





कोई दिल की चोरी करता है तो कोई नींद की। सत्ता, सुंदरी और शील हरण भी कोई कम नहीं हो रहा है। धन, विद्या, कला, संगीत, ज्ञान, विज्ञान के अलावा भी अनेक प्रकार की चोरियां हैं, जिन्हें हम नहीं जानते, बेखौफ हो रही है। इसी संदर्भ में पेश है छत्तीसगढ़ी आलेख....


चुनाव : नारद जी के भारत दौरा
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे
समवेत्ता युयुत्सव:।
मामका: पांडवाश्चैव,
किम कुर्वत संजय:।।
परमानंद वर्मा
कुरुक्षेत्र के मैदान में जिस प्रकार चुनाव रिपोर्टिंग संजय नामक पत्रकार करते थे और प्रतिदिन की खबर धृतराष्ट्र को सुनाया करते थे। उसी प्रकार की रिपोर्टिंग देवर्षि नारद जी अभी कर रहे हैं। भारत और अमेरिका में हो रहे चुनाव और नेताओं की गतिविधियों की जानकारी भगवान शिव और लक्ष्मीनारायण को दे रहे हैं। उनके निर्देश पर ही भारत भ्रमण कर रहे हैं और जिन निर्वाचन क्षेत्रों में विशेष दंगल व टकराहट की स्थिति है वहां उनके कैमरामेन और रिपोर्टर तैनात है। इसी संदर्भ में पढिय़े यह छत्तीसगढ़ी आलेख...
बोलो सटक नरायण
बोलो सटक नरायन
गोविन्द के गुन गाना जी
बोलो सटक नरायण
गोविन्द बोलो हरि गोपाल बोलो
राधा रमन हरि गोपाल बोलो...
नारद मुनि महाराज हाथ मं करताल अउ बीना धरे, बजावत झुलपाहा बड़े-बड़े चूंदी अउ बीता भर दाढ़ी, मुड़ी ल मटकावत, पांव में खड़ऊ पहिने, पता नहीं, कोन कोती ले किंजरत मोर दुकान कोती आवत रिहिसे। जनम के बड़ा गियानी अउ भक्त सही जब ओ महराज मोर दुआरी मेर अइस तब घोलन के साष्टांग, दंडासरन पांव परेंव।
खुसी राह बेटा, चिरंजीवी भव काहत आसिरवाद दीस। ओला मोर दुकान मं गद्दी मं बइठारेंव। ओहर पूछथे- तोर सियनहा, नइ दीखत हे बाबू, कहूं गेहे का?
ओला बताथौं- महाराज के बछर होगे ओला गुजरे। मोला सुरता आवत हे, नानपन के रेहेंव, पढ़े बर इस्कूल जात रेहेंव तबके तोला देखें हौं। के बछर बाद तोर आगमन होवथे?
हां बेटा, तैं सही काहत हस। कइसे करबे साधु-जोगी मन तो नदिया-नरवा के पानी कस तो आन, आज इहां तो काल उहां। का ठिकान हमर मन के?
सियान गुजरगे कइके बतावत हस तउन ल सुनके बड़ दुख लगिसे। संत बरोबर रिहिसे हे सेठ हा।
त पहाटिया ल बलावौं महाराज जेवन पानी के बेवस्था करही। तैं ठहरथस तउन खोली खाली हे?
गरमी बहुत परत हे बेटा, लस्सी, नइते अउ कोनो ठंडई के बेवस्था हो जाए, तेला कर दे। हौ महराज काहत सतानंद ल हुद कराके बलाथौं अउ मोला बड़े गिलासभर लस्सी बनाके लाय बर केहेंव।
पूछथौं- कोन कोती ले तोर आगमन होवत हे महराज, धन हमर भाग, कोन कोती के पुन्न जागिस हे के हमर गांव मं, हमर घर-दुकान मं तोर चरन परिस हे।
नौकर सुदामा ल कहिथौं- अरे जा तोर भउजी अउ बहू हा लोटा मं पानी अउ थारी धर के आही। महाराज के पांव पखारबो, चरनामृत लेबो। मुड़ ढाके सेठानी अउ मोर बहू आथे, सबो झन पांव पखारेन, चरनामृत लेन अउ दछिना घला देना।

सतानंद गिलास भर ठंडई डार के लाय रिहिसे तउन लस्सी ल खखाय, भुखाय बरोबर नारद मुनि सपा-सप गटकगे। दाढ़ी अउ मेंछा मं हाथ फेरत कहिथे- आह... अब थोकिन शांत लगिस बेटा।
पूछथौं- कोन कोती ले आवत हस महाराज, कइसे हमर गांव कोती के तोला सुधि अइस?
देख बेटा- साधु, महात्मा अउ भगवान के तो एक ओकर से आय-जाय के कारन नइ पूछे जाय, ओमन आथे तेमा कलियान के बात समाय होथे?
-गलती होगे महराज- छोटे बुद्धि के हौं, क्षमा कर देहौ, अक्कल नइ पुरिस त पूछ परेंव।
कोनो बात नहीं बेटा- अब तैं जब पूछ परे हस तब तोला बतई देथौं। मंय कैलाश परवत ले बाबा भोलेनाथ अउ माई पारबती करा ले आवत हौं। ओकर पहिली बिसनूपुरी में रेहेंव, तिहां भगवान लक्ष्मी-नारायण संग भेंट करेंव। तब उहू हा तोरे सही पूछ परिस- कहां ले आवत हौ नारद जी। बताएंव भोले बबा करा ले आवत हौं।
भगवान बिसनु ओकर मन के कुशलक्षेम पूछिस तब बताएंव- हां बने-बने हे महराज, फेर ओकर मन के चिंता धरती लोक मं बढ़त दुख-करलेस, अउ परेशानी मं जादा दिखिस।
- कइसे दुख, काकर परेशानी?
- कई ठन देश मं युद्ध माते हे, मरत-कटत हे। रूस, यूक्रेन, इजराइल, ईरान, लेबनान। नान-नान लोग लइका, माईलोगिन बिना मौत के मौत मारे जात हे। भारत मं तो गदर माते हे, चुनावी युद्ध चलत हे। अइसे लगत हे जइसे कुरुक्षेत्र के मैदान हे, अउ दूनो भाई कौरव-पांडव असन लड़त हे। समझ नइ परत हे कोन कौरव हे अउ कोन पांडव?उहां तो सत ईमान, धरम, इज्जत खुलेआम दांव मं लगत हे। कोन सती-सतवंतीन हे, तब कोन कोठा मं, चकलाघर मं बइठे किसबिन हे तइसे कस चरित्तर विधायक, सांसद, प्रतिनिधि अउ पारटी कार्यकर्ता मन होगे हे। सब बिकत हे, लड़त हे, मरत हें।
- अइसन नइ हो सकय नारद जी तैं मोर भारत देश के अपमान करत हस, जिहां निस-दिन गंगा-जमुना के निरमल धारा बोहावत हे, जेन भूमि मं श्रीकृष्ण जी गीता के गियान सुनइस ओ धरती के वासी मन के अतेक पतन हो जही, गिर जही- ये बात ल तोर पतियावौं नहीं। देवी लक्ष्मी नारादजी के बात ल सुनके खखुवागे अउ भगवान बिसनु ओकर तमतमाय तेवर ल देखिस तहां ले कहिथे- शांत हो देवी... शांत...।ओला बताथे- देवी लछमी, नारद जी, स्वर्ग लोक के मीडिया समूह के चीफ हे, ओकर खबर ओकर रिपोर्ट बीबीसी लंदन के खबर जइसे विश्वसनीय अउ अकाट्य होथे। तोला ओकर खबर अउ रिपोर्ट ऊपर भरसो नइहे तब तैं तोर भारत के कोनो विश्वसनीय न्यूज चैनल के संपादक, रिपोर्टर करा ले खबर के मगवी दरयाप्त कर ले। लछमी के सिंहासन मं बइठे के बाद नारदजी अउ बहुत कुछ चुनाव के खबर सुनइस जइसन आज तक के चुनाव मं नइ होय हे। सब पारटी वाले मन डरे हें, भस्मासुर जइसे राज चलत हे। अखबार, न्यूज चैनल के मालिक, संपादक, पत्रकार के मुंह बंद होगे हे, कलम सही खबर लिखना बंद कर देहे। सब इही काहत हे- राम ही राम हे, राम ही सत्य हे, राम ही भारत हे, राम मं ही कलियान हे। राम के छोड़ कोनो दूसर नांव नइ लेवत हे। लछमी-नारायन ल परनाम करत नारद जी बीना-करताल बजावत उहां ले खिसकते रिहिसे तब भगवान बिसनू पूछथे- कहां चले नारद जी, तब बताथे- अभी बड़का नेता मन के चुनाव प्रचार चलत हे। उलट-पुलट कपि लंका जारी कस काम चलत हे। लम्बा खरीद-फरोख्त चलत हे। ओकर रिपोर्टिंग करना हे।
बोलो सटक नरायन सटक नरायन
गोविंद के गुन गाना जी
बोलो सटक नरायन।

छोटे व बड़ों सबके लिए मर्यादाएं बनी हुई है, निर्धारित की गई है और उसी की सीमा के अंदर रहने से ही सदा, सर्वदा, सुख-शांति बनी रहती है। उल्लंघन करने पर हानि ही हानि है। लेकिन देखा यह जा रहा है कि नीतियों और मर्यादाओं का उल्लंघन करना आम हो गया है। कोई भी इसकी परवाह नहीं करता, यह सोचते हैं कि यह तो छोटी सी बात है, इसमें कोई बनने-बिगड़ने वाला नहीं है। बात छोटी-सी भले ही हो लेकिन यह क्यों भूल जाते हैं कि छोटी-सी दिखने वाली चीटीं विशालकाय शरीरधारी हाथी को भी पटखनी दे देता है। बांधों और सरोवरों को छोटा-सा समझने वाला छिद्र भी एक दिन उसे तोड़ देने का समर्थ रखता है। यह गलती भूल और अपराध कभी भी नहीं करना चाहिए, यह नहीं सोचना चाहिए कि इतनी-सी बात है- कह दिया, कर दिया तो इससे क्या होने और बिगड़ने वाला है। तत्क्षण तो दिखाई नहीं देता, बुद्धि समझ नहीं पाती लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होते हैं। जब वही बात बाद में बड़ी हो जाती है, विकराल रूप धारण कर लेती है तब स्थिति को संभालना मुश्किल हो जाता है। यह बात सही है कि छोटे, बच्चे, चंचल प्रवृत्ति के होते हैं और वे सदा छोटे ही बने रहना चाहते हैं, ठीक है, छोटे हैं, बने रहना चाहते हैं तो इसमें कोई गलत व बुरी बात नहीं है लेकिन छोटे-बड़ों का लिहाज भी कोई मायने रखता है। यह नहीं कि बड़े कुछ बोल नहीं रहे हैं ऐसी बात नहीं है। बड़े कुछ समझ व जानकर भी नजर अंदाज कर रहे हैं इसका मतलब यह नहीं है वे नासमझ हैं, मूर्ख हैं। उनकी बड़प्पन है, कुछ नहीं बोल रहे हैं लेकिन तुम्हारी गलतियां भूल और अपराध यही सजा का कारण बनता जाता है। मर्यादाओं की अवज्ञा बहुत बड़ा अराध है अक्षम्य है। बड़े चाहते भी नहीं हैं सजा देना लेकिन अपराध ही बहुत बड़ी सजा दे देता है।

ऐसी सजा कि पछताने व अफसोस करने को विवश कर देता है लेकिन तब होता क्या है जब चिड़िया चुग गई खेत। सीता जी जब पंचवटी में थी तब एक दिन उसकी नजर सोने की हिरण पर पड़ गई। राम जी से आग्रह करती है कि उसे वह पाना चाहती हैं, दिली इच्छा है। उसकी इच्छा को पूरी करने के लिए राम निकल पड़ते हैं। थोड़ी दूर जाने के बाद ऐसा लगता है कि राम जी किसी संकट में पड़ गए हैं, कराहने की आवाज आने लगती है, सीताजी लक्ष्मण को आदेशित करती है और कहती है लक्ष्मण लगता है तुम्हारे भैया किसी संकट में है। लक्ष्मण धनुष बाण लेकर निकलने से पहले पंचवटी के चारों ओर बाण से लकीर खींच देता है और कहता है- मेरे आते तक इस लकीर से बाहर भूलकर भी नहीं निकलना नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। इसके बाद वह चला जाता है। उसके जाते ही आगे क्या होता है यह कथा सभी जानते हैं और समझते हैं। तात्पर्य यह कि बात है तो छोटी-सी लकीर के बाहर नहीं निकलने का था। सीता जी ने उसे सामान्य समझकर नजर अंदाज कर दिया। इसकी सजा कितनी बड़ी मिली। द्रौपदी की गलती व अपराध छोटी नहीं थी, क्षम्य नहीं था। वाणी पर संयम न रखने के कारण कितनी लज्जाजनक स्थिति से गुजरना पड़ा। आखिरकार वही मुद्दा महाभारत का कारण बन गया। और आज तो स्थिति यह है कि कौन छोटा है कौन बड़ा, क्या होता है नियम कायदे और मर्यादाएं सभी उतारकर फेंक दिए हैं। हिजाब फेंक दिए हैं। खुल्लम-खुल्ला जो जी चाहे करने, बोलने , चलने, फिरने, पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने के लिए निकल पड़े हैं। इसका परिणाम चाहे जो हो देखा जाएगा। अपराध इस कदर बढ़ गए हैं कि रोकना असंभव हो गया है। पुलिस, वकील और जजों को फुर्सत ही नहीं प्रकरणों को निपटाने में। हमारी छोटी सी गलती, भूल और अपराध हमें किस मुकाम तक ले गई है, इसका कभी अंदाज भी नहीं था और आज नाहक सजा भुगत रहे हैं। थाने, कोर्ट में भटक रहे हैं।

बटकी म बासी जागे,

हिन्दू पंचांग का 9वां महीना अगहन (मार्गशीर्ष) धर्म कर्म की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना गया है। वैदिक मान्यताओं के अनुसार सभी माह में मार्गशीर्ष को विशेष महत्व प्रदान दिया गया है। मार्गशीर्ष में किए गए धार्मिक अनुष्ठानों, जप, तप और योग का जीवन में बहुत ही शुभ फल प्राप्त होता है। मार्गशीर्ष मास में अन्न का दान करना सर्वश्रेष्ठ पुण्य कर्म माना गया है। ऐसा करने पर हमारे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं। वहीं इस माह में नियमपूर्वक रहने से अच्छा स्वास्थ्य तो मिलता ही है, साथ में धार्मिक लाभ भी मिलता है। यही नहीं इस माह में आप धन की देवी मां लक्ष्मी को भी प्रसन्न कर सकते हैं इसके लिए आपको इस माह के हर गुरुवार को खास पूजा करनी होगी। क्या करना होगा इस दिन, आइए जानते हैं...
व्रत करें पदमपुराण में
यह व्रत गृहस्तजनों के लिए बताया गया है। इस पूजा को पति पत्नी मिलकर कर सकते हैं। अगर किसी कारण पूजा में बाधा आए तो औरों से पूजा करवा लेनी चाहिए पर खुद उपवास अवश्य करें। उस गुरुवार को गिनती में न लें। अगर किसी दूसरी पूजा का उपवास गुरुवार को आए तो भी यह पूजा की जा सकती है। दिन या रात में भी पूजा की जा सकती है। दिन में उपवास करें तथा रात में पूजा के बाद भोजन किया जा सकता है। इस व्रत कथा को सुनने के लिए अपने आसपड़ोस के लोगों को, रिश्तेदारो को तथा घर के लोगों को बुलाएं व्रत कथा को पढ़ते समय शान्ति तथा एकाग्रता रखें। गुरुवार को सुबह ब्रह्म मुहूर्त से ही माता लक्ष्मी की भक्तिभाव के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद उन्हें विशेष प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अगहन महीने के गुरुवारी पूजा में माता लक्ष्मी को प्रत्येक गुरुवार को अलग-अलग व्यंजनों का भोग लगाने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
स्थापना, विसर्जन व पूजा विधि
- एक दिन पूर्व ही घर को गोबर से लेप कर लें या फिर गीले कपड़े से पोछ लें।
- इसके बाद एक ऊँचे पीढ़े या चौकी पर या छोटे मेज पर बीच में थोड़े गेहूँ या चावल रख का एक साफ सुथरे ताँबे या पीतल के लोटे को पानी से भर कर चावल या गेहूँ पर रखें।
- पानी में सुपारी, कुछ पैसे और दुब (दूर्वा घास) डाले। ऊपर से लोटे में चारों तरफ पाँच तरह के पेड़ के पांच या सात पत्ते डाल कर बीचों बीच एक नारियल रखें।
- उस नारियल पर बाजार में उपलब्ध देवी के मुखोटे या चहरे को बांध या चिपका दें।
- लोटे पर हल्दी- कुमकुम लगाएं और साथ ही उस लोटे के गले में लोटे के हिसाब से लहंगा बाँध दें और नारियल के ऊपर एक छोटी चुनरी भी चढ़ा देवें।
- देवी की प्रतिमा या फोटो को पूर्व दिशा में मुँह करके या उत्तर दिशा में मुँह करके स्थापना करनी चाहिए।
- इस व्रत कथा की पुस्तक में जो फोटो हैं उसे भी सामने रखें तथा पूजा प्रारंभ करें
ऐसे करें पूजा अगहन मास के गुरुवार के दिन आठ सुहागनों या कुँवारी कन्याओं को आमंत्रित कर उन्हें सम्मान के साथ पीढा या आसान पर बिठाकर श्री महालक्ष्मी का रूप समझ कर हल्दी कुमकुम लगाएं। पूजा की समाप्ति पर फल प्रसाद वितरण किया जाता है तथा इस कथा की एक प्रति उन्हें दी जाती है। केवल स्त्री ही नहीं अपितु पुरष भी यह पूजा कर सकते हैं। वे सुहागन या कुमारिका को आमंत्रित कर उन्हें हाथ में हल्दी कुंकुं प्रदान करें तथा व्रत कथा की एक प्रति देकर उन्हें प्रणाम करें। पुरुषों को भी इस व्रत कथा को पढ़ना चाहिए। जिस दिन व्रत हो, उपवास करे, दूध, फलाहार करें। खाली पेट न रहे, रात को भोजन से पहले देवी को भोग लगाएं एवं परिवार के साथ भोजन करें।
रात को फिर देवी की पूजा करें मिष्ठान का भोग लगाएं तथा गो माता के लिए भी अन्न रखें और दूसरे दिन सुबह गो माता को उनका भाग अर्पित करें। इसके बाद परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर भोजन करें। दूसरे दिन सुबह स्नान कर के पेड़ के पत्तों को निकले और घर मे अलग अलग जगह रखें पानी को समुद्र, नदी, तालाब, कुँए या तुलसी की क्यारी में डाल दें। जिस जगह पूजा की हो वहाँ हल्दी कुमकुम छिड़क कर तीन बार प्रणाम करें।
इसी प्रकार महीने के हर गुरुवार को करें मार्गशीर्ष (अगहन) मास के चारों गुरुवार को इसी प्रकार पूजन करें। पद्मपुराण में कहा गया कि जो कोई जातक हर वर्ष श्री महालक्ष्मी जी का यह व्रत करेगा उसे सुख सम्पदा और धन आदि का लाभ होगा।