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हरी खाद बनेगी मिट्टी की संजीवनी, किसानों को कृषि विभाग की बड़ी सलाह

13-Apr-2026
रायपुर(शोर संदेश)। हरी खाद मिट्टी की उपजाऊ शक्ति, जैविक पदार्थ और नत्रजन (नाइट्रोजन) बढ़ाने के लिए उगाई जाने वाली दलहनी फसलें (जैसे- ढैंचा, सनई, मूंग, लोबिया) हैं, जिन्हें फूल आने से पहले खेत में ही जोतकर मिला दिया जाता है। यह मृदा की संरचना सुधारती है, नमी बनाए रखती है और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम कर लागत घटाती है। हरी खाद का उपयोग मिट्टी के लिए किसी जीवनदायिनी संजीवनी से कम नहीं है।
उर्वरता तेजी से घट रही धरती जो कभी सोना उगलती थी, आज थकान से बोझिल दिखने लगी है। रासायनिक उर्वरकों की अंधाधुंध दौड़ और लगातार सघन खेती ने मिट्टी की सेहत को भीतर तक कमजोर कर दिया है। ऐसे समय में कृषि विभाग ने किसानों के सामने एक सरल, सस्ता और टिकाऊ उपाय रखा है, हरी खाद, जो सिर्फ खेती नहीं, बल्कि धरती के पुनर्जन्म की कहानी लिख सकती है।
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे इस खरीफ सीजन से ही हरी खाद को अपनाएं। विभाग का मानना है कि बढ़ती जनसंख्या और घटते जोत रकबा के कारण किसान एक ही खेत पर बार-बार खेती करने को मजबूर हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता तेजी से घट रही है।
जैविक कार्बन और जरूरी पोषक तत्वों की कमी अब साफ दिखाई देने लगी है। हरी खाद केवल विकल्प नहीं, बल्कि टिकाऊ खेती की दिशा में निर्णायक कदम है। यह मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सस्ता और प्रभावी माध्यम है। आज जब खेती लागत के बोझ तले दब रही है और मिट्टी अपनी ताकत खो रही है, तब हरी खाद उम्मीद की वह हरियाली है जो धरती को फिर से जीवंत कर सकती है।
कृषि विभाग के अधिाकारियों ने बताया कि हरी खाद उन फसलों को कहा जाता है जिन्हें खेत में उगाकर हरी अवस्था में ही मिट्टी में मिला दिया जाता है। ढैंचा, सन, मूंग, उड़द, लोबिया, बरसीम जैसी दलहनी फसलें इसमें प्रमुख हैं। इनकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसान महंगे यूरिया से करता है। हरी खाद का उपयोग मिट्टी के लिए किसी जीवनदायिनी संजीवनी से कम नहीं है।
हरी खाद से मिट्टी में नाइट्रोजन की पूर्ति होती है, फास्फोरस की घुलनशीलता बढ़ती है, जिंक, आयरन, कॉपर जैसे सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है। इसके अलावा मिट्टी की संरचना में सुधार, भुरभुरापन, नमी धारण क्षमता में वृद्धि और खरपतवार व कीटों पर प्राकृतिक नियंत्रण भी मिलता है।
ढैंचा एक एकड़ में 55 से 60 किलो नाइट्रोजन देता है, जो करीब 3 बोरी यूरिया के बराबर है। इसके अलावा सनाई 45-50 किलो, बरसीम 48-50 किलो और लोबिया/ग्वारफली 22-30 किलो नाइट्रोजन प्रति एकड़ देती है।
सिंचित क्षेत्रों में मई में बुवाई करें, असिंचित क्षेत्रों में जून (वर्षा पूर्व) में बुवाई करें। 40-50 दिन बाद हरी अवस्था में ही जुताई कर मिट्टी में मिला दें। कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे इस पारंपरिक लेकिन वैज्ञानिक पद्धति को अपनाएं और अपनी मिट्टी, अपनी आय और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करें।



 

हरी खाद - मिट्टी की खोई उर्वरता बढ़ाने का प्राकृतिक समाधान

11-Apr-2026
रायपुर,  (शोर संदेश)।  हरी खाद - मिट्टी की खोई उर्वरता बढ़ाने का प्राकृतिक समाधानमिट्टी की घटती उर्वरता और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता को लेकर कृषि विभाग गंभीर दिखाई दे रहा है। जिसके बेहतर व समाधान के रूप में विभाग द्वारा सूरजपुर जिले के किसानों से, हरी खाद अपनाने का आह्वान किया है।
कृषि विभाग ने स्पष्ट किया है कि बढ़ती जनसंख्या और घटते जोत के कारण किसान एक ही भूमि पर सघन खेती करने को विवश हैं। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन एवं पोषक तत्वों की तेजी से गिरावट आ रही है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग और पशुधन में कमी के चलते गोबर खाद की उपलब्धता भी घटती जा रही है। ऐसी विषम परिस्थिति में मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने का सबसे सरल, सस्ता और टिकाऊ उपाय हरी खाद ही है। कृषि विभाग ने किसानों को हरी खाद अपनाने की सलाह देते हुए कहा कि यह न केवल मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सस्ता उपाय है, बल्कि टिकाऊ खेती की दिशा में एक निर्णायक कदम भी है।
हरी खाद (ग्रीन मेन्युर) उन फसलों को कहते हैं जिन्हें विशेष रूप से उगाकर हरी अवस्था में ही खेत में जुताई करके मिट्टी में मिला दिया जाता है। ये मुख्यतः दलहनी फसलें होती हैं जिनकी जड़ों में पाया जाने वाला राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करता है - वही काम जो किसान अब तक महंगे यूरिया से कराता आया है। हरी खाद की प्रमुख फसलों में ढैंचा, सन, मूंग, उड़द, लोबिया, चरोटा, ग्वारफली एवं बरसीम शामिल हैं।
हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है, फॉस्फोरस की घुलनशीलता बढ़ती है और जिंक, आयरन, कॉपर, मैग्नीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी सुलभ हो जाते हैं। मिट्टी की भौतिक संरचना सुधरती है, वह नरम और भुरभुरी बनती है तथा जल धारण क्षमता बढ़ने से सूखे में भी फसल को राहत मिलती है। इसके साथ ही खरपतवारों का  प्राकृतिक नियंत्रण होता है, लाभकारी मृदा जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है और आगामी फसल में कीट व रोग का प्रकोप घटता है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि रासायनिक खाद की जरूरत कम होने से किसान की उर्वरक लागत में उल्लेखनीय कमी आती है और आय में वृद्धि होती है।
जिला सूरजपुर के सहायक मृदा परीक्षण अधिकारी ने किसानों को हरी खाद के संबंध मे जानकारी देते हुए बताया कि ढैंचा सर्वाधिक प्रभावी हरी खाद फसल है जो प्रति एकड़ 55 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है, जो लगभग 120 से 130 किलोग्राम यूरिया यानी करीब तीन बोरी के बराबर है। सन से 45 से 50 किलोग्राम, बरसीम से 48 से 50 किलोग्राम तथा लोबिया एवं ग्वारफली से 22 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति एकड़ प्राप्त होती है।
कृषि विभाग द्वारा किसानों को सलाह दी है कि खरीफ सीजन में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर मई माह में छिड़काव विधि से बुवाई करें। असिंचित क्षेत्रों में वर्षा से पूर्व जून माह में बुवाई करें और जब फसल 40 से 50 दिन की हो जाए, तब उसे हरी अवस्था में ही जुताई करके मिट्टी में मिला दें। रबी सीजन के लिए बरसीम एवं रिजका की बुवाई अक्टूबर-नवम्बर में करें और बुवाई से 50 से 60 दिन बाद खेत में पलटें।
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे इस खरीफ सीजन से ही हरी खाद को अपनी खेती का अनिवार्य हिस्सा बनाएं। रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती लागत और घटती मृदा उर्वरता के इस दौर में हरी खाद न केवल किसान की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ भूमि भी सुरक्षित रखेगी। अधिक जानकारी के लिए किसान जिला कृषि कार्यालय एवं मृदा परीक्षण कार्यालय सूरजपुर से संपर्क कर सकते हैं।

 

 


एक जिला एक उत्पाद” योजना से बदली किसानों की तकदीर, अदरक खेती बनी मुनाफे का जरिया

08-Apr-2026
रायपुर,।  शोर संदेश  सरकार की “एक जिला एक उत्पाद” योजना अब धरातल पर किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही है। इसी क्रम में बालोद जिले के गुण्डरदेही विकासखंड अंतर्गत ग्राम बघमरा के युवा प्रगतिशील किसान आकाश चंद्राकर ने अदरक की खेती के माध्यम से सफलता की एक नई मिसाल प्रस्तुत की है।
पारंपरिक फसलों से आगे बढ़ते हुए आकाश चंद्राकर ने “एक जिला एक उत्पाद” योजना से प्रेरित होकर अपने लगभग ढाई एकड़ खेत में अदरक की खेती की शुरुआत की। वैज्ञानिक पद्धतियों और बेहतर प्रबंधन के साथ की गई इस खेती से उन्हें उत्कृष्ट उत्पादन प्राप्त हुआ। साथ ही बाजार में अदरक की अच्छी मांग के कारण उन्हें अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिला, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
किसानों को प्रोत्साहित करने और खेती की लागत को कम करने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ शासन के उद्यानिकी विभाग द्वारा राज्य पोषित मसाला क्षेत्र विस्तार कार्यक्रम के अंतर्गत आकाश चंद्राकर को लगभग 49 हजार रुपये का अनुदान प्रदान किया गया। इस वित्तीय सहयोग से उन्हें आधुनिक कृषि संसाधन जुटाने, गुणवत्तापूर्ण बीज एवं तकनीकों का उपयोग करने में सहायता मिली, जिसका सीधा लाभ उत्पादन और गुणवत्ता में दिखाई दिया।
आकाश चंद्राकर बताते हैं कि अदरक की खेती उनके लिए समृद्धि का नया द्वार बनकर आई है। शासन से प्राप्त अनुदान ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें बेहतर उत्पादन हासिल करने के लिए प्रेरित किया। उनका मानना है कि सही मार्गदर्शन और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है।
“एक जिला एक उत्पाद” के अंतर्गत अदरक को चयनित किए जाने के बाद जिले के अन्य किसान भी इस नगदी फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं। पारंपरिक फसलों की तुलना में अदरक से प्राप्त अधिक शुद्ध लाभ ने किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। जिला प्रशासन बालोद और उद्यानिकी विभाग द्वारा उपलब्ध कराई जा रही तकनीकी सलाह एवं अनुदान से खेती अब घाटे का सौदा नहीं, बल्कि लाभ का माध्यम बनती जा रही है।
चंद्राकर ने केंद्र एवं राज्य सरकार की किसान हितैषी नीतियों की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास जताया कि शासन की इस पहल से बालोद जिला अदरक उत्पादन के क्षेत्र में एक नई पहचान स्थापित करेगा।

आधुनिक तकनीक से बदली खेती की तस्वीर, ग्राफ्टेड बैंगन से किसान को बड़ा मुनाफा

08-Apr-2026
रायपुर,।  शोर संदेश छत्तीसगढ़ में कृषि को लाभकारी बनाने की दिशा में शासन की योजनाएं अब जमीन पर असर दिखाने लगी हैं। मुंगेली जिले के पथरिया विकासखंड अंतर्गत ग्राम खुटेरा के किसान बसदेव राजपूत ने आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर सीमित भूमि में उल्लेखनीय आय अर्जित कर एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
करीब 1.70 हेक्टेयर भूमि के स्वामी राजपूत ने अपनी कुल जमीन में से लगभग 1 एकड़ क्षेत्र में उद्यानिकी फसल के रूप में ग्राफ्टेड बैंगन की खेती की। उन्होंने परंपरागत खेती के बजाय ड्रिप इरिगेशन सिस्टम और प्लास्टिक मल्चिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाया, जिससे जल संरक्षण के साथ-साथ फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
शासन की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना वर्ष 2025-26 के अंतर्गत उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन के साथ लगभग 30 हजार रुपये का अनुदान भी प्राप्त हुआ। इस सहायता ने खेती की लागत को कम करने और आधुनिक संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया। राजपूत को प्रति एकड़ लगभग 130 क्विंटल बैंगन का उत्पादन प्राप्त हुआ। बाजार में 15 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम के थोक मूल्य पर फसल की बिक्री कर उन्होंने कुल लगभग 1 लाख 95 हजार रुपये की आय अर्जित की, जबकि उनकी कुल लागत लगभग 62 हजार रुपये रही। इस प्रकार उन्हें करीब 1 लाख 33 हजार रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ, जो पारंपरिक खेती की तुलना में कहीं अधिक है।
राजपूत का कहना है कि उन्नत तकनीकों के उपयोग से न केवल उत्पादन में वृद्धि हुई है, बल्कि कीट एवं रोग नियंत्रण भी पहले की अपेक्षा अधिक प्रभावी हुआ है। वर्तमान में उनकी फसल का उत्पादन जारी है और आगामी समय में 30 से 40 क्विंटल अतिरिक्त उत्पादन की संभावना है, जिससे उनकी आय में और वृद्धि होने की उम्मीद है।
उनकी सफलता से प्रेरित होकर आसपास के किसान भी अब ड्रिप इरिगेशन और आधुनिक खेती तकनीकों को अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं। इससे यह स्पष्ट है कि शासन की योजनाओं, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और किसान की मेहनत के समन्वय से कृषि को एक लाभकारी और टिकाऊ व्यवसाय के रूप में विकसित किया जा सकता है।


 

कुसुम की खेती के प्रति बालोद जिले के किसानों में बढ़ा रूझान

04-Apr-2026
रायपुर, 04 अप्रैल 2026 सरकार की तिलहन प्रोत्साहन योजनाओं और जिला प्रशासन के नीर चेतना अभियान का सकारात्मक असर अब बालोद के खेतों में दिखने लगा है। 
कृषि विभाग के कृषक चौपाल और फसल चक्र परिवर्तन के प्रति जागरूकता अभियान से प्रेरित होकर जिले के किसानों ने पारंपरिक खेती के साथ-साथ तिलहन उत्पादन, विशेषकर कुसुम की खेती की ओर कदम बढ़ाए हैं। 
कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण का परिणाम है कि बालोद जिले में जिस कुसुम की खेती का रकबा पहले शून्य था, वह इस वर्ष बढ़कर 157 हेक्टेयर तक पहुंच गया है। उन्नत बीजों का चयन, कतार पद्धति से बुआई और संतुलित उर्वरक प्रबंधन के कारण वर्तमान में फसल लाभदायक साबित हुआ है।
स्थानीय किसानों के अनुसार, कुसुम की खेती कई मायनों में फायदेमंद है, कम जल खपत, इसे बहुत ही सीमित सिंचाई की आवश्यकता होती है। यह फसल कम समय में तैयार हो जाती है और लागत भी न्यूनतम आती है। कुसुम की खेती मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने में सहायक मानी जाती है। मौसम अनुकूल रहने पर अच्छी पैदावार से किसानों की आय दोगुनी होने की प्रबल उम्मीद है। घरेलू तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से जिले के सभी विकासखंडों के 37 ग्रामों के 194 कृषकों ने पहली बार नवीन तिलहन फसल के रूप में कुसुम का प्रदर्शन लिया है। भविष्य में कुसुम की खेती के विस्तार हेतु बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। कुल कृषकों में से 79 कृषकों ने 101 हेक्टेयर क्षेत्र में बीज उत्पादन हेतु बीज निगम में पंजीयन कराया है। इससे आने वाले समय में जिले के किसानों को स्थानीय स्तर पर ही उन्नत बीज प्राप्त हो सकेंगे। साथ ही कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा खेतों का नियमित निरीक्षण और कीट प्रबंधन की जानकारी दी जा रही है, जिससे फसल की गुणवत्ता बेहतर बनी हुई है। बालोद जिले के किसानों का यह सामूहिक प्रयास अब आसपास के क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रहा है।

गुलाबों से चमकी किस्मत: सूरजपुर के किसान की सफलता की खुशबू

29-Mar-2026
सूरजपुर, ।  ( शोर संदेश ) यूं तो गुलाब हम सभी को बेहद पसंद होते हैं। गुलाब के विविध रंग बिना कुछ कहे ही मन को अपनी ओर खींच लेते हैं। उनकी मोहक आभा और कोमलता सहज ही मन में आकर्षण उत्पन्न कर देती है। शादी-विवाह, जन्मदिन, त्यौहार या किसी प्रियजन के चेहरे पर मुस्कान लानी हो — गुलाब का फूल या गुलदस्ता हमेशा पहली पसंद रहता है। इसी बढ़ती मांग को अवसर में बदलकर सूरजपुर जिले के ग्राम डुमरिया निवासी किसान भोला प्रसाद अग्रवाल ने आधुनिक खेती के माध्यम से सफलता की एक मिसाल कायम कर दी है।
गुलाबों से महकती सफलता: सूरजपुर के किसान की प्रेरक कहानी
पारंपरिक खेती से आधुनिक पॉलीहाउस तक वर्ष 2023 में उन्होंने परंपरागत खेती से हटकर उन्नत तकनीक अपनाने का निर्णय लिया और 2 एकड़ भूमि में 2 पॉलीहाउस स्थापित किए। करीब 1 करोड़ 20 लाख रुपये की लागत से तैयार इस परियोजना में लगभग 90 लाख रुपये बैंक ऋण, 30 लाख रुपये स्वयं की पूंजी तथा राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से 50% अनुदान प्राप्त हुआ। पॉलीहाउस में डच किस्म के लगभग 80 हजार गुलाब पौधे लगाए गए, जो नियंत्रित तापमान और उन्नत पोषण प्रबंधन के कारण सालभर उत्पादन देते हैं।
उल्लेखनीय है कि आज के समय में इस फार्म से प्रतिदिन औसतन 3 से 4 हजार गुलाब स्टिक का उत्पादन हो रहा है। तैयार फूलों की आपूर्ति बनारस, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के विभिन्न बाजारों में की जाती है। जिससे औसत मासिक आय 2 से 3 लाख रुपये तक होती है। इसमें  श्रमिक खर्च, खाद, उर्वरक व रखरखाव खर्चों के बाद भी यह खेती बेहद लाभकारी बनी हुई है और नियमित आमदनी का मजबूत स्रोत बन चुकी है।
किसान भोला प्रसाद अग्रवाल बताते हैं कि पारंपरिक खेती में मौसम पर निर्भरता अधिक रहती है, लेकिन इस पॉलीहाउस के आधुनिक तकनीक ने जोखिम कम कर दिया। नियंत्रित वातावरण के कारण फूलों की गुणवत्ता बेहतर रहती है और बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं।
अग्रवाल जिले के अन्य किसानों के लिए संदेश देते हुए कहते हैं कि “यदि किसान नई तकनीक अपनाए और शासन की योजनाओं का लाभ ले, तो खेती को भी उद्योग की तरह सफल बनाया जा सकता है।” आज उनकी खेती न केवल परिवार की आय बढ़ा रही है, बल्कि आसपास के लोगों को रोजगार भी दे रही है। आधुनिक खेती का यह मॉडल क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है। निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि सही योजना, तकनीक और मेहनत हो तो खेत भी उद्योग बन सकता है और फूल भी भविष्य बदल सकते हैं।

 


राष्ट्रीय बागवानी मिशन : किसान प्रमोद उद्यानिकी खेती से बना आत्मनिर्भर

28-Mar-2026
रायपुर ।  ( शोर संदेश ) राज्य सरकार प्रदेश में किसानों के आय को बढ़ाने के लिए उद्यानिकी की खेती को बढ़ावा दे रही है। इसी कड़ी में महासमुंद जिले के विकासखण्ड बागबाहरा अंतर्गत ग्राम करमापटपर (भदरसी) के किसान प्रमोद चंद्राकर ने सीमित भूमि संसाधनों के बावजूद राष्ट्रीय बागवानी मिशन के सहयोग, नवाचार और आधुनिक तकनीक व अपनी मेहनत से उद्यानिकी खेती में सफलता प्राप्त की है। वे उद्यानिकी फसलों के जरिए आत्मनिर्भर की ओर आगे बढ़ रहे है। 
किसान चंद्राकर बताते है कि उनके पास कुल 0.41 हेक्टेयर भूमि है, जो पहले पारंपरिक रूप से धान की खेती के लिए उपयोग में लाई जाती थी। इस पद्धति में लागत अधिक और उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता था। लेकिन समय के साथ उन्होंने खेती में बदलाव लाने का निर्णय लिया और उद्यानिकी फसलों की ओर कदम बढ़ाया।
उन्होंने ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीक को अपनाया, जिससे पानी की बचत के साथ-साथ फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में भी वृद्धि हुई। अब वे खरीफ और रबी दोनों सीजन में धनिया, प्याज और गेंदा फसलों की खेती कर रहे हैं। प्रमोद चंद्राकर बताते हैं कि उन्होंने धनिया की खेती से प्रति एकड़ लगभग 5 से 6 क्विंटल उत्पादन प्राप्त किया। इस उत्पादन से उन्हें प्रति एकड़ लगभग 50 हजार रुपये तक का मुनाफा हुआ। यह लाभ उन्हें इनपुट लागत, श्रमिक खर्च और अन्य सभी व्ययों को निकालने के बाद प्राप्त हुआ है। प्रमोद चंद्राकर की इस उपलब्धि से पूरे गांव के लोग प्रेरित हुए हैं। उनके मार्गदर्शन और अनुभव से प्रभावित होकर अन्य किसान भी अब उद्यानिकी फसलों की खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

 


ड्रेगन फ्रूट की उन्नत खेती से उमा शुक्ला एवं प्रकाश नारायण शुक्ला दंपत्ति को प्रति एकड़ 1.25 लाख रुपए की आमदनी

25-Mar-2026
रायपुर।  ( शोर संदेश )  महासमुंद जिले के बागबाहरा विकासखण्ड के ग्राम कुल्हरिया की कृषक उमा शुक्ला को राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत फल क्षेत्र विस्तार योजना से जुड़कर खेती के क्षेत्र में अच्छी सफलता मिली। शुक्ला बताती  है कि पूर्व में वे अपनी 1.62 हेक्टेयर भूमि पर पारंपरिक रूप से धान की खेती करती थीं, जिसमें औसतन 15 से 18 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन होता था और आय सीमित रहती थी। सिंचित रकबा 1.00 हेक्टेयर तथा असिंचित 0.60 हेक्टेयर होने के बावजूद पारंपरिक खेती से अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा था।
उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में शुक्ला दम्पति ने अपनी भूमि पर ड्रेगन फ्रूट की उन्नत खेती प्रारंभ की। उन्होंने आधुनिक तकनीकों को अपनाया, जिससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। शुक्ला बताती है कि ड्रेगन फ्रूट की खेती शुरू करने के बाद पहले ही वर्ष में उन्हें लगभग 40 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन प्राप्त हुआ, जिसे महासमुंद एवं बागबाहरा मंडी में लगभग 80 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से विक्रय किया। इससे उन्हें लगभग 1,25,000 रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई। वही पहले धान की खेती में प्रति एकड़ कुल आय सीमित थी और लागत निकालने के बाद लाभ बहुत कम रह जाता था। ड्रेगन फ्रूट की खेती में प्रारंभिक लागत अधिक होने के बावजूद बेहतर बाजार मूल्य और उत्पादन के कारण कुल लाभ में वृद्धि हुई है। उमा शुक्ला की इस सफलता ने आसपास के किसानों को भी प्रेरित किया है। उनके प्रयासों को देखकर अन्य कृषक भी पारंपरिक खेती छोड़कर उद्यानिकी फसलों की खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
 

रासायनिक उर्वरकों का कम उपयोग और प्राकृतिक व जैविक खेती को कर रहें प्रोत्साहित

23-Mar-2026
रायपुर,।  ( शोर संदेश )  मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और उत्पादन भी अच्छा मिलता है। इसके साथ ही उन्होंने अपनी खेती में ड्रिप इरिगेशन (ड्रिप सिस्टम) जैसी आधुनिक तकनीक को अपनाया है। इस तकनीक से पानी की बचत होती है और पौधों को सही मात्रा में पानी और पोषक तत्व मिलते हैं, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों बेहतर होती हैं।
छत्तीसगढ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बिलाईगढ़ विकासखंड के ग्राम जमगहन के युवा किसान रमेश प्रेमी आज आधुनिक और जैविक खेती के माध्यम से एक सफल किसान के रूप में पहचान बना चुके हैं। अपनी मेहनत, नई तकनीक और जैविक पद्धति से खेती करके आज एक मिसाल कायम की है। वर्तमान में वे लगभग 5 एकड़ भूमि में खेती कर रहे हैं और आय से खेती को और अधिक उन्नत करने का प्रयास कर रहे हैं। रमेश प्रेमी मुख्य रूप से सब्जी की खेती करते हैं। उनकी प्रमुख फसलें खीरा, लौकी, करेला, टमाटर और बैंगन हैं। इनमें भी वे सबसे अधिक करेला की खेती करते हैं, जिससे उन्हें अच्छा उत्पादन और मुनाफा मिलता है। इसके अलावा वे इंटरक्रॉपिंग पद्धति भी अपनाते हैं, जिसमें चना (बूट), प्याज, अदरक और हल्दी की खेती भी करते हैं। इससे उनकी जमीन का बेहतर उपयोग होता है और आय के अतिरिक्त स्रोत भी बनते हैं।
रमेश प्रेमी की खेती की सबसे खास बात यह है कि वे जैविक खेती को अधिक प्राथमिकता देते हैं। वे रासायनिक उर्वरकों का कम उपयोग करते हैं और प्राकृतिक व जैविक तरीकों से खेती करते हैं। रमेश प्रेमी को खेती में बिलाईगढ़ कृषि और उद्यानिकी विभाग से भी समय-समय पर सहयोग और मार्गदर्शन मिलता है। नई तकनीक और आधुनिक उपकरणों का उपयोग कर वे अपनी खेती को और अधिक उन्नत बना रहे हैं। उनकी खेती से न सिर्फ उन्हें आर्थिक लाभ मिल रहा है, बल्कि वे गांव में 10 ग्रामीण महिलाओं को पूरे साल रोजगार भी दे रहे हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है और गांव में रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं। 
युवा किसान रमेश प्रेमी ने बीफार्मेसी की पढ़ाई की है। पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ समय तक उन्होंने मेडिकल और हॉस्पिटल क्षेत्र में भी काम किया, लेकिन वर्ष 2016 से उन्होंने खेती को अपना मुख्य व्यवसाय बनाने का निर्णय लिया। कोरोना काल के बाद उन्होंने पूरी तरह से हॉस्पिटल का काम छोड़कर खेती में ही अपना पूरा समय देना शुरू कर दिया है। पढ़ाई से मेडिकल क्षेत्र से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने खेती को अपना कर यह साबित कर दिया कि यदि खेती वैज्ञानिक और नई तकनीकों के साथ की जाए तो यह किसी भी नौकरी से कम नहीं है। 
शुरुआत में लोगों को यह फैसला थोड़ा अटपटा लगा। रमेश प्रेमी बताते हैं कि ष्मैंने मेडिकल फील्ड की पढ़ाई की है, लेकिन मुझे लगा कि खेती में ज्यादा संभावनाएं हैं। कई किसान बिना पढ़ाई के भी अच्छी खेती कर रहे हैं, इसलिए मैंने सोचा कि अगर मैं पढ़ाई और नई तकनीक के साथ खेती करूं तो इससे बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। आज उसका परिणाम सामने है। ष्वे आगे युवाओं को संदेश देते हुए कहते हैं कि जैविक खेती और सब्जी उत्पादन के माध्यम से किसान अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं। यदि युवा आधुनिक तकनीक, मेहनत और सही मार्गदर्शन के साथ खेती करें तो यह एक सफल और सम्मानजनक व्यवसाय बन सकता है। खेती को यदि वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो यह एक बहुत अच्छा व्यवसाय बन सकता है। वे कहते हैं कि आज के समय में युवा वर्ग केवल नौकरी के पीछे भाग रहा है, जबकि खेती में भी अपार संभावनाएं हैं।
आज ग्राम जमगहन के युवा किसान रमेश प्रेमी अपनी मेहनत और नवाचार से न सिर्फ खुद सफल हो रहे हैं, बल्कि आसपास के किसानों और युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं। उनकी सफलता यह बताती है कि खेती में नई सोच और तकनीक के साथ काम किया जाए तो गांव में रहकर भी बेहतर भविष्य बनाया जा सकता है।
 

धान से मक्का की ओर बढ़ते कदम :फसलचक्र परिवर्तन से धमतरी के किसानों की बढ़ी आय, जल संरक्षण को मिली नई दिशा

20-Mar-2026
रायपुर  ( शोर संदेश ) कभी धान की पारंपरिक खेती के लिए पहचाने जाने वाला धमतरी जिला अब कृषि नवाचार की नई मिसाल बनता जा रहा है। यहां के किसान फसलचक्र परिवर्तन अपना कर कम पानी में अधिक लाभ देने वाली फसलों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। इस बदलाव ने न केवल खेती की तस्वीर बदली है, बल्कि किसानों की सोच और संसाधनों के उपयोग में भी सकारात्मक परिवर्तन लाया है।
जिला प्रशासन की दूरदर्शी पहल में फसलचक्र परिवर्तन को एक जन-अभियान का रूप दिया गया है। किसानों को जागरूक करने, प्रशिक्षण देने और निरंतर मार्गदर्शन उपलब्ध कराने के प्रयासों ने इस पहल को सफल बनाया है। कृषि विभाग की टीम ने गांव-गांव पहुंचकर किसानों से संवाद स्थापित किया, जिससे उनमें नई फसलों के प्रति विश्वास मजबूत हुआ।
ग्राम गट्टासिल्ली तालपारा के किसान रामप्रकाश नेताम इस परिवर्तन के प्रेरक उदाहरण हैं। पहले वे केवल धान की खेती करते थे, लेकिन अब 3.5 एकड़ में मक्का की खेती कर बेहतर उत्पादन और आय अर्जित कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से उन्होंने उन्नत तकनीकों, कीट प्रबंधन और फसल देखरेख के बेहतर तरीकों को अपनाया है, जिससे उनकी खेती अधिक लाभकारी बन गई है।
रामप्रकाश जैसे सैकड़ों किसानों ने मक्का सहित अन्य वैकल्पिक फसलों को अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार किया है। खेतों में लहराती मक्का की फसल इस सकारात्मक बदलाव की सजीव तस्वीर प्रस्तुत कर रही है। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ी है, बल्कि खेती का जोखिम भी कम हुआ है।
फसलचक्र परिवर्तन का पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहा है। कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों के कारण सिंचाई पर दबाव घटा है, जिससे जल संसाधनों का संरक्षण हो रहा है और भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद मिल रही है। साथ ही, विविध फसलों की खेती से भूमि की उर्वरता में भी सुधार हुआ है।
यह पहल केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों की आय को स्थायी और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है। धमतरी में फसलचक्र परिवर्तन अब एक सफल शासकीय मॉडल के रूप में उभर रहा है, जो आने वाले समय में पूरे प्रदेश के लिए कृषि नवाचार और सतत विकास का प्रेरणास्रोत बनेगा।



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