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रमेन डेका ने जगन्नाथ मंदिर में किए दर्शन, प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना

20-Feb-2026
रायपुर, ।  ( शोर संदेश )   राज्यपाल रमेन डेका ने आज रायपुर के गायत्री नगर स्थित जगन्नाथ मंदिर पहुंचकर भगवान जगन्नाथ के दर्शन एवं पूजन कर देश एवं प्रदेश वासियों की सुख समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की। इस अवसर पर विधायक पुरंदर मिश्रा उपस्थित थे।
 

महाशिवरात्रि: त्रिशूल, चंद्र और सूर्य के दिव्य शृंगार में सजे बाबा महाकाल, उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

15-Feb-2026
नई दिल्ली।   ( शोर संदेश ) महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर बाबा महाकालेश्वर मंदिर शिवभक्ति के रंग में पूरी तरह सराबोर दिखाई दिया। ‘हर-हर महादेव’ के गगनभेदी जयघोष के बीच श्रद्धालुओं का सैलाब रात से ही दर्शन के लिए उमड़ पड़ा। मंदिर के बाहर लंबी कतारें लग गईं, वहीं मंदिर प्रशासन ने सुव्यवस्थित एवं सुलभ दर्शन सुनिश्चित करने के लिए विशेष व्यवस्थाएं कीं। प्रशासन के अनुमान के अनुसार, महाशिवरात्रि के इस महापर्व पर दस लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन पहुंच सकते हैं। श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह देखते ही बन रहा है।
इस अवसर पर बाबा महाकाल को दूल्हे के रूप में अलौकिक और दुर्लभ शृंगार में सजाया गया। माथे पर त्रिशूल और चंद्रमा को अर्पित करते हुए किया गया यह विशेष शृंगार वर्ष में केवल एक बार ही संपन्न होता है। मंदिर के पुजारी के अनुसार, यह शृंगार शिव-पार्वती के दिव्य विवाह और शिवत्व के सौम्य-उग्र संतुलन का प्रतीक माना जाता है। महाशिवरात्रि की इस आध्यात्मिक रात्रि में उज्जैन नगरी श्रद्धा, साधना और शिवमय चेतना का जीवंत प्रतीक बन गई है।
महाशिवरात्रि के अवसर पर एक पुजारी ने बताया कि “बाबा महाकाल के प्रांगण में शिव नवरात्रि और महाशिवरात्रि का उत्सव अत्यंत श्रद्धापूर्वक मनाया जा रहा है। लगातार 44 घंटे तक बाबा का दरबार भक्तों के लिए खुला रहेगा और भव्य तरीके से बाबा की भस्म आरती की गई है। भक्त आज बाबा पर दूध, दही और जल अर्पित कर सकते हैं और पूरे दिन बाबा का कपाट बंद नहीं होंगे और विशेष अनुष्ठान किए जाएंगे।”
उन्होंने आगे बताया, महाशिवरात्रि पर बाबा के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से भक्त आए हैं और पूरी सुरक्षा के साथ भक्तों को कतार के साथ बारी-बारी से दर्शन कराए जा रहे हैं। मंदिर में भीड़ सामान्य दिनों की तुलना में बहुत ज्यादा है। भक्त रात से ही लाइनों में लगे हैं और अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं।
आज के बाबा के विशेष अनुष्ठान को लेकर पुजारी ने कहा, “दूध, दही, और गंगाजल से बाबा का विशेष पंचामृत अभिषेक किया गया है और फलों के रस से भी स्नान कराया गया है। भांग से बाबा का विशेष शृंगार हुआ है और उनके माथे पर सेहरानुमा मुकुट और माथे पर त्रिशूल, चांद, और सूरज को अर्पित किया गया है। ये प्रतीक है कि दिन और रात सब कुछ उन्हीं का है, जिसके बाद बाबा का होल्कर का अभिषेक होगा। शाम के समय बाबा की विशेष पूजा होगी जो अगले दिन प्रात: काल तक चलेगी और बाबा को प्रकृति सेहरा अर्पित किया जाएगा। इसके साथ ही 16 फरवरी को भस्म आरती 12 बजे की जाएगी और ऐसा साल में एक बार ही किया जाता है।”
मंदिर प्रशासन की माने तो 15 फरवरी और 16 फरवरी को मंदिर में 10 लाख से ज्यादा भक्त दर्शन के लिए आ सकते हैं। सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करते हुए श्रद्धालुओं के लिए मेडिकल से लेकर सुलभ दर्शन की तैयारी हो चुकी है। ट्रैफिक भी डायवर्ट किया गया है और परिसर के अंदर से लेकर बाहर तक पुलिस बल की तैनाती भी बढ़ा दी है।




 

महाशिवरात्रि : वैराग्य और अनुराग के शाश्वत संगम की आलोकमयी महागाथा

15-Feb-2026
नई दिल्ली।   ( शोर संदेश ) महाशिवरात्रि का नाम सुनते ही मन में ऐसी रात्रि का बोध होता है, जहां अंधकार भय का नहीं, बल्कि गहन साधना और अंतर्मुखी चेतना का प्रतीक बन जाता है। यह वह रात्रि है जहां मौन, शब्दों से अधिक मुखर हो उठता है, और आत्मा शिवत्व की ओर एक शांत, दिव्य यात्रा पर अग्रसर हो जाती है। काल के कपाल पर अंकित वह क्षण अत्यंत विलक्षण था, जब समय ने स्वयं अपने प्रवाह से विराम लिया और अनंत ने साकार होने का संकल्प किया।
महाशिवरात्रि केवल एक तिथि नहीं, बल्कि चेतना की वह अलौकिक संधि है जहां जड़ ने चेतन को पहचान लिया, जहां वैराग्य ने अनुराग का वरण किया, और पुरुष–प्रकृति के महासंयोग ने शून्य को पूर्णता प्रदान की। हिमालय की धवल, तुषार-मंडित शिखाओं पर समाधिस्थ महादेव का जागरण, सती के पुनर्जन्म रूप पार्वती के तप, त्याग और अनन्य प्रतीक्षा का परम सुफल बना। यह कोई लौकिक विवाह नहीं, अपितु महाकाल और महाकाली के उस दिव्य मिलन की आलोकमयी महागाथा है, जिसने सृष्टि को उसका संतुलन, उसका स्पंदन और उसका शाश्वत अर्थ प्रदान किया।
हिमालय की श्वेत निस्तब्धता में कभी-कभी एक ऐसा क्षण उतरता है जब मौन भी मंत्र बन जाता है। वह क्षण समय की सामान्य धारा से परे होता है न दिन, न रात; न आरंभ, न अंत। वही क्षण है महाशिवरात्रि का जब शिव और पार्वती का दिव्य विवाह स्मृति से निकलकर अनुभव में बदल जाता है। यह केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि चेतना और शक्ति के मिलन का महाकाव्य है; वह संगम, जिसमें सृष्टि को संतुलन मिलता है और जीवन को अर्थ। महाशिवरात्रि की रात्रि अंधकार की नहीं, जागरण की रात्रि है। यह वह घड़ी है जब भीतर का शोर थमता है और आत्मा अपनी ही धड़कन सुन पाती है। यही वह रात है जब कैलाश पर दिव्य मंगल गूंजा था और ब्रह्मांड ने देखा था कि प्रेम केवल भाव नहीं, तप और समर्पण की परिणति है।
कैलाश कोई भौगोलिक शिखर भर नहीं; वह अस्तित्व का मेरुदंड है। वहां की बर्फ केवल शीतल नहीं वह शुद्ध है, निर्विकार है। उसी श्वेत शांति में विराजमान हैं शिव ध्यान में लीन, भस्म से विभूषित, जटाओं में गंगा को धारण किए हुए। उनका मौन शून्यता नहीं, सृजन की पूर्वपीठिका है। उनकी तीसरी आंख संहार नहीं, विवेक की ज्वाला है। शिव का वैराग्य पलायन नहीं; वह संसार को व्यापक दृष्टि से देखने की क्षमता है। वे श्मशानवासी हैं, क्योंकि वे मृत्यु को भी जीवन का अंग मानते हैं। वे नीलकंठ हैं, क्योंकि वे विष को पीकर अमृत बांटने का साहस रखते हैं। उनकी उपस्थिति सिखाती है त्याग भय नहीं, शक्ति है; मौन रिक्तता नहीं, संभावना है।
हिमालय की पुत्री पार्वती केवल सौंदर्य की प्रतिमा नहीं वे संकल्प की ज्योति हैं। उनका प्रेम अधीर नहीं; वह धैर्यवान हैं। उन्होंने शिव को पाने के लिए आकर्षण का मार्ग नहीं चुना; उन्होंने आत्मपरिष्कार का मार्ग चुना। कठोर तप, ऋतुओं का प्रहार, वन की नीरवता सबको सहते हुए उन्होंने अपने भीतर की दुर्बलताओं को गलाया और प्रेम को कुंदन बनाया। पार्वती का तप यह उद्घोष करता है कि सच्चा प्रेम अधिकार से नहीं, योग्यता से मिलता है। उन्होंने सिद्ध किया कि समर्पण कमजोरी नहीं, शक्ति है। उनका सौंदर्य रूप में नहीं, त्याग में झलकता है; उनका तेज आभूषणों में नहीं, आत्मबल में दमकता है।
जब कामदेव ने शिव की समाधि भंग करनी चाही, तब उनका भस्म होना प्रेम के विरुद्ध निर्णय नहीं था; वह प्रेम की शुद्धि का क्षण था। वासना शीघ्र परिणाम चाहती है, प्रेम प्रतीक्षा में परिपक्व होता है। उस दिन ब्रह्मांड ने सीखा कि शिव प्रेम के विरोधी नहीं, उसके रक्षक हैं। वे चाहते हैं कि प्रेम तपकर उज्ज्वल बने क्षणिक आकर्षण से ऊपर उठकर आत्मिक मिलन तक पहुंचे। पार्वती की साधना इस अग्नि-परीक्षा के बाद और दीप्त हो उठी। उनका धैर्य स्वयं मंत्र बन गया और शिव का मौन, स्वीकृति।
कहते हैं, एक दिन कैलाश की नीरवता में हल्की-सी मुस्कान तैर गई। शिव ने नेत्र खोले और देखा कि यह प्रेम उन्हें बांधने नहीं आया, बल्कि उनके वैराग्य को पूर्णता देने आया है। पार्वती ने शिव को संसार में नहीं खींचा; उन्होंने संसार को शिव के भीतर प्रतिष्ठित कर दिया। यही प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है जहां स्वत्व मिटता नहीं, विस्तृत होता है।
विवाह की तैयारी आरंभ हुई पर यह सांसारिक आडंबर का उत्सव नहीं था। हिमालय ने श्वेत वस्त्र धारण किए, दिशाओं ने पुष्पवृष्टि की, देवताओं ने मंगलगान किया। पर शिव की बारात अनोखी थी भूत, प्रेत, गण, औघड़, नाग। यह दृश्य समाज की परंपरागत दृष्टि को चुनौती देता है। शिव सबको स्वीकार करते हैं सुंदर को भी, विकृत को भी। उनके लिए किसी का बाह्य रूप निर्णायक नहीं; भाव ही प्रधान है। पार्वती के कुल में क्षणिक आशंका हुई, पर शीघ्र ही स्पष्ट हो गया कि यह विवाह बाह्य शोभा का नहीं, आंतरिक सत्य का है। जब शिव ने दिव्य रूप धारण किया, तब ब्रह्मांड ने देखा वैराग्य और वैभव विरोधी नहीं, एक ही सत्य के दो आयाम हैं।
विवाह का वह क्षण केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था। वह चेतना और शक्ति का आलिंगन था। शिव ने पार्वती का हाथ थामा और सृष्टि को गति मिली। शक्ति को दिशा मिली; दिशा को ऊर्जा। यह मिलन सिखाता है कि जीवन में न केवल ध्यान चाहिए, न केवल कर्म दोनों का संतुलन ही पूर्णता है। विवाह-मंडप में मंत्र गूंजे, पर उनसे अधिक मुखर था मौन। अग्नि साक्षी बनी और उस अग्नि में अहंकार, संशय, अलगाव सब भस्म हो गए। शेष बचा केवल एकत्व।
विवाह के बाद कैलाश पर एक अद्वितीय गृहस्थी का जन्म हुआ जहां योग और दायित्व साथ-साथ चलते हैं। शिव ध्यानस्थ रहते हैं, पर पार्वती के प्रति सजग भी। पार्वती गृहस्थी संभालती हैं, पर शिव के तप का सम्मान भी करती हैं। यहां प्रेम अधिकार नहीं, आश्रय है; संवाद शब्दों से नहीं, समझ से होता है। यह गृहस्थी आधुनिक समाज को भी संदेश देती है कि संबंध स्वतंत्रता को सीमित नहीं करते, उसे सुरक्षित करते हैं। प्रेम बांधता नहीं, विस्तृत करता है।
शिव-पार्वती का सर्वोच्च दार्शनिक रूप अर्धनारीश्वर है। आधा शिव, आधी पार्वती; पर सत्ता एक। यह रूप उद्घोष करता है कि पूर्णता किसी एक पक्ष में नहीं, समन्वय में है। पुरुष और स्त्री, तर्क और भावना, स्थिरता और गति सब परस्पर पूरक हैं। आज, जब समाज संतुलन और समानता की तलाश में है, यह दर्शन और भी प्रासंगिक हो उठता है। अर्धनारीश्वर केवल प्रतीक नहीं; वह जीवन-दृष्टि है।
महाशिवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि शिव कोई दूरस्थ देवता नहीं वे हमारे भीतर का विवेक हैं। पार्वती हमारे भीतर की संकल्प-शक्ति हैं। जब ये दोनों मिलते हैं, तभी जीवन में संतुलन उतरता है। इस रात्रि का उपवास केवल भोजन का नहीं, अहं का है। जागरण केवल नेत्रों का नहीं, चेतना का है। शिवलिंग पर अर्पित जल अहंकार का विसर्जन है; बेलपत्र त्रिगुणों का समर्पण। यदि इस पावन रात्रि में हम थोड़ा मौन साध लें, थोड़ा क्रोध त्याग दें, थोड़ा प्रेम जगा लें तो समझिए, हमारे भीतर भी वह दिव्य विवाह घटित हो गया।
आज का समय त्वरित आकर्षणों का है। संबंध क्षणभंगुर हैं, धैर्य दुर्लभ। ऐसे में शिव-पार्वती का विवाह हमें सिखाता है कि प्रेम केवल पाने की आकांक्षा नहीं है। योग्यता, प्रतीक्षा और सम्मान का नाम है। यह पर्व बताता है कि शक्ति और विवेक का संतुलन ही समाज को स्थायित्व देता है।
जब कैलाश पर उस अलौकिक विवाह की स्मृति जगती है, तो केवल अतीत नहीं गूंजता वर्तमान भी आलोकित होता है। महाशिवरात्रि हमें आमंत्रित करती है कि हम अपने भीतर के शिव को पहचानें, पार्वती को प्रतिष्ठित करें, और द्वैत से अद्वैत की यात्रा करें।ॐ नमः शिवाय यह केवल मंत्र नहीं जीवन की लय है, संतुलन का संगीत है, और प्रेम का शाश्वत आलोक।
 

पीएम मोदी का गुजरात दौरा: सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के तहत आज शौर्य यात्रा में होंगे शामिल

11-Jan-2026
नई दिल्ली।  ( शोर संदेश ) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दौरे के दूसरे दिन आज रविवार को गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर में मनाए जा रहे ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के तहत शौर्य यात्रा में शामिल होंगे। उन्होंने रविवार को कहा कि सोमनाथ मंदिर शाश्वत दिव्यता का प्रतीक है और पीढ़ियों को मार्गदर्शन देता रहता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें शनिवार के कार्यक्रमों की कुछ झलकियों शामिल हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, “सोमनाथ शाश्वत दिव्यता का प्रतीक है। इसकी पवित्र उपस्थिति पीढ़ियों से लोगों का मार्गदर्शन करती आ रही है। शनिवार के कार्यक्रमों की कुछ झलकियां यहां शेयर की हैं, जिनमें ओंकार मंत्र का जाप और ड्रोन शो शामिल है।”
आपको बता दें, अपने गुजरात दौरे के पहले दिन शनिवार को प्रधानमंत्री मोदी सोमनाथ पहुंचे थे। आज रविवार को सोमनाथ में शंख सर्कल से शुरू होने वाली ‘शौर्य यात्रा’ में हिस्सा लेंगे। इस शौर्य यात्रा में 108 घोड़ों का एक प्रतीकात्मक मार्च होगा, जो वीरता और बलिदान का प्रतिनिधित्व करेगा। इसके बाद वह सुबह लगभग 10:15 बजे सोमनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगे। लगभग 11 बजे, वह सोमनाथ में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेंगे और उसे संबोधित करेंगे।
दोपहर करीब 2 बजे, प्रधानमंत्री मोदी राजकोट के मारवाड़ी विश्वविद्यालय में कच्छ और सौराष्ट्र क्षेत्र के लिए वाइब्रेंट गुजरात क्षेत्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे और इस अवसर पर जनसभा को संबोधित भी करेंगे। राजकोट से प्रधानमंत्री अहमदाबाद जाएंगे। शाम करीब 5:15 बजे महात्मा मंदिर मेट्रो स्टेशन पर, प्रधानमंत्री अहमदाबाद मेट्रो के दूसरे चरण के सेक्टर 10ए से महात्मा मंदिर तक के शेष हिस्से का उद्घाटन करेंगे। 

















 

पीएम मोदी का ब्लॉग: 1000 साल बाद भी अडिग खड़ा है सोमनाथ; विध्वंस नहीं, पुनरुत्थान की गाथा

05-Jan-2026
नई दिल्ली।  ( शोर संदेश ) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ब्लॉग में सोमनाथ मंदिर के विध्वंस और पुनरुत्थान की अद्भुत कहानी को स्मरण किया है, जो भारत की सभ्यतागत चेतना को परिभाषित करती है। वर्ष 1026 ईस्वी में, आज से ठीक एक हजार साल पहले, सोमनाथ का पहला विध्वंस हुआ था। लेकिन सहस्र वर्षों बाद आज भी सोमनाथ मंदिर अभूतपूर्व गौरव के साथ खड़ा है और यह सन्देश देता है कि आस्था को न तो मिटाया जा सकता है और न ही झुकाया जा सकता है।
पीएम मोदी ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि ‘सोमनाथ’ शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है…“सौराष्ट्रे सोमनाथं च…यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है।
शास्त्रों में ये भी कहा गया है कि सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है। दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था। वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है।
पीएम मोदी ने आगे लिखा, “साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुनर्निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे।”
पीएम मोदी ने पोस्ट में कहा कि सन् 1026 में, आज से लगभग एक हजार वर्ष पहले, सोमनाथ मंदिर पर पहला आक्रमण हुआ। उस समय के अत्याचार का उल्लेख कई ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है। इन्हें पढ़कर मन दुख से भर उठता है। हर जगह हिंसा और पीड़ा की छाप दिखाई देती है, जिसका दर्द आज भी महसूस किया जा सकता है। उस दौर में इस घटना का भारत और यहां के लोगों के मनोबल पर गहरा असर पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं था, बल्कि उसका आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व बहुत बड़ा था। वह लोगों को जोड़ता था और एक समृद्ध समाज का प्रतीक था। समुद्री व्यापारी इसकी समृद्धि की कहानियां दूर-दूर तक ले जाते थे। इतने हमलों और लंबे गुलामी काल के बावजूद सोमनाथ की कहानी केवल विनाश की नहीं है। यह हजार वर्षों से चले आ रहे भारतीय स्वाभिमान, आस्था और संघर्ष की कहानी है। सोमनाथ मंदिर पर हुए हर आक्रमण पर लोगों ने साहस दिखाया, बलिदान दिए और मंदिर को फिर से खड़ा किया। यही भारत की शक्ति है।
पीएम मोदी ने कहा कि महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं के भीतर सांस लेती रही। आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं, जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है। वह आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है। ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें। 1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे।
उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे।”
पीएम मोदी ने कहा कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे।
जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी। लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया। सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’, अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।”
जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः’ जैसे विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं।
अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। आज भी सोमनाथ के दर्शन से मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है। 1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है। जबकि, अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है। ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है।
पीएम ने ब्लॉग का समापन करते हुए लिखा, “अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है। जय सोमनाथ !”
 

सोमनाथ भारत माता की वीर संतानों के स्वाभिमान और अदम्य साहस की गाथा: पीएम मोदी

05-Jan-2026
नई दिल्ली।  ( शोर संदेश ) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ मंदिर के विध्वंस और पुनरुत्थान की उस ऐतिहासिक गाथा को स्मरण किया है, जो भारतीय सभ्यता की अमर चेतना और अटूट आस्था का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत माता की उन करोड़ों वीर संतानों के स्वाभिमान और अदम्य साहस की कहानी है, जिन्होंने हर चुनौती के बावजूद अपनी संस्कृति और सभ्यता को जीवित रखा।
प्रधानमंत्री ने अपने ब्लॉग पोस्ट में लिखा कि वर्ष 1026 में, आज से ठीक एक हजार वर्ष पहले, सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर पहला भीषण आक्रमण हुआ था। इस आक्रमण का उद्देश्य सिर्फ एक मंदिर को नष्ट करना नहीं था, बल्कि भारत की आस्था और सांस्कृतिक आत्मा को कुचलना था। इसके बावजूद सोमनाथ मंदिर बार-बार हुए हमलों के बाद भी हर बार पुनः खड़ा हुआ और आज भी पूरे गौरव के साथ अडिग है।
पीएम मोदी ने इस विषय पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर भी अपनी बात साझा की। उन्होंने लिखा, “जय सोमनाथ! वर्ष 2026 में आस्था की हमारी तीर्थस्थली सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। बार-बार हुए हमलों के बावजूद हमारा सोमनाथ मंदिर आज भी अडिग खड़ा है। सोमनाथ दरअसल भारत माता की उन करोड़ों वीर संतानों के स्वाभिमान और अदम्य साहस की गाथा है, जिनके लिए अपनी संस्कृति और सभ्यता सदैव सर्वोपरि रही है।”
गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख स्थान रखता है। शास्त्रों के अनुसार, इसके दर्शन से पापों से मुक्ति और आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है। अपने इसी गहरे आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व के कारण यह मंदिर इतिहास में कई बार विदेशी आक्रमणों का निशाना बना। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद द्वारा किए गए आक्रमण ने गहरी पीड़ा दी, लेकिन भारतीय चेतना को समाप्त नहीं कर सका।
प्रधानमंत्री ने अपने ब्लॉग में यह भी उल्लेख किया कि सोमनाथ की कहानी केवल विनाश की नहीं, बल्कि हजार वर्षों से चले आ रहे संघर्ष, बलिदान और पुनर्निर्माण की प्रेरक कथा है। यह मंदिर आज भी विश्व को यह संदेश देता है कि आस्था को न तो मिटाया जा सकता है और न ही झुकाया जा सकता है।
पीएम मोदी ने कहा कि 2026 में, पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष पूरे होने के बाद भी अडिग खड़ा सोमनाथ हमें यह प्रेरणा देता है कि यदि एक खंडित मंदिर फिर से उठ सकता है, तो भारत भी अपने प्राचीन गौरव के साथ पुनः विश्व को मार्ग दिखा सकता है। 

अयोध्या राम मंदिर की दूसरी वर्षगांठ आज, अमित शाह और सीएम योगी ने दी देशवासियों को शुभकामनाएं

31-Dec-2025
नई दिल्ली।  ( शोर संदेश ) अयोध्या के भव्य राम मंदिर की बुधवार को दूसरी वर्षगांठ मनाई जा रही है। इस खास मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देश व प्रदेशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, आज ही की शुभ तिथि पर दो वर्ष पूर्व 500 वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त हुई और मोदी जी ने श्री राम जन्मभूमि मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की। प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगाँठ की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।
उन्होंने आगे कहा कि प्रभु श्रीराम के आदर्शों और जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रतीक यह मंदिर धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष, सांस्कृतिक स्वाभिमान के लिए त्याग व विरासतों के संरक्षण के लिए बलिदान की अप्रतिम प्रेरणा बना रहेगा। इस पवित्र अवसर पर श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के सभी बलिदानियों को नमन करता हूँ।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा, “भारत की चेतना के उत्कर्ष की साक्षी बन रही अयोध्या नगरी में आज प्रभु श्री रामलला के नूतन विग्रह के प्राण-प्रतिष्ठा की द्वितीय वर्षगांठ का पावन दिन है। श्री राम जन्मभूमि मंदिर में श्री रामलला का विराजमान होना प्रतीक है कि सदियों के संघर्ष को समाप्ति मिली और वेदना को विराम मिला।”
सीएम योगी ने कहा कि हमारी तीन पीढ़ियों की साधना और संघर्ष, पूज्य साधु-संत गण के आशीर्वाद और 140 करोड़ देशवासियों के विश्वास की परिणति है कि आज हम इस पावन पल के साक्षी बन रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि आज प्रत्येक रामभक्त के हृदय में संतोष है।
 

146 करोड़ रू. की लागत से काशी की तर्ज पर बनेगा भव्य भोरमदेव कॉरिडोर

25-Dec-2025
रायपुर, ( शोर संदेश )।  केंद्र सरकार की स्वदेश दर्शन योजना 2.0 के तहत छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में 146 करोड़ रू. की लागत से भोरमदेव कॉरिडोर परियोजना का विकास किया जा रहा है। भूमिपूजन दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में प्रस्तावित है, जिसमें मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के साथ केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत शामिल होंगे। यह ऐतिहासिक निर्णय राज्य के पुरातात्विक और धार्मिक स्थलों को जोड़कर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करेगा।
भोरमदेव मंदिर के इतिहास में पहली बार वाटर ट्रीटमेंट जैसी आधुनिक पहल हो रही है। परियोजना के अंतर्गत मुख्य मंदिर परिसर समेत मड़वा महल, छेरकी महल, रामचुआ, सरोधा दादर तक कॉरिडोर का समग्र विकास होगा। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर 6 प्रवेश द्वार, पार्क, संग्रहालय, परिधि दीवारों का संवर्धन, बाउंड्री वॉल साज-सज्जा, बोरवेल से पेयजल, शेड, बिजली, ड्रेनेज और पौधरोपण की व्यवस्था की जाएगी। ऐतिहासिक तालाब का सौंदर्यीकरण किया जाएगा। सफाई, जल गुणवत्ता सुधार, किनारों पर हरित क्षेत्र, बैठने की जगह और पैदल पथ विकसित किए जाएंगे। भोरमदेव मंदिर आने वाले हजारों कांवड़ यात्रियों के लिए आधुनिक शेड का निर्माण किया जाएगा। शेडों में पेयजल, स्वच्छता, विश्राम की समुचित व्यवस्था होगी, जिससे श्रद्धालुओं को सुरक्षित और सुविधाजनक ठहराव मिल सकेगा। 
भोरमदेव कॉरिडोर परियोजना के पूर्ण होने पर धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन को नई गति मिलेगी, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार सृजित होंगे तथा क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। यह छत्तीसगढ़ की प्राचीन धरोहरों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़कर सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करेगी।


















 

भारत 8 से 13 दिसंबर तक यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र की करेगा मेज़बानी

08-Dec-2025
नई दिल्ली।  ( शोर संदेश ) भारत सरकार 8 से 13 दिसंबर 2025 तक नई दिल्ली में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र की मेज़बानी करने जा रही है। ऐतिहासिक लाल किला परिसर को इस आयोजन स्थल के रूप में चुना गया है, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। यह भारत की मूर्त और अमूर्त विरासत के एक ही छत के नीचे समागम का प्रतीक है।
अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा हेतु, यूनेस्को ने पेरिस में अपने 32वें आम सम्मेलन में 2003 कन्वेंशन को अपनाया था। अंतर-सरकारी समिति 2003 कन्वेंशन के लक्ष्यों को आगे बढ़ाती है और सदस्य देशों में इसके प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करती है। भारत तीन कार्यकालों तक यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति में कार्यरत रहा है। अब तक, 15 भारतीय तत्वों को यूनेस्को प्रतिनिधि सूची में शामिल किया जा चुका है।
यह पहली बार होगा, जब भारत आईसीएच समिति के सत्र की मेज़बानी करेगा और इस बैठक की अध्यक्षता यूनेस्को में भारत के स्थायी प्रतिनिधि विशाल वी. शर्मा करेंगे। यह आयोजन 2005 में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए 2003 कन्वेंशन के भारत द्वारा अनुसमर्थन की बीसवीं वर्षगांठ के मौके पर हो रहा है, जो जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण के लिए भारत की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
यूनेस्को की परिभाषा के अनुसार, अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में वे प्रथाएं, ज्ञान, अभिव्यक्तियां, वस्तुएं और स्थान शामिल हैं, जिन्हें समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान के हिस्से के रूप में देखते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह विरासत वक्त के साथ विकसित होती है, सांस्कृतिक पहचान को मज़बूत करती है और विविधता की सराहना करती है।
यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र की भारत द्वारा मेजबानी एक मील का पत्थर है, जो प्रतीकात्मक महत्व के साथ-साथ नेतृत्व के एक वास्तविक अवसर का भी मिश्रण है। विरासत के एक सशक्त ढ़ांचे और सांस्कृतिक विविधता के इतिहास के साथ, भारत अपने संरक्षण मॉडल को प्रदर्शित और साझा करने के लिए तैयार है। यह आयोजन भारत को अपनी जीवंत विरासत को उजागर करने, वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देने और वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के लिए अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण हेतु एक नए दृष्टिकोण को आकार देने का अवसर प्रदान करता है।
नई दिल्ली में अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र की सफलता यूनेस्को, भारत सरकार और भारत की सांस्कृतिक परंपराओं की जीवंतता पर सकारात्मक प्रभाव डालेगी। भारत की विरासत उसके लोगों के माध्यम से जीवित है, जो उसकी भाषाओं, कलाओं, रीति-रिवाजों, त्योहारों और विश्वास प्रणालियों में अभिव्यक्त होती है। इस वर्ष के सत्र की मेजबानी, भावी पीढ़ियों के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के प्रति भारत की सतत् प्रतिबद्धता को दर्शाती है। 



 

सोने-चांदी की चमक फीकी, निवेशकों में मची हलचल

28-Oct-2025
रायपुर ( शोर संदेश )  सप्ताह के पहले दिन सोने और चांदी के भाव में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। सोमवार को सोना ₹2,100 प्रति 10 ग्राम और चांदी ₹6,500 प्रति किलोग्राम सस्ती हो गई। अब रायपुर में सोना ₹1,25,000 प्रति 10 ग्राम और चांदी ₹1,50,000 प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंच गई है।
रायपुर सराफा एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष हरख मालू ने बताया कि पिछले कारोबारी सप्ताह के अंतिम दिन (शुक्रवार) को सोना ₹1,27,100 प्रति 10 ग्राम और चांदी ₹1,56,500 प्रति किलोग्राम थी। सोमवार को दोनों धातुओं में तेज गिरावट आई।
गिरावट के आंकड़े एक नजर
10 दिनों में सोना ₹63,800 सस्ता हुआ,18 अक्टूबर को भारत में 24 कैरेट 100 ग्राम सोने का भाव ₹13,08,600 था, जो 27 अक्टूबर को घटकर ₹12,44,800 रह गया।
10 दिनों में चांदी ₹17,000 सस्ती हुई,18 अक्टूबर को 1 किलो चांदी का भाव ₹1,72,000 था, जो अब घटकर ₹1,55,000 पर आ गया है।
सोने और चांदी की कीमतों में यह लगातार दूसरी बड़ी गिरावट है, जिससे निवेशकों और ज्वेलरी कारोबारियों में हलचल मच गई है।
 



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