-अलग व्यंजनों का भोग लगाने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

स्थापना, विसर्जन व पूजा विधि

- एक दिन पूर्व ही घर को गोबर से लेप कर लें या फिर गीले कपड़े से पोछ लें।  
- इसके बाद एक ऊँचे पीढ़े या चौकी पर या छोटे मेज पर बीच में थोड़े गेहूँ या चावल रख का एक साफ सुथरे ताँबे या पीतल के लोटे को पानी से भर कर चावल या गेहूँ पर रखें।

 

- पानी में सुपारी, कुछ पैसे और दुब (दूर्वा घास) डाले। ऊपर से लोटे में चारों तरफ पाँच तरह के पेड़ के पांच या सात पत्ते डाल कर बीचों बीच एक नारियल रखें।
- उस नारियल पर बाजार में उपलब्ध देवी के मुखोटे या चहरे को बांध या चिपका दें।

 


- लोटे पर हल्दी- कुमकुम लगाएं और साथ ही उस लोटे के गले में लोटे के हिसाब से लहंगा बाँध दें और नारियल के ऊपर एक छोटी चुनरी भी चढ़ा देवें।

 


- देवी की प्रतिमा या फोटो को पूर्व दिशा में मुँह करके या उत्तर दिशा में मुँह करके स्थापना करनी चाहिए।  
- इस व्रत कथा की पुस्तक में जो फोटो हैं उसे भी सामने रखें तथा पूजा प्रारंभ करें

ऐसे करें पूजा अगहन मास के गुरुवार के दिन आठ सुहागनों या कुँवारी कन्याओं को आमंत्रित कर उन्हें सम्मान के साथ पीढा या आसान पर बिठाकर श्री महालक्ष्मी का रूप समझ कर हल्दी कुमकुम लगाएं। पूजा की समाप्ति पर फल प्रसाद वितरण किया जाता है तथा इस कथा की एक प्रति उन्हें दी जाती है। केवल स्त्री ही नहीं अपितु पुरष भी यह पूजा कर सकते हैं। वे सुहागन या कुमारिका को आमंत्रित कर उन्हें हाथ में हल्दी कुंकुं प्रदान करें तथा व्रत कथा की एक प्रति देकर उन्हें प्रणाम करें। पुरुषों को भी इस व्रत कथा को पढ़ना चाहिए। जिस दिन व्रत हो, उपवास करे, दूध, फलाहार करें। खाली पेट न रहे, रात को भोजन से पहले देवी को भोग लगाएं एवं परिवार के साथ भोजन करें।

 



रात को फिर देवी की पूजा करें मिष्ठान का भोग लगाएं तथा गो माता के लिए भी अन्न रखें और दूसरे दिन सुबह गो माता को उनका भाग अर्पित करें। इसके बाद परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर भोजन करें। दूसरे दिन सुबह स्नान कर के पेड़ के पत्तों को निकले और घर मे अलग अलग जगह रखें पानी को समुद्र, नदी, तालाब, कुँए या तुलसी की क्यारी में डाल दें। जिस जगह पूजा की हो वहाँ हल्दी कुमकुम छिड़क कर तीन बार प्रणाम करें।

इसी प्रकार महीने के हर गुरुवार को करें मार्गशीर्ष (अगहन) मास के चारों गुरुवार को इसी प्रकार पूजन करें। पद्मपुराण में कहा गया कि जो कोई जातक हर वर्ष श्री महालक्ष्मी जी का यह व्रत करेगा उसे सुख सम्पदा और धन आदि का लाभ होगा।

 

 

 



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