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*छोटी सी बात की बड़ी सजा*

20-Jun-2024

छोटे व बड़ों सबके लिए मर्यादाएं बनी हुई है, निर्धारित की गई है और उसी की सीमा के अंदर रहने से ही सदा, सर्वदा, सुख-शांति बनी रहती है। उल्लंघन करने पर हानि ही हानि है। लेकिन देखा यह जा रहा है कि नीतियों और मर्यादाओं का उल्लंघन करना आम हो गया है। कोई भी इसकी परवाह नहीं करता, यह सोचते हैं कि यह तो छोटी सी बात है, इसमें कोई बनने-बिगड़ने वाला नहीं है। बात छोटी-सी भले ही हो लेकिन यह क्यों भूल जाते हैं कि छोटी-सी दिखने वाली चीटीं विशालकाय शरीरधारी हाथी को भी पटखनी दे देता है। बांधों और सरोवरों को छोटा-सा समझने वाला छिद्र भी एक दिन उसे तोड़ देने का समर्थ रखता है। यह गलती भूल और अपराध कभी भी नहीं करना चाहिए, यह नहीं सोचना चाहिए कि इतनी-सी बात है- कह दिया, कर दिया तो इससे क्या होने और बिगड़ने वाला है। तत्क्षण तो दिखाई नहीं देता, बुद्धि समझ नहीं पाती लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होते हैं। जब वही बात बाद में बड़ी हो जाती है, विकराल रूप धारण कर लेती है तब स्थिति को संभालना मुश्किल हो जाता है। यह बात सही है कि छोटे, बच्चे, चंचल प्रवृत्ति के होते हैं और वे सदा छोटे ही बने रहना चाहते हैं, ठीक है, छोटे हैं, बने रहना चाहते हैं तो इसमें कोई गलत व बुरी बात नहीं है लेकिन छोटे-बड़ों का लिहाज भी कोई मायने रखता है। यह नहीं  कि बड़े कुछ बोल नहीं रहे हैं ऐसी बात नहीं है। बड़े  कुछ समझ व जानकर भी नजर अंदाज कर रहे हैं इसका मतलब यह नहीं है वे नासमझ हैं, मूर्ख हैं। उनकी बड़प्पन है, कुछ नहीं बोल रहे हैं लेकिन तुम्हारी गलतियां भूल और अपराध यही सजा का कारण बनता जाता है। मर्यादाओं की अवज्ञा बहुत बड़ा अराध है अक्षम्य है। बड़े चाहते भी नहीं हैं सजा देना लेकिन अपराध ही बहुत बड़ी सजा दे देता है।

ऐसी सजा कि पछताने व अफसोस करने को विवश कर देता है लेकिन तब होता क्या है जब चिड़िया चुग गई खेत। सीता जी जब पंचवटी में थी तब एक दिन उसकी नजर सोने की हिरण पर पड़ गई। राम जी से आग्रह करती है कि उसे वह पाना चाहती हैं, दिली इच्छा है। उसकी इच्छा को पूरी करने के लिए राम निकल पड़ते हैं। थोड़ी दूर जाने के बाद ऐसा लगता है कि राम जी किसी संकट में पड़ गए हैं, कराहने की आवाज आने लगती है, सीताजी लक्ष्मण को आदेशित करती है और कहती है लक्ष्मण लगता है तुम्हारे भैया किसी संकट में है। लक्ष्मण धनुष बाण लेकर निकलने से पहले पंचवटी के चारों ओर बाण से लकीर खींच देता है और कहता है- मेरे आते तक इस लकीर से बाहर भूलकर भी नहीं निकलना नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। इसके बाद वह चला जाता है। उसके जाते ही आगे क्या होता है यह कथा सभी जानते हैं और समझते हैं। तात्पर्य यह कि बात है तो छोटी-सी लकीर के बाहर नहीं निकलने का था। सीता जी ने उसे सामान्य समझकर नजर अंदाज कर दिया। इसकी सजा कितनी बड़ी मिली। द्रौपदी की गलती व अपराध छोटी नहीं थी, क्षम्य नहीं था। वाणी पर संयम न रखने के कारण कितनी लज्जाजनक स्थिति से गुजरना पड़ा। आखिरकार वही मुद्दा महाभारत का कारण बन गया।  और आज तो स्थिति यह है कि कौन छोटा है कौन बड़ा, क्या होता है नियम कायदे और मर्यादाएं सभी  उतारकर फेंक दिए हैं। हिजाब फेंक दिए हैं। खुल्लम-खुल्ला जो जी चाहे करने, बोलने , चलने, फिरने, पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने के लिए निकल पड़े हैं। इसका परिणाम चाहे जो हो देखा जाएगा। अपराध इस कदर बढ़ गए हैं कि रोकना असंभव हो गया है। पुलिस, वकील और जजों को फुर्सत ही नहीं प्रकरणों को निपटाने में। हमारी छोटी सी गलती, भूल और अपराध हमें किस मुकाम तक ले गई है, इसका कभी अंदाज भी नहीं था और आज नाहक सजा भुगत रहे हैं। थाने, कोर्ट  में भटक रहे हैं।

 
~परमानंद वर्मा

 



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