ब्रेकिंग न्यूज

किसान

Previous123456789...5253Next

डिजिटल क्रॉप सर्वे शुरू, मोबाइल एप से दर्ज होगी खेत और फसल की जानकारी

10-Sep-2026
मुंगेली: कलेक्टर अमृत विकास तोपनो के निर्देशानुसार जिले में डिजिटल क्रॉप सर्वे के माध्यम से गिरदावरी में दर्ज फसल एवं रकबे की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए मैदानी सत्यापन और रैंडम सत्यापन का कार्य लगातार जारी है। अब किसानों के खेतों का डेटा सीधे सैटेलाइट और मोबाइल ऐप से ऑनलाइन दर्ज किया जा रहा है। अभियान के तहत इस बार खरीफ सीजन की फसलों का सही रिकॉर्ड बनाने के लिए प्रशासन पूरी तरह तैयार है। इस डिजिटल सर्वे में लगे सर्वेयर खेतों में जाकर डिजिटल क्रॉप सर्वे किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि डीएससी के तहत फसल क्षेत्र और उत्पादन का सटीक आकलन करना कृषि योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता बढ़ाना तथा किसानों तक लक्षण सेवाओं की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करना है।
इसी क्रम में अतिरिक्त कलेक्टर निष्ठा पाण्डेय तिवारी एवं मुंगेली एसडीएम अजय शतरंज ने विकासखंड मुंगेली के ग्राम धरमपुरा सहित अन्य ग्रामों में चल रहे डिजिटल क्रॉप सर्वे कार्य का निरीक्षण किया। अधिकारियों ने मौके पर सर्वे की प्रगति का जायजा लेते हुए निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप कार्य की गुणवत्ता और शुद्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। जिले में शत-प्रतिशत एवं त्रुटिरहित, ई-गिरदावरी कार्य 30 सितंबर 2026 तक पूर्ण किया जाना है।
कलेक्टर के निर्देशानुसार डिजिटल क्रॉप सर्वे एवं गिरदावरी कार्य को समय-सीमा में पूर्ण कराने के लिए जिले में विभिन्न अधिकारी-कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है। अधिकारी-कर्मचारी मैदानी स्तर पर सर्वे कार्य की निगरानी के साथ-साथ दर्ज जानकारी की जांच एवं सत्यापन कर रहे हैं। जिला प्रशासन द्वारा डिजिटल क्रॉप सर्वे कार्य को निर्धारित समय-सीमा में पूर्ण करने के साथ सर्वे की गुणवत्ता, शुद्धता और मैदानी सत्यापन पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

हरियाली के साथ ग्रामीणों को रोजगार की नई राह दे रहा विकसित भारत - जीरामजी

08-Sep-2026
रायपुर ( शोर संदेश ) विकसित भारत - जीरामजी योजना ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन को नई दिशा दे रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में यह ग्रामीण परिवारों को गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराने के साथ ऐसे कार्यों को प्रोत्साहित कर रही है, जो भविष्य में भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के लिए उपयोगी साबित होंगे।
इसी सोच का प्रभाव कोण्डागांव जिले के जनपद पंचायत बड़ेराजपुर अंतर्गत ग्राम पंचायत बीरापारा के आश्रित ग्राम बावनपुरी में देखने को मिल रहा है। यहां समुदाय के लिए पंक्तिबद्ध मिश्रित वृक्षारोपण कार्य के तहत 5 हेक्टेयर क्षेत्र में 5,500 पौधों का रोपण किया गया है। इस कार्य के लिए वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग को क्रियान्वयन एजेंसी बनाया गया है।
बावनपुरी में संचालित वृक्षारोपण परियोजना के तहत लगभग 11 लाख रुपए की लागत से 2,667 मानव दिवस रोजगार का सृजन हुआ है। ग्रामीण श्रमिकों को 300 रुपये प्रतिदिन की दर से मजदूरी उपलब्ध कराई जा रही है। इससे ग्रामीण परिवारों को स्थानीय स्तर पर आय का साधन मिला है और रोजगार के लिए अन्य स्थानों पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी मदद मिल रही है। यह कार्य इस बात का उदाहरण है कि ग्रामीण रोजगार से जुड़े कार्यों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ जोड़कर एक साथ रोजगार, पर्यावरण और आजीविका को मजबूती दी जा सकती है।
मिश्रित वृक्षारोपण के अंतर्गत 13 प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। आने वाले वर्षों में इनके वृक्ष का रूप लेने से क्षेत्र में हरियाली का विस्तार होगा। साथ ही वृक्षारोपण मिट्टी एवं जल संरक्षण, जैव विविधता के संवर्धन तथा स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने में भी सहायक होगा। पौधों के संरक्षण एवं संवर्धन में ग्राम बावनपुरी की संयुक्त वन प्रबंधन समिति भी जनभागीदारी के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ग्रामीणों की सक्रिय सहभागिता से लगाए गए पौधों की देखरेख और संरक्षण को निरंतर बढ़ावा दिया जा रहा है।
शासन की मंशा के अनुरूप जिला प्रशासन द्वारा विकसित भारत - रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) के तहत ऐसे कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिनसे ग्रामीणों को उनके गांव में ही रोजगार मिल सके और स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग हो। वृक्षारोपण जैसे कार्य इस उद्देश्य को प्रभावी रूप से पूरा करते हुए ग्रामीणों को तत्काल रोजगार देने के साथ भविष्य के लिए उपयोगी प्राकृतिक संपदा भी तैयार कर रहे हैं।

जी-राम-जी योजना से ग्राम सपना में आजीविका डबरी बनी किसान की बहुउपयोगी परिसंपत्ति

07-Sep-2026
रायपुर(शोर संदेश) मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण के साथ आजीविका के नए अवसर विकसित करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का सकारात्मक असर अब गांवों में दिखाई देने लगा है। विकसित भारत जी-राम-जी योजना के तहत निर्मित आजीविका डबरी किसानों के लिए सिंचाई, खेती और मछली पालन जैसी गतिविधियों को एक साथ आगे बढ़ाने का आधार बन रही है। सरगुजा जिले के अम्बिकापुर विकासखंड के ग्राम पंचायत सपना के किसान जयलाल के लिए यह डबरी ऐसी ही बहुउपयोगी परिसंपत्ति बनकर सामने आई है।
किसान जयलाल ने बताया कि जी-राम-जी योजना के तहत उनके लिए आजीविका डबरी का निर्माण कराया गया है। बारिश के दौरान इसमें पानी एकत्र हो जाता है, जो लंबे समय तक उपलब्ध रहता है। आवश्यकता के अनुसार इसी पानी का उपयोग खेतों में सिंचाई के लिए किया जा रहा है। डबरी बनने से खेती के लिए पानी की व्यवस्था को लेकर पहले जैसी परेशानी नहीं रही और फसलों की सिंचाई करना आसान हुआ है।
जयलाल ने बताया कि आजीविका डबरी का उपयोग केवल सिंचाई तक सीमित नहीं है। उन्होंने डबरी में मछली पालन भी शुरू किया है। इसके साथ ही लगभग 50-60 डिसमिल भूमि में सेमी की खेती कर रहे हैं। इस प्रकार एक ही जल संरचना उनके लिए खेती की सिंचाई के साथ अतिरिक्त आय का साधन भी बन गई है।
उन्होंने बताया कि पहले खेती के लिए पानी की व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण था। बारिश के पानी को संरक्षित करने की सुविधा नहीं होने के कारण उपलब्ध जल का पूरा उपयोग नहीं हो पाता था। अब डबरी में संग्रहित पानी को जरूरत के समय खेतों तक पहुंचाकर सिंचाई की जा रही है। इससे खेती को नियमितता मिली है और मछली पालन के माध्यम से आय का अतिरिक्त जरिया भी विकसित हुआ है।
आजीविका डबरी ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण को आजीविका से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन रही है। वर्षा जल को स्थानीय स्तर पर संरक्षित करने से जहां किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो रहा है, वहीं उसी जल संरचना का उपयोग मछली पालन जैसी गतिविधियों के लिए भी किया जा रहा है।
ग्राम सपना के किसान जयलाल का अनुभव इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। डबरी के माध्यम से उन्हें खेती के लिए पानी की उपलब्धता के साथ अतिरिक्त आय का अवसर मिला है। इससे ग्रामीण परिसंपत्तियों के बहुउपयोग और स्थानीय स्तर पर आजीविका सुदृढ़ करने की दिशा में योजनाओं की उपयोगिता सामने आती है।
आजीविका डबरी से मिली सुविधा पर खुशी जाहिर करते हुए किसान जयलाल ने कहा, “डबरी बनने से सिंचाई की सुविधा हो गई है। खेती-बाड़ी करने में अब परेशानी नहीं होती। डबरी के पानी से खेतों की सिंचाई कर रहे हैं और मछली पालन भी कर रहे हैं।” उन्होंने आजीविका डबरी के निर्माण के लिए मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि डबरी से उन्हें खेती के लिए पानी मिला है और इसके माध्यम से वे खेती-बाड़ी के साथ मछली पालन कर अपनी आजीविका को बेहतर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा, “इसके लिए विष्णु भैया को बहुत-बहुत धन्यवाद।”
जी-राम-जी योजना के माध्यम से निर्मित आजीविका डबरी जल संरक्षण को ग्रामीण आजीविका से जोड़ने का प्रभावी उदाहरण बन रही है। ग्राम सपना में किसान जयलाल के लिए यह डबरी पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ खेती, सिंचाई और मछली पालन के जरिए आय के नए अवसरों का आधार बनी है।

पीएम किसान सम्मान निधि की बचत से खरीदी पहली गाय, आज 10 गायों के साथ आत्मनिर्भर बने 75 वर्षीय परशुराम गुप्ता’

05-Sep-2026
रायपुर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से संचालित प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना कई किसानों के लिए नई संभावनाओं का आधार बन रही है। ग्राम पंचायत महापल्ली के 75 वर्षीय किसान परशुराम गुप्ता ने भी योजना के तहत प्राप्त राशि को केवल दैनिक जरूरतों में खर्च करने के बजाय बचत कर गौ-पालन की शुरुआत की और आज वे सफलतापूर्वक अपना व्यवसाय संचालित कर रहे हैं। 
परशुराम गुप्ता ने वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत मिलने वाली दो-दो हजार रुपए की किस्तों को बचाकर लगभग 10 हजार रुपए की पूंजी जुटाई। इसी राशि से उन्होंने पहली गाय खरीदी और गौ-पालन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपनी आय और संसाधनों को बढ़ाते हुए एक-एक कर गायों की संख्या में वृद्धि की। आज उनके पास 10 गाय हैं और वे नियमित रूप से दूध उत्पादन कर रहे हैं। वर्तमान में गुप्ता प्रतिदिन लगभग 100 लीटर दूध बेचते हैं। वे दूध को स्थानीय डेयरी में 40 रुपए प्रति लीटर की दर से विक्रय करते हैं। इससे उनके गौ-पालन व्यवसाय का मासिक कारोबार लगभग 1 लाख 20 हजार रुपए तक पहुंच रहा है। खर्च निकालने के बाद होने वाली आय ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
75 वर्ष की आयु में भी परशुराम गुप्ता पूरी लगन के साथ गौ-सेवा और गौ-पालन से जुड़े हुए हैं। वे बताते हैं कि बचपन से ही उन्हें पशुपालन का शौक था और गायों की सेवा उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से प्राप्त राशि ने उन्हें अपने इस अनुभव और रुचि को आय के बेहतर माध्यम में बदलने की प्रारंभिक पूंजी उपलब्ध कराई।गुप्ता कहते है कि शासकीय योजनाओं से मिलने वाली छोटी-छोटी आर्थिक सहायता का योजनाबद्ध उपयोग कर ग्रामीण क्षेत्र के किसान आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा सकते हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की राशि से शुरू हुआ उनका छोटा प्रयास आज एक सफल गौ-पालन व्यवसाय के रूप में विकसित हो चुका है। यदि अनुभव, मेहनत और उपलब्ध संसाधनों का सही दिशा में उपयोग किया जाए तो उम्र कभी भी आत्मनिर्भर बनने की राह में बाधा नहीं बनती।
 

’धान से गेंदा की खेती की ओर बढ़े आनंद राम, 0.400 हेक्टेयर में कमाया 3.96 लाख रुपए’

05-Sep-2026
रायपुर(शोर संदेश) धान की खेती करने वाले किसान आनंद राम ने उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन और एनएचएम गेंदा क्षेत्र विस्तार योजना का लाभ लेते हुए 0.400 हेक्टेयर क्षेत्र में गेंदा फूल की खेती की। इससे उन्हें लगभग 44 क्विंटल गेंदा फूल का उत्पादन प्राप्त हुआ और बिक्री से 3 लाख 96 हजार रुपये की आय हुई।
लैलूंगा विकासखण्ड के ग्राम-कोड़केल निवासी किसान आनंद राम सिदार पहले अपने खेत में धान की खेती करते थे। 0.400 हेक्टेयर क्षेत्र में धान से उन्हें लगभग 10 क्विंटल उत्पादन प्राप्त होता था, जिसे बेचने पर करीब 31 हजार रुपये की आय होती थी। विभिन्न लागतों को घटाने के बाद उनका कुल लाभ लगभग 22 हजार रुपये रहता था। वर्ष 2025-26 में उद्यानिकी विभाग द्वारा किसान को गेंदा फूल की खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया। विभाग की आवश्यक तकनीकी जानकारी और मार्गदर्शन के आधार पर किसान ने अपने 0.400 हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र में गेंदा की खेती की। बेहतर प्रबंधन एवं देखरेख के परिणामस्वरूप उन्हें लगभग 44 क्विंटल गेंदा फूल का उत्पादन प्राप्त हुआ। उत्पाद की बिक्री से उन्हें 3 लाख 96 हजार रुपये प्राप्त हुए।
गेंदा की खेती में किसान को इनपुट लागत के रूप में लगभग 20 हजार रुपये, श्रमिक लागत 20 हजार रुपये तथा अन्य खर्च के रूप में करीब 15 हजार रुपये व्यय करना पड़ा। इस प्रकार कुल लागत लगभग 55 हजार रुपये रही। कुल बिक्री आय में से लागत घटाने के बाद किसान को लगभग 3 लाख 41 हजार रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। इस प्रकार परंपरागत धान की खेती से प्राप्त लगभग 22 हजार रुपये के लाभ की तुलना में गेंदा फूल की खेती से किसान की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
किसान आनंद राम सिदार की गेंदा खेती की सफलता को देखकर गांव के अन्य किसान भी प्रभावित हुए हैं। किसानों में अब पारंपरिक फसलों के साथ उद्यानिकी फसलों को अपनाने और अपनी आय बढ़ाने के प्रति रुचि बढ़ी है। कई किसान भविष्य में राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत गेंदा क्षेत्र विस्तार जैसी योजनाओं का लाभ लेने के इच्छुक हैं। अधिकारियोे ने बताया कि विभागीय योजनाओं का लाभ लेकर, तकनीकी मार्गदर्शन के साथ पारंपरिक खेती में विविधता लाकर किसान अपनी आमदनी में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

लौटते मानसून से फसलों को मिलेगा सहारा:अब तक 926 मिमी बारिश

03-Sep-2026
रायपुर। प्रदेश में इस साल मानसून और खेती कदमताल मिलाकर चल रहे हैं। समय पर मानसून आने और नियमित अंतराल में बारिश होने से खरीफ फसलों को जरूरत के मुताबिक पानी मिला। इसका असर बुआई पर भी दिखा है। 1 सितंबर तक प्रदेश में लक्ष्य के मुकाबले 98% बुआई पूरी हो चुकी है। अब फसलों को पकने के लिए सितंबर की बारिश अहम होगी।
मानसून का कोटा पूरा होने के लिए भी करीब 206 मिमी पानी की जरूरत है। प्रदेश में अब तक 926 मिमी बारिश हो चुकी है और इसका वितरण भी सामान्य है। अधिकांश जिलों में अच्छी बारिश हुई है। केवल पांच जिले कम बारिश की श्रेणी में हैं, जहां अधिकतम कमी करीब 40% है।
मौसम विज्ञानियों के मुताबिक लौटते मानसून से इतनी बारिश मिलने की संभावना है, इसलिए फिलहाल फसलों को लेकर ज्यादा चिंता की स्थिति नहीं है। कृषि विभाग ने इस खरीफ सीजन में 48.69 लाख हेक्टेयर में बुआई का लक्ष्य रखा था। इसमें 47.63 लाख हेक्टेयर में बुआई पूरी हो चुकी है।
आषाढ़ से शुरू होने वाली बुआई पूरे सावन चलती है। भादो लगने के बाद इसका काम लगभग थम जाता है। प्रदेश में आमतौर पर 90 से 100 दिन में तैयार होने वाली फसलें लगाई जाती हैं।
गंगीय पश्चिम बंगाल, उत्तरी तटीय ओडिशा, झारखंड और उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी के आसपास निम्न दबाव का क्षेत्र सक्रिय है। इसके अलावा दक्षिण गुजरात से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ होते हुए द्रोणिका बनी है। इससे प्रदेश में बारिश की गतिविधियां जारी रहेंगी।
मौसम विभाग ने 2 सितंबर को कोरिया, बिलासपुर, कोरबा, बेमेतरा और राजनांदगांव में यलो अलर्ट जारी किया है। वहीं खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, कबीरधाम, मुंगेली, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही और मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर में ऑरेंज अलर्ट है। इन इलाकों में भारी से अति भारी बारिश की संभावना है।
 

 


करेले की उन्नत खेती से चमकी किसान नारायण प्रसाद वर्मा की किस्मत

03-Sep-2026
रायुपर (शोर संदेश) ।  पारंपरिक खेती से इतर आधुनिक तकनीकों और उद्यानिकी फसलों को अपनाने से किसानों की तकदीर बदल रही है। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के विकासखंड बागबाहरा अंतर्गत ग्राम टेंगराही के कृषक नारायण प्रसाद वर्मा ने इसे सच कर दिखाया है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के सहयोग से करेले की व्यावसायिक खेती अपनाकर वे न केवल अपनी आय दोगुनी कर चुके हैं, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन गए हैं।
युवा किसान की करेले की खेती से किस्मत चमक गई हैए जिसके तहत उन्हें लागत के हिसाब से अच्छा मुनाफा मिल रहा हैं, जिसके लिए वह कई सालों से करेले की खेती कर लाखों रुपए मुनाफा कमा रहे हैं
1.06 हेक्टेयर कृषि भूमि के मालिक वर्मा पहले केवल धान की पारंपरिक खेती करते थे, जिससे सीमित आय प्राप्त होती थी। आय बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने राष्ट्रीय बागवानी मिशन वर्ष 2025-26 के अंतर्गत सब्जी क्षेत्र विस्तार योजना का लाभ लिया। योजना के तहत शासन से उन्हें सब्जी क्षेत्र विस्तार हेतु 1 हेक्टेयर क्षेत्र में करेले की खेती के लिए 24,000 का अनुदान मिला। सपोर्ट सिस्टम स्थापना हेतु 0.50 हेक्टेयर क्षेत्र में सपोर्ट सिस्टम लगाने के लिए 5,000 की राशि सीधे डीबीटी (DBT) के माध्यम से उनके खाते में हस्तांतरित की गई।
वर्मा ने खेती में नवाचार करते हुए ड्रिप सिंचाई (टपक सिंचाई), प्लास्टिक मल्चिंग और आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग किया। इससे पानी की भारी बचत हुई और फसल की गुणवत्ता व उत्पादन में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई। उन्होंने बताया कि करेले की उन्नत और आधुनिक तकनीकों और मचान विधि से खेती करके किसान कम समय में लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। वर्मा ने बताया कि खेत में नमी बनाए रखने और खरपतवार रोकने के लिए मल्चिंग शीट और पानी की बचत के लिए ड्रिप इरिगेशन, टपका सिंचाई का उपयोग किया जाता है।
करेले की खेती कर रहे युवा किसान नारायण प्रसाद वर्मा ने बताया कि पहले हम पारंपरिक खेती करते थे, पर इसमें उन्हें अधिक मुनाफा नहीं हो पा रहा था। इसके बाद उन्होंने करेले की खेती की शुरुआत की, जिसमें उन्हें अच्छा मुनाफा हुआ। उन्होंने तकनीकी प्रबंधन और उचित देखरेख के कारण उन्हें प्रति एकड़ करेले की फसल से लगभग 12 टन उत्पादन हासिल हुआ। बाजार में फसल का सही मूल्य मिलने पर सभी लागत और खर्चों को निकालकर उन्हें एक लाख 7 हजार रूपए का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ है। इस सफलता से न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है, बल्कि कृषि के प्रति उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है।







 

बाड़ी से निकली समृद्धि की राह, सपनों को मिली नई उड़ान

02-Sep-2026
रायपुर (शोर संदेश) कभी गांव की सीमित जमीन सिर्फ घरेलू जरूरतों तक सीमित रहती थी, लेकिन जब मेहनत को सही दिशा और अवसर मिला तो वही बाड़ी परिवार की आर्थिक समृद्धि का जरिया बन गई। कोरबा जिले के ग्राम बेला की अंजना भगत ने अपनी मेहनत, सीखने की लगन और स्वसहायता समूह से मिले सहयोग से सब्जी उत्पादन को आजीविका का मजबूत साधन बनाया है। उनकी सफलता का सफर अब उन्हें ‘लखपति दीदी’ की पहचान तक ले आया है।
अंजना भगत वर्ष 2017 से ‘बिहान’ (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) से जुड़ी हुई हैं। वे ‘सहेली स्वसहायता समूह’ की सदस्य हैं। समूह में कुल 13 महिलाएं शामिल हैं। समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ते हुए सब्जी उत्पादन में ड्रिप विधि को अपनाया। उन्होंने अपनी बाड़ी में बरबट्टी, लौकी और डोड़का जैसी सब्जियों की खेती शुरू की। ड्रिप विधि से खेती करने से बाड़ी में सब्जियों की देखभाल व्यवस्थित तरीके से होने लगी। वे नियमित रूप से फसल की देखरेख करती हैं और तैयार सब्जियों को स्थानीय बाजार में बेचकर आय अर्जित करती हैं। धीरे-धीरे सब्जी उत्पादन उनके परिवार की आमदनी का महत्वपूर्ण जरिया बन गया।
भगत की मेहनत का परिणाम आज उनकी आय में साफ दिखाई देता है। सब्जी उत्पादन और आजीविका गतिविधियों से उनकी वार्षिक आय लगभग 1.50 लाख रुपये तक पहुंच गई है। आर्थिक रूप से सशक्त बनने के साथ उन्होंने ‘लखपति दीदी’ बनने का गौरव हासिल किया है।
उन्होंने बताया कि ‘बिहान’ से जुड़ना उनके लिए बदलाव की शुरुआत रहा। स्वसहायता समूह के माध्यम से उन्हें आगे बढ़ने का हौसला मिला और अपनी मेहनत को स्वरोजगार से जोड़ने का अवसर मिला। आज उनकी बाड़ी में लहलहाती सब्जियां केवल फसल नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और बेहतर भविष्य की उम्मीद का प्रतीक हैं।
अंजना की सफलता यह दर्शाती है कि गांव की महिलाएं जब समूह की शक्ति और अपनी मेहनत को साथ लेकर आगे बढ़ती हैं, तो आत्मनिर्भरता का सपना हकीकत बन सकता है। उनकी उपलब्धि गांव की अन्य महिलाओं को भी आजीविका के नए अवसर अपनाने और आर्थिक रूप से सशक्त बनने के लिए प्रेरित कर रही है।
अपनी इस उपलब्धि के लिए उन्होंने ‘विष्णु भैया’ के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को आगे बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए मुख्यमंत्री द्वारा किए जा रहे प्रयासों से ग्रामीण महिलाओं को नई दिशा और अवसर मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि ‘विष्णु भैया’ के नेतृत्व में महिलाओं की मेहनत को सम्मान और आत्मनिर्भरता की नई पहचान मिल रही है।

‘नमो दीदी’ बनकर सीमा ने खेतों में तकनीक के साथ संवारा रोजगार

31-Aug-2026
रायपुर(शोर संदेश) ।  ड्रोन दीदी बनकर महिलाएं भर रही सफलता की नई उड़ानबिलासपुर के मस्तुरी विकासखंड के ग्राम पोड़ी की सीमा वर्मा आज आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रही हैं। ‘बिहान’ योजना से जुड़कर उन्होंने अपनी आजीविका को नई दिशा दी है। नमो दीदी ड्रोन योजना के तहत प्रशिक्षण प्राप्त कर अब ड्रोन दीदी के रूप में खेतों में आधुनिक तकनीक से कीटनाशक, नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का छिड़काव कर रही हैं।
सीमा वर्मा ने बताया कि ड्रोन संचालन के प्रशिक्षण के बाद उनके लिए रोजगार का एक नया अवसर खुला है। वे आसपास के किसानों के संपर्क में रहकर उनकी आवश्यकता के अनुसार खेतों में ड्रोन के माध्यम से कीटनाशक एवं नैनो उर्वरकों का छिड़काव करती हैं। इससे किसानों को कम समय में खेतों में छिड़काव की सुविधा मिल रही है और सीमा को भी इस कार्य से अच्छी आय प्राप्त हो रही है। आधुनिक तकनीक से जुड़कर काम करने से उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ा है। 
उन्होंने बताया कि ड्रोन से छिड़काव का कार्य उनके लिए आजीविका का बेहतर माध्यम बन गया है। इससे प्राप्त होने वाली अतिरिक्त आय से परिवार की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार आया है। पहले जहां आय के सीमित साधन थे, वहीं अब ड्रोन संचालन के साथ उन्होंने अपनी आमदनी बढ़ाने का नया रास्ता तैयार किया है। सीमा का कहना है कि ‘बिहान’ योजना और नमो दीदी ड्रोन योजना ने उन्हें आगे बढ़ने और आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है।
सीमा वर्मा केवल ड्रोन संचालन तक ही सीमित नहीं हैं। वे मशरूम उत्पादन का कार्य भी कर रही हैं। मशरूम उत्पादन के माध्यम से भी वे अतिरिक्त आमदनी अर्जित कर रही हैं। एक ओर वे किसानों के खेतों में ड्रोन से छिड़काव कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर मशरूम उत्पादन जैसी गतिविधियों से अपनी आजीविका को मजबूत कर रही हैं। इस तरह विभिन्न आजीविका गतिविधियों से जुड़कर वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। शासन की योजनाओं से मिले इस अवसर के लिए सीमा वर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया है।  
 

धान में लीफ फोल्डर एवं पीला तना छेदक कीट की निगरानी बढ़ाएं किसान: आईसीएआर-एनआईबीएसएम

28-Aug-2026
रायपुर(शोर संदेश)   छत्तीसगढ़ में धान की फसल अब लगभग 45 दिन या उससे अधिक की हो गई है। किसानों द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशियों का प्रयोग, निराई-गुड़ाई एवं अन्य कृषि कार्य पूरे किए जा चुके हैं। साथ ही संतुलित मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग से फसल की वृद्धि भी अच्छी हो रही है। आगामी दिनों में मौसम की परिस्थितियां धीरे-धीरे विभिन्न कीटों के प्रकोप के लिए अनुकूल हो सकती हैं। इनमें वर्तमान समय में लीफ फोल्डर (पत्ती मोड़क) तथा आगामी फसल अवस्था में पीला तना छेदक प्रमुख कीट हैं। इसे ध्यान में रखते हुए किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करने तथा आवश्यकता के अनुसार समेकित कीट प्रबंधन अपनाने की सलाह दी गई है।
आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान के निदेशक डॉ. पी. के. राय ने किसानों से फसल की नियमित निगरानी करने तथा कीटों की प्रारंभिक अवस्था में पहचान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि अनावश्यक एवं अंधाधुंध कीटनाशियों के प्रयोग से बचना चाहिए। “इस अवस्था में धान की फसल की नियमित निगरानी अत्यंत आवश्यक है। कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्तर तक पहुंचने पर ही आवश्यक नियंत्रण उपाय अपनाने से उत्पादन लागत कम करने के साथ-साथ मित्र कीटों एवं पर्यावरण का संरक्षण किया जा सकता है।”
डॉ. पंकज शर्मा, संयुक्त निदेशक ने बताया कि लीफ फोल्डर धान का प्रमुख कीट है। इसकी सूंडियां धान की पत्तियों को लंबाई में मोड़कर उनके अंदर रहकर हरे ऊतकों को खुरचकर खाती हैं। इससे पत्तियों पर सफेद धारियां दिखाई देती हैं और प्रकाश संश्लेषण की क्षमता प्रभावित होती है। अधिक प्रकोप की स्थिति में फसल की वृद्धि एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। किसानों को खेत में मुड़ी हुई पत्तियों, सूंडियों तथा पत्तियों पर दिखाई देने वाले विशिष्ट क्षति लक्षणों की नियमित जांच करनी चाहिए। कीट का प्रकोप अनुशंसित आर्थिक क्षति स्तर से अधिक होने पर ही उचित नियंत्रण उपाय अपनाएं।
डॉ. शर्मा ने बताया कि फसल के आगे बढ़ने के साथ पीला तना छेदक भी महत्वपूर्ण समस्या बन सकता है। इस कीट के भूरे रंग के अंड समूह प्रायः पत्ती के सिरे के पास दिखाई देते हैं। अंडों से निकलने वाली सूंडियां तने में प्रवेश कर अंदर के ऊतकों को नुकसान पहुंचाती हैं। वानस्पतिक अवस्था में इससे “डेड हार्ट” तथा बाद की अवस्था में “व्हाइट ईयर” (सफेद बालियां) के लक्षण दिखाई देते हैं। इसलिए प्रारंभिक अवस्था में इसकी पहचान एवं नियंत्रण महत्वपूर्ण है।
किसानों को नियमित रूप से खेतों की निगरानी करने, दिखाई देने वाले अंड समूहों को एकत्र कर नष्ट करने तथा वयस्क कीटों की निगरानी के लिए फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है। आवश्यकता के अनुसार ट्राइको-कार्ड  का उपयोग भी किया जा सकता है। प्रभावित एवं अत्यधिक क्षतिग्रस्त पौधों/कोंपलों को खेत से निकालकर नष्ट करने से भी कीट का प्रकोप कम किया जा सकता है। कीटनाशियों का प्रयोग केवल आवश्यकता होने पर, अनुशंसित दवा, उचित फसल अवस्था, लेबल एवं स्वीकृत मात्रा के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
डॉ. पी. के. राय ने कहा कि समेकित कीट प्रबंधन के अंतर्गत नियमित निगरानी एवं यांत्रिक उपाय, जैविक नियंत्रण, प्राकृतिक शत्रु कीटों का संरक्षण तथा आवश्यकता आधारित कीटनाशी प्रयोग को अपनाना धान में कीट प्रबंधन का प्रभावी एवं टिकाऊ तरीका है। किसानों को आगामी सप्ताहों में अपनी फसल की विशेष निगरानी करने तथा कीटों का असामान्य प्रकोप दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेने की आवश्यकता है।




















 

 



Feedback/Enquiry



Log In Your Account