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कर्म ही सच्ची पूजा का संदेश देता है श्रीमद्भागवत : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

11-Apr-2026
रायपुर (शोर संदेश)।  मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय राजधानी रायपुर के वीआईपी रोड स्थित श्रीराम मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में शामिल हुए। उन्होंने व्यास पीठ पर विराजमान हिमांशु कृष्ण भारद्वाज जी द्वारा कही जा रही श्रीमद्भागवत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री साय ने कहा कि श्रीमद्भागवत का मूल संदेश यही है कि कर्म ही सच्ची पूजा है। उन्होंने कहा कि हमें सच्चाई और निष्ठा के साथ अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहकर मानव जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।
मुख्यमंत्री साय ने श्रीराम मंदिर में भगवान के दर्शन कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की। मुख्यमंत्री साय ने श्रीमद्भागवत कथा में भगवान श्री कृष्ण की बाललीला के अंतर्गत माखनचोरी के प्रसंग का भक्तिभाव के साथ श्रवण किया। उल्लेखनीय है कि श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन श्री राम मंदिर परिसर में 6 अप्रैल से 12 अप्रैल तक किया जा रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कथा के समापन अवसर पर भगवान बांके बिहारीलाल की आरती-पूजन में भी शामिल हुए।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री साय ने कहा कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है।  उन्होंने कहा कि हमें दूसरों के लिए जीते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ प्रभु राम का ननिहाल और माता कौशल्या का मायका है। प्रभु श्री राम ने अपने वनवास का अधिकांश समय छत्तीसगढ़ में बिताया। उन्होंने कहा कि लगभग पांच हजार वर्ग किलोमीटर में फैला अबूझमाड़ का जंगल ही दंडकारण्य क्षेत्र है और शिवरीनारायण माता शबरी की पावन भूमि है। गुरु घासीदास जैसे महान संतों की जन्मभूमि होने के कारण छत्तीसगढ़ एक धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध प्रदेश है।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि ईश्वर के आशीर्वाद से आज छत्तीसगढ़ नक्सलमुक्त हो रहा है और निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। 
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा संचालित प्रभु रामलला दर्शन योजना के तहत छत्तीसगढ़ के श्रद्धालुओं को अयोध्याधाम के दर्शन कराए जा रहे हैं। अब तक लगभग 42 हजार भक्त रामलला के दर्शन कर चुके हैं तथा 5 हजार से अधिक बुजुर्गजन देश के विभिन्न तीर्थस्थलों के दर्शन कर चुके हैं।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि धर्मांतरण पर प्रभावी नियंत्रण के लिए छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य कानून लागू किया गया है। इस कानून के अंतर्गत देश के अन्य राज्यों की तुलना में कठोर प्रावधान किए गए हैं, जिससे निश्चित रूप से अवैध धर्मांतरण पर रोक लगेगी। उन्होंने कहा कि गौ माता के संरक्षण और संवर्धन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा सुरभि गौधाम योजना लागू की गई है, जिसके तहत गौधामों में गौमाता के लिए चारा सहित सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं।
इस अवसर पर कृषि मंत्री रामविचार नेताम, स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल, कौशल विकास मंत्री गुरु खुशवंत साहेब, विधायक पुरंदर मिश्रा, हिमांशु द्विवेदी, सुनील रामदास अग्रवाल सहित श्रीमद्भागवत कथा के आयोजक एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।
 

रामनवमी पर विशेष: प्रभु श्रीराम का जीवन मानवता के लिए एक शाश्वत आचार संहिता

27-Mar-2026
नई दिल्ली। ( शोर संदेश ) मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का जीवन केवल एक ऐतिहासिक आख्यान नहीं, बल्कि मानवता के लिए शाश्वत आचार-संहिता है। उनके व्यक्तित्व में त्याग, समरसता और अटूट कर्तव्यनिष्ठा का जो अद्वितीय संगम दिखाई देता है, वह विश्व इतिहास में विरल है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में रामनवमी ऐसा महापर्व है, जो केवल श्रीराम के अवतरण का उत्सव नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, सामाजिक संतुलन और आदर्श जीवन के पुनर्स्मरण का अवसर है।
यह पर्व उस आदर्श पुरुष की स्मृति को जीवंत करता है, जिसने अपने आचरण से सिद्ध किया कि मर्यादा का पालन करते हुए भी मनुष्य सर्वोच्च शिखरों को प्राप्त कर सकता है। श्रीराम का चरित्र धार्मिक आस्था से परे एक जीवंत दर्शन है, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तीनों के लिए मार्गदर्शक है। रामनवमी हमें केवल पूजा तक सीमित नहीं रखती, बल्कि सत्य, न्याय, त्याग और कर्तव्य जैसे मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा देती है। यही कारण है कि यह पर्व त्रेतायुग से लेकर आज तक समान रूप से प्रासंगिक बना हुआ है।
रामनवमी की आधारशिला उस महान कथा में निहित है, जिसे रामायण के रूप में जाना जाता है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित यह ग्रंथ भारतीय सभ्यता की आधार-रचना है, जबकि गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस ने इसे जन-जन तक पहुंचाया। रामकथा केवल एक राजकुमार के जीवन का वृत्तांत नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म, न्याय और अन्याय, त्याग और स्वार्थ के बीच संघर्ष की महागाथा है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें मानवीय भावनाओं का अत्यंत सजीव और सार्वकालिक चित्रण मिलता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रामलीला, कथा-वाचन और भक्ति-परंपराओं के माध्यम से इसका सतत प्रवाह यह सिद्ध करता है कि श्रीराम भारतीय संस्कृति के जीवंत प्रतीक हैं। रामनवमी इस परंपरा का उत्कर्ष बिंदु है, जहां इतिहास, आस्था और लोकजीवन एकाकार हो जाते हैं।
‘राम’ केवल एक व्यक्तिवाचक संज्ञा नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक अवधारणा है। संस्कृत की ‘रम्’ धातु से निर्मित ‘राम’ का अर्थ है,जिसमें साधक रमण करे। इस दृष्टि से राम कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि वह चेतना हैं, जो प्रत्येक मनुष्य के भीतर विद्यमान है। जब व्यक्ति अपने भीतर सत्य, करुणा और न्याय के तत्वों को जागृत करता है, तभी ‘रामत्व’ प्रकट होता है। अतः रामनवमी का वास्तविक अर्थ बाहरी उत्सव से अधिक आंतरिक जागरण है अहंकार, क्रोध और मोह का परित्याग कर मर्यादा और सत्य के मार्ग पर अग्रसर होने का।
धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीराम भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं, जिनका अवतरण धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए हुआ। यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत सिद्धांत है कि अन्याय के विरुद्ध सत्य की विजय निश्चित होती है। रामनवमी इस विश्वास को सुदृढ़ करती है कि जब-जब समाज में अनाचार बढ़ता है, तब-तब धर्म के आदर्श पुनः प्रकट होकर मानवता को दिशा देते हैं।
श्रीराम के जीवन का सबसे उज्ज्वल पक्ष उनका त्याग और कर्तव्यनिष्ठा है। जहां इतिहास में सत्ता के लिए संघर्ष सामान्य रहा है, वहीं श्रीराम ने पिता के वचन की रक्षा हेतु राज्य, वैभव और सुख-सुविधाओं का त्याग कर वनवास स्वीकार किया। “रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाए” यह केवल एक उक्ति नहीं, बल्कि उनके जीवन का सार है। आज के स्वार्थ प्रधान युग में यह आदर्श हमें सिखाता है कि सच्ची महानता व्यक्तिगत लाभ में नहीं, बल्कि कर्तव्य और समर्पण में निहित होती है।
श्रीराम का जीवन सामाजिक समावेशिता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। केवट को सखा मानना, शबरी के प्रेम को स्वीकार करना और वानर-भालू समाज को साथ लेकर चलना ये सभी प्रसंग सामाजिक समानता के जीवंत प्रतीक हैं। रामनवमी हमें यह संदेश देती है कि सशक्त समाज वही है, जहां सभी वर्गों को समान सम्मान और अवसर प्राप्त हों।
श्रीराम केवल वीरता और नीति के प्रतीक नहीं, बल्कि करुणा और संवेदनशीलता के भी आदर्श हैं। निषादराज, शबरी और विभीषण के प्रति उनका व्यवहार यह दर्शाता है कि उनके लिए प्रेम और सहानुभूति ही सर्वोच्च धर्म थे। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि समाज का वास्तविक विकास शक्ति से नहीं, बल्कि संवेदना और मानवता से संभव है।
भारतीय चिंतन में ‘रामराज्य’ आदर्श शासन-व्यवस्था का प्रतीक है, जहां न्याय, समानता और लोक कल्याण सर्वोपरि होते हैं। यह केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि सुशासन का व्यावहारिक मॉडल है। “दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि व्यापा” यह पंक्ति उस व्यवस्था को दर्शाती है, जहां भय, शोषण और असमानता का अभाव होता है। आधुनिक लोकतंत्र में भी यह अवधारणा उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि यह सत्ता को सेवा का माध्यम मानने की प्रेरणा देती है।
श्रीराम का जीवन यह भी सिखाता है कि करुणा के साथ-साथ अन्याय के विरुद्ध साहस भी आवश्यक है। रावण का वध केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि अहंकार और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। यह संतुलन हमें बताता है कि सच्चा धर्म वही है, जो अन्याय के विरुद्ध दृढ़ता से खड़ा हो सके।
आज के युग में जब समाज नैतिक संकट, असमानता और अशांति से जूझ रहा है, तब श्रीराम के आदर्श और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है नेतृत्व में संयम और दूरदर्शिता, प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व, विविधताओं में एकता और सामाजिक सद्भाव। रामनवमी हमें यह स्मरण कराती है कि वास्तविक प्रगति केवल भौतिक उन्नति में नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक विकास में निहित है।
प्रभु श्रीराम का चरित्र सुशासन, लोक कल्याण और न्यायपूर्ण व्यवस्था का जीवंत आदर्श है, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा। रामनवमी का वास्तविक संदेश केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि उन मूल्यों को अपने जीवन में उतारना है, जिनका श्रीराम ने पालन किया। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर सत्य, करुणा और मर्यादा को जागृत करता है, तभी ‘रामत्व’ का उदय होता है। यही वह पथ है, जो समाज को समरसता, राष्ट्र को सुदृढ़ता और मानवता को शांति प्रदान करता है। अतः इस पावन अवसर पर हमारा संकल्प होना चाहिए कि हम सत्य और न्याय के मार्ग पर चलें, समाज में प्रेम और समानता को बढ़ावा दें और ‘रामराज्य’ की भावना को व्यवहारिक जीवन में उतारने का प्रयास करें। यही रामनवमी का सार है।
 

अष्टमी पर मैहर में आस्था का सैलाब, मां शारदा मंदिर में उमड़े हजारों श्रद्धालु

26-Mar-2026
नई दिल्ली।  ( शोर संदेश ) चैत्र नवरात्रि की अष्टमी का दिन पूरे देश में खास श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है और इस बार भी अलग-अलग जगहों पर भक्तों का उत्साह देखने लायक रहा। मध्य प्रदेश के मैहर में स्थित प्रसिद्ध मां शारदा देवी मंदिर में तो मानो आस्था का सागर उमड़ पड़ा हो। गुरुवार सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें लग गईं और हर कोई माता के दर्शन के लिए आतुर नजर आया। 
मंदिर में अष्टमी के मौके पर विशेष पूजा-अर्चना और भव्य आरती का आयोजन किया गया। मंदिर के प्रधान पुजारी पवन दाऊ जी महाराज ने पूरे विधि-विधान से माता की आरती की और भोग अर्पित किया। जैसे ही आरती शुरू हुई, पूरा मंदिर ‘जय माता दी’ के जयकारों से गूंज उठा। भक्तों के चेहरों पर श्रद्धा और विश्वास साफ झलक रहा था। माना जाता है कि इस दिन माता से सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद जरूर पूरी होती है, इसलिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां पहुंचे।
वहीं, देवास में भी अष्टमी का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया गया। यहां मां तुलजा भवानी मंदिर और मां चामुंडा मंदिर में विशेष पूजा और आरती का आयोजन हुआ। भक्तों ने माता के दर्शन कर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। मंदिरों में गुरुवार सुबह से ही भजन-कीर्तन का माहौल बना हुआ है, जिससे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया है।
उधर, उत्तराखंड के काशीपुर में भी चैत्र नवरात्रि की अष्टमी पर विशेष पूजा-अर्चना हुई। यहां प्रसिद्ध मां बाल सुंदरी देवी मंदिर में हर साल लगने वाला चैती मेला इस बार भी भव्य तरीके से आयोजित किया गया। अष्टमी के दिन माता की भव्य पालकी यात्रा निकाली गई, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। ढोल-नगाड़ों और भक्ति संगीत के बीच निकली इस शोभायात्रा ने पूरे शहर को भक्तिमय बना दिया।
मंदिर के मुख्य पुजारी विकास कुमार अग्निहोत्री ने बताया कि माता की पालकी पारंपरिक मार्गों से होकर अपने भवन में विराजमान हो चुकी है। पूजा-अर्चना के बाद भव्य आरती की गई और भक्तों के लिए दर्शन के लिए खोल दिए गए। उन्होंने कहा कि अष्टमी के दिन माता के दर्शन का विशेष महत्व होता है और श्रद्धालुओं में इसे लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है।





 

अष्टमी पर महाकाल दरबार में आस्था का सैलाब, भस्म आरती देखने श्रद्धालु उमड़े

26-Mar-2026
नई दिल्ली।  ( शोर संदेश ) चैत्र नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर गुरुवार को उज्जैन में बाबा महाकाल के दरबार में भक्तों का सैलाब देखने को मिला। सुबह की भस्म आरती के दौरान हजारों श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए उमड़े। पूरा मंदिर परिसर बाबा महाकाल के जयकारों से गूंज उठा। भक्त ब्रह्म मुहूर्त से ही लंबी लाइनों में खड़े होकर बाबा के दर्शन के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। सबसे पहले भोर में भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेकर मंदिर के कपाट खोले गए। महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा पहले बाबा का जलाभिषेक किया गया और बाद में पंचामृत से स्नान करवाया गया। इस पंचामृत में शुद्ध दूध, ताजा दही, देसी घी, शक्कर, शहद और विभिन्न फलों के रस का मिश्रण शामिल था। अभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई। इसमें महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं।
यह आरती वैराग्य और मृत्यु के सत्य का प्रतीक है। बाबा पर चढ़ने वाली भस्म कपिला गाय के कंडों की राख, पलाश, बड़, पीपल और बेर की लकड़ियों को जलाकर विशेष रूप से तैयार की जाती है। आरती के दौरान शिवलिंग पर लगभग ढाई किलो भस्म चढ़ाई जाती है, जिससे बाबा महाकाल को जगाने की परंपरा पूरी की जाती है।
भस्म आरती के दौरान महिलाएं घूंघट करती हैं और पुरुषों को धोती पहननी होती है। इसके बाद पूरा मंदिर परिसर ‘जय महाकाल’ के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। भक्तों ने ‘हर हर महादेव’ और ‘ऊं नमः शिवाय’ के जयकारे लगाए। बाबा का अद्भुत शृंगार हुआ। भक्त बाबा का अद्भुत शृंगार देखकर खुशी से गदगद दिखे। बाबा का श्रृंगार करने के लिए उनके माथे पर चांदी का सुंदर त्रिपुंड लगाया गया, फूलों की मालाएं, बेलपत्र, चंदन और अन्य पूजा सामग्री से बाबा को सजाया गया। फिर, बाद में महाकाल की कपूर आरती की गई और उसके बाद उन्हें भोग लगाया गया। हर दिन बाबा का शृंगार अलग-अलग तरीके से किया जाता है। वहीं, भस्म आरती देखने के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु उज्जैन आते हैं। उज्जैन महाकाल एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है, जिसे ‘मृत्यु लोक का राजा’ माना जाता है। यहां की विश्व प्रसिद्ध ‘भस्म आरती’ और नया ‘महाकाल लोक’ कॉरिडोर आकर्षण के मुख्य केंद्र हैं।









 

मुख्यमंत्री ने कुदरगढ़ी माता मंदिर में पूजा-अर्चना कर की प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि की कामना

22-Mar-2026
रायपुर,। ( शोर संदेश ) मुख्यमंत्री विष्णु देव साय चैत्र नवरात्रि की तृतीया तिथि के पावन अवसर पर कुदरगढ़ी माता के दर्शन करने सूरजपुर जिले स्थित कुदरगढ़ी माता मंदिर पहुंचे। कुदरगढ़ महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर उन्होंने मंदिर के नीचे प्रांगण स्थल पर ही हिंगुलाज माता एवं झगरा खाड़ देवता की विधिवत पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि और  खुशहाली की कामना की।
मुख्यमंत्री ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार चंदन लगाकर एवं चुनरी चढ़ाकर श्रद्धापूर्वक माता का नमन किया। इस दौरान स्थानीय बैगा राम कुमार बंछोर ने पूजा-अर्चना संपन्न कराई। उनके परिवार की लगभग 10 पीढ़ियां कुदरगढ़ी माता की सेवा में निरंतर लगी हुई हैं।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री साय ने उपस्थित श्रद्धालुओं का अभिवादन किया और सभी को कुदरगढ़ महोत्सव की शुभकामनाएं दीं। इस दौरान कृषि मंत्री रामविचार नेताम, 
 वन विकास निगम एवं कुदरगढ़ी मंदिर मां बागेश्वरी लोक न्यास ट्रस्ट के अध्यक्ष रामसेवक पैंकरा सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं अधिकारीगण उपस्थित रहे।
उल्लेखनीय है कि जनश्रुतियों के अनुसार कुदरगढ़ी माता मंदिर की मान्यता है कि यहां श्रद्धापूर्वक मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। इसी कारणवश जिले सहित प्रदेश एवं अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर माता के दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं।

चैत्र नवरात्र: सनातन परंपरा में शक्ति, श्रद्धा और नवजीवन का दिव्य महापर्व

20-Mar-2026
नई दिल्ली।  ( शोर संदेश ) भारत की सनातन संस्कृति में चैत्र नवरात्रि आस्था, शक्ति और साधना का अनुपम महापर्व है। यह केवल नौ दिनों का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण, मन के शुद्धिकरण और जीवन में नई ऊर्जा के संचार का पावन अवसर है। इन दिनों में भक्त अपनी श्रद्धा को दीप की लौ की तरह प्रज्वलित कर देवी शक्ति के चरणों में समर्पित करते हैं और संकल्प लेते हैं कि वे अज्ञान के अंधकार से निकलकर ज्ञान और सकारात्मकता के प्रकाश की ओर अग्रसर होंगे। यही वह कालखंड है, जब भक्ति भाव अपने उत्कर्ष पर होता है और जन-जन के हृदय में “जय माता दी” की गूंज नई आशा, नई शक्ति और नवआरंभ का संदेश बनकर फैलती है। वास्तव में, भारत की सनातन परंपरा में चैत्र नवरात्रि केवल तिथियों का क्रम नहीं, बल्कि जीवन के नवोदय, आत्मशुद्धि और शक्ति-आराधना का दिव्य संगम है, जो मनुष्य को बाहरी जगत से उठाकर उसके अंतरतम के प्रकाश से जोड़ देता है।
जब शीत की कठोरता विलीन होकर वसंत की कोमलता में परिवर्तित होती है, जब वृक्षों की शाखाओं पर नवांकुर हंसने लगते हैं, जब पवन में पुष्पों की गंध घुल जाती है, तब प्रकृति स्वयं एक उत्सव बन जाती है। यही वह क्षण है, जब चैत्र मास का आगमन होता है और उसके साथ आरंभ होती है नवरात्रि की अलौकिक साधना। यह केवल संयोग नहीं कि नवरात्रि इसी समय आती है। यह प्रकृति और मनुष्य के बीच गहरे संबंध का संकेत है। जैसे प्रकृति अपने पुराने पत्तों को त्यागकर नया जीवन धारण करती है, वैसे ही मनुष्य भी इन नौ दिनों में अपने भीतर की नकारात्मकताओं को त्यागकर नवचेतना का आलोक प्राप्त करता है।
सनातन धर्म में शक्ति को सृष्टि की मूल प्रेरणा माना गया है। शिव बिना शक्ति के शून्य हैं और शक्ति बिना शिव के निष्क्रिय। यही द्वैत का अद्वैत है, जो सृष्टि को गति देता है। चैत्र नवरात्रि इसी शक्ति की उपासना का पर्व है। यह वह समय है, जब साधक देवी के विविध स्वरूपों में उस परम ऊर्जा को अनुभव करता है, जो जीवन को गति, दिशा और अर्थ प्रदान करती है। यह आराधना केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में उतरने की प्रक्रिया है।
चैत्र नवरात्रि देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना का पर्व है। प्रत्येक दिन देवी के एक विशेष रूप की पूजा की जाती है। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। इन नौ दिनों में साधक देवी के विभिन्न रूपों की आराधना करके आत्मबल, ज्ञान और शक्ति प्राप्त करता है। यह पर्व यह संदेश देता है कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार तभी संभव है, जब हम भीतर की शक्ति को पहचानें।
नवरात्रि के नौ दिन साधना के नौ सोपान हैं। यह यात्रा बाहरी जगत से भीतर की ओर और फिर भीतर से परम चेतना की ओर ले जाती है। पहले दिन से लेकर नवमी तक साधक क्रमशः अपने भीतर के अज्ञान, भय, मोह और अहंकार को त्यागता है। यह प्रक्रिया किसी युद्ध से कम नहीं है। यह युद्ध बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। पहला चरण: शुद्धि—जब मन और शरीर को संयम में लाया जाता है। दूसरा चरण: स्थिरता—जब विचारों को नियंत्रित किया जाता है। तीसरा चरण: साधना—जब आत्मा ध्यान और भक्ति में लीन होती है। चौथा चरण: जागरण—जब भीतर की चेतना प्रकाशित होती है। इन नौ दिनों में व्यक्ति स्वयं को पुनः गढ़ता है, जैसे कुम्हार मिट्टी को आकार देता है।
यदि नवरात्रि को एक काव्य माना जाए, तो उसका प्रत्येक दिन एक नया छंद है, प्रत्येक अनुष्ठान एक अलंकार है और प्रत्येक प्रार्थना एक भावपूर्ण पंक्ति। यह पर्व मानो जीवन की वीणा पर बजती हुई वह मधुर धुन है, जिसमें भक्ति के स्वर, श्रद्धा की लय और आस्था का ताल समाहित है। यहां दीपक केवल प्रकाश नहीं देता, वह अज्ञान के अंधकार को चीरने का प्रतीक बन जाता है। यहां कलश केवल पात्र नहीं, वह सृष्टि के बीज का संकेत है।
चैत्र नवरात्रि की पूजा में विधि और भावना दोनों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना, घर और मंदिर को स्वच्छ करना, कलश स्थापना करना—ये सब केवल क्रियाएं नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने के साधन हैं। उपवास का महत्व भी अत्यंत गहरा है। यह केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास है। जब शरीर संयमित होता है, तब मन भी स्थिर होता है, और जब मन स्थिर होता है, तब आत्मा परम चेतना के निकट पहुंचती है। मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और ध्यान ये सभी साधक को उस दिव्य ऊर्जा से जोड़ते हैं, जो जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है।
भारत की विविधता में एकता का सबसे सुंदर उदाहरण नवरात्रि में देखने को मिलता है। उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम—हर क्षेत्र में यह पर्व अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है, परंतु उसका मूल भाव एक ही रहता है—भक्ति और शक्ति। कहीं यह पर्व राम जन्म की तैयारी के रूप में मनाया जाता है, तो कहीं नववर्ष के स्वागत के रूप में। कहीं घरों में घट स्थापना होती है, तो कहीं भव्य मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना। यह विविधता ही भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है। नवरात्रि इस विविधता को एक सूत्र में पिरोती है और यह संदेश देती है कि भले ही हमारी परंपराएं अलग हों, पर हमारी आस्था एक है।
चैत्र नवरात्रि का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका सामाजिक संदेश है। देवी की पूजा के माध्यम से नारी शक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि समाज की प्रगति तभी संभव है, जब नारी का सम्मान हो। कन्या पूजन की परंपरा इसी भावना का प्रतीक है। छोटी-छोटी बालिकाओं में देवी का रूप देखकर उनका पूजन करना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज को यह संदेश देना है कि नारी ही सृष्टि की आधारशिला है। इसके साथ ही यह पर्व सामूहिकता और सेवा की भावना को भी प्रोत्साहित करता है। लोग मिलकर पूजा करते हैं, भंडारे आयोजित करते हैं और जरूरतमंदों की सहायता करते हैं।
नवरात्रि के दौरान आस्था अपने चरम पर होती है। मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, घंटियों की ध्वनि और शंखनाद वातावरण को पवित्र बना देते हैं। हर भक्त के मन में एक अलग भावना होती है—कोई सुख की कामना करता है, कोई दुख से मुक्ति चाहता है, कोई केवल दर्शन की आकांक्षा लेकर आता है। परंतु सभी की मंजिल एक ही होती है—देवी की कृपा। यह आस्था ही वह शक्ति है, जो मनुष्य को कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का साहस देती है।
चैत्र नवरात्रि केवल बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण का पर्व है। यह हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देती है। जब हम ध्यान करते हैं, जब हम मंत्रों का जाप करते हैं, तब हम अपने भीतर उस शांति को अनुभव करते हैं, जो बाहरी संसार में कहीं नहीं मिलती। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मा की शांति में है।
आज का जीवन भागदौड़ और तनाव से भरा हुआ है। ऐसे समय में नवरात्रि हमें ठहरने, सोचने और स्वयं को समझने का अवसर देती है। यह पर्व हमें सिखाता है—संयम का महत्व, सकारात्मक सोच की शक्ति, आत्मनियंत्रण का मूल्य। नवरात्रि हमें यह याद दिलाती है कि चाहे जीवन कितना भी व्यस्त क्यों न हो, हमें अपने भीतर की शांति को बनाए रखना चाहिए।
 

चैत्र नवरात्रि में महाकाल का मनमोहक रूप, दिव्य शृंगार देख भक्त हुए भाव-विभोर

19-Mar-2026
नई दिल्ली। ( शोर संदेश ) बारह ज्योतिर्लिंग में से सबसे प्रभावशाली और काल के देवता माने जाने वाले महाकालेश्वर मंदिर में चैत्र नवरात्रि की धूम देखने को मिली। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को बाबा का अद्भुत शृंगार किया गया और माथे पर बड़े अर्धचांद और त्रिपुण को स्थापित कर महाकाल की पूजा-अर्चना की गई। बाबा के चैत्र नवरात्रि के पहले दिन के खास दर्शन देखने के लिए भक्तों की भारी भीड़ पहुंची।
बाबा महाकाल मंदिर में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, गुड़ी पड़वा के पावन अवसर पर नव संवत्सर का भव्य स्वागत किया गया। ब्रह्म मुहूर्त में आयोजित भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल का विशेष विधि-विधान के साथ पूजन किया गया। पहले ब्रह्म मुहूर्त में वीरभद्र से आज्ञा लेकर मंदिर के कपाट खोले गए और फिर दूध, दही, घी, शहद, और फलों के रस से बने पंचामृत से बाबा को स्नान कर अभिषेक पूजन कराया और भस्म आरती की शुरुआत हुई।
चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि, गुरुवार को बाबा के माथे पर त्रिपुंड बनाया गया और उस पर त्रिशूल को स्थापित किया गया। वहीं नीचे की तरफ भी एक त्रिपुंड बनाया गया और उस पर बाबा की तीसरी आंख को सुसज्जित किया गया। बाबा के माथे पर बड़ा अर्ध चांद भी बनाया गया जो सुख और शांति का प्रतीक है, और आखिर में सूखे मेवों की माला से बाबा को सजाया गया और लाल रंग की चुनरी बाबा को अर्पित की गई। बाबा के अद्भुत शृंगार को देख भक्त भी मंत्रमुग्ध नजर आए और पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव और जय माता दी के जयकारों से गूंज उठा।
बता दें कि भस्म आरती के दौरान बाबा भक्तों को निराकार रूप में दर्शन देते हैं, जो जीवन और मृत्यु से परे होता है। माना जाता है कि जो भी बाबा के निराकार रूप में दर्शन करता है, उसे और जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्ति मिलती है। वहीं शृंगार के बाद बाबा साकार रूप में दर्शन देते हैं। साकार रूप बाबा का अलौकिक और संसार से जुड़ा होता है, जिसके दर्शन से भक्तों के सारे कष्ट कम हो जाते हैं।


 

चैत्र नवरात्र: सनातन परंपरा में शक्ति, श्रद्धा और नवजीवन का दिव्य महापर्व

19-Mar-2026
नई दिल्ली। ( शोर संदेश ) भारत की सनातन संस्कृति में चैत्र नवरात्रि आस्था, शक्ति और साधना का अनुपम महापर्व है। यह केवल नौ दिनों का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण, मन के शुद्धिकरण और जीवन में नई ऊर्जा के संचार का पावन अवसर है। इन दिनों में भक्त अपनी श्रद्धा को दीप की लौ की तरह प्रज्वलित कर देवी शक्ति के चरणों में समर्पित करते हैं और संकल्प लेते हैं कि वे अज्ञान के अंधकार से निकलकर ज्ञान और सकारात्मकता के प्रकाश की ओर अग्रसर होंगे। यही वह कालखंड है, जब भक्ति भाव अपने उत्कर्ष पर होता है और जन-जन के हृदय में “जय माता दी” की गूंज नई आशा, नई शक्ति और नवआरंभ का संदेश बनकर फैलती है। वास्तव में, भारत की सनातन परंपरा में चैत्र नवरात्रि केवल तिथियों का क्रम नहीं, बल्कि जीवन के नवोदय, आत्मशुद्धि और शक्ति-आराधना का दिव्य संगम है, जो मनुष्य को बाहरी जगत से उठाकर उसके अंतरतम के प्रकाश से जोड़ देता है।
जब शीत की कठोरता विलीन होकर वसंत की कोमलता में परिवर्तित होती है, जब वृक्षों की शाखाओं पर नवांकुर हंसने लगते हैं, जब पवन में पुष्पों की गंध घुल जाती है, तब प्रकृति स्वयं एक उत्सव बन जाती है। यही वह क्षण है, जब चैत्र मास का आगमन होता है और उसके साथ आरंभ होती है नवरात्रि की अलौकिक साधना। यह केवल संयोग नहीं कि नवरात्रि इसी समय आती है। यह प्रकृति और मनुष्य के बीच गहरे संबंध का संकेत है। जैसे प्रकृति अपने पुराने पत्तों को त्यागकर नया जीवन धारण करती है, वैसे ही मनुष्य भी इन नौ दिनों में अपने भीतर की नकारात्मकताओं को त्यागकर नवचेतना का आलोक प्राप्त करता है।
सनातन धर्म में शक्ति को सृष्टि की मूल प्रेरणा माना गया है। शिव बिना शक्ति के शून्य हैं और शक्ति बिना शिव के निष्क्रिय। यही द्वैत का अद्वैत है, जो सृष्टि को गति देता है। चैत्र नवरात्रि इसी शक्ति की उपासना का पर्व है। यह वह समय है, जब साधक देवी के विविध स्वरूपों में उस परम ऊर्जा को अनुभव करता है, जो जीवन को गति, दिशा और अर्थ प्रदान करती है। यह आराधना केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में उतरने की प्रक्रिया है।
चैत्र नवरात्रि देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना का पर्व है। प्रत्येक दिन देवी के एक विशेष रूप की पूजा की जाती है। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। इन नौ दिनों में साधक देवी के विभिन्न रूपों की आराधना करके आत्मबल, ज्ञान और शक्ति प्राप्त करता है। यह पर्व यह संदेश देता है कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार तभी संभव है, जब हम भीतर की शक्ति को पहचानें।
नवरात्रि के नौ दिन साधना के नौ सोपान हैं। यह यात्रा बाहरी जगत से भीतर की ओर और फिर भीतर से परम चेतना की ओर ले जाती है। पहले दिन से लेकर नवमी तक साधक क्रमशः अपने भीतर के अज्ञान, भय, मोह और अहंकार को त्यागता है। यह प्रक्रिया किसी युद्ध से कम नहीं है। यह युद्ध बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। पहला चरण: शुद्धि—जब मन और शरीर को संयम में लाया जाता है। दूसरा चरण: स्थिरता—जब विचारों को नियंत्रित किया जाता है। तीसरा चरण: साधना—जब आत्मा ध्यान और भक्ति में लीन होती है। चौथा चरण: जागरण—जब भीतर की चेतना प्रकाशित होती है। इन नौ दिनों में व्यक्ति स्वयं को पुनः गढ़ता है, जैसे कुम्हार मिट्टी को आकार देता है।
यदि नवरात्रि को एक काव्य माना जाए, तो उसका प्रत्येक दिन एक नया छंद है, प्रत्येक अनुष्ठान एक अलंकार है और प्रत्येक प्रार्थना एक भावपूर्ण पंक्ति। यह पर्व मानो जीवन की वीणा पर बजती हुई वह मधुर धुन है, जिसमें भक्ति के स्वर, श्रद्धा की लय और आस्था का ताल समाहित है। यहां दीपक केवल प्रकाश नहीं देता, वह अज्ञान के अंधकार को चीरने का प्रतीक बन जाता है। यहां कलश केवल पात्र नहीं, वह सृष्टि के बीज का संकेत है।
चैत्र नवरात्रि की पूजा में विधि और भावना दोनों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना, घर और मंदिर को स्वच्छ करना, कलश स्थापना करना—ये सब केवल क्रियाएं नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने के साधन हैं। उपवास का महत्व भी अत्यंत गहरा है। यह केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास है। जब शरीर संयमित होता है, तब मन भी स्थिर होता है, और जब मन स्थिर होता है, तब आत्मा परम चेतना के निकट पहुंचती है। मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और ध्यान ये सभी साधक को उस दिव्य ऊर्जा से जोड़ते हैं, जो जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है।
भारत की विविधता में एकता का सबसे सुंदर उदाहरण नवरात्रि में देखने को मिलता है। उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम—हर क्षेत्र में यह पर्व अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है, परंतु उसका मूल भाव एक ही रहता है—भक्ति और शक्ति। कहीं यह पर्व राम जन्म की तैयारी के रूप में मनाया जाता है, तो कहीं नववर्ष के स्वागत के रूप में। कहीं घरों में घट स्थापना होती है, तो कहीं भव्य मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना। यह विविधता ही भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है। नवरात्रि इस विविधता को एक सूत्र में पिरोती है और यह संदेश देती है कि भले ही हमारी परंपराएं अलग हों, पर हमारी आस्था एक है।
चैत्र नवरात्रि का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका सामाजिक संदेश है। देवी की पूजा के माध्यम से नारी शक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि समाज की प्रगति तभी संभव है, जब नारी का सम्मान हो। कन्या पूजन की परंपरा इसी भावना का प्रतीक है। छोटी-छोटी बालिकाओं में देवी का रूप देखकर उनका पूजन करना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज को यह संदेश देना है कि नारी ही सृष्टि की आधारशिला है। इसके साथ ही यह पर्व सामूहिकता और सेवा की भावना को भी प्रोत्साहित करता है। लोग मिलकर पूजा करते हैं, भंडारे आयोजित करते हैं और जरूरतमंदों की सहायता करते हैं।
नवरात्रि के दौरान आस्था अपने चरम पर होती है। मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, घंटियों की ध्वनि और शंखनाद वातावरण को पवित्र बना देते हैं। हर भक्त के मन में एक अलग भावना होती है—कोई सुख की कामना करता है, कोई दुख से मुक्ति चाहता है, कोई केवल दर्शन की आकांक्षा लेकर आता है। परंतु सभी की मंजिल एक ही होती है—देवी की कृपा। यह आस्था ही वह शक्ति है, जो मनुष्य को कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का साहस देती है।
चैत्र नवरात्रि केवल बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण का पर्व है। यह हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देती है। जब हम ध्यान करते हैं, जब हम मंत्रों का जाप करते हैं, तब हम अपने भीतर उस शांति को अनुभव करते हैं, जो बाहरी संसार में कहीं नहीं मिलती। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मा की शांति में है।
आज का जीवन भागदौड़ और तनाव से भरा हुआ है। ऐसे समय में नवरात्रि हमें ठहरने, सोचने और स्वयं को समझने का अवसर देती है। यह पर्व हमें सिखाता है—संयम का महत्व, सकारात्मक सोच की शक्ति, आत्मनियंत्रण का मूल्य। नवरात्रि हमें यह याद दिलाती है कि चाहे जीवन कितना भी व्यस्त क्यों न हो, हमें अपने भीतर की शांति को बनाए रखना चाहिए।
चैत्र नवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। यह हमें सिखाती है कि हर अंत के बाद एक नई शुरुआत होती है, हर अंधकार के बाद प्रकाश आता है। यह पर्व हमें अपने भीतर की शक्ति को पहचानने, उसे जागृत करने और जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देता है। जब हम दीप जलाते हैं, जब हम आरती करते हैं, जब हम देवी का स्मरण करते हैं, तब हम केवल एक परंपरा का पालन नहीं कर रहे होते, बल्कि हम अपने भीतर उस दिव्य ज्योति को प्रज्वलित कर रहे होते हैं, जो हमें अज्ञान से ज्ञान और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। अंततः, चैत्र नवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि जीवन एक साधना है, और इस साधना में सफलता तभी मिलती है, जब हम श्रद्धा, विश्वास और समर्पण के साथ आगे बढ़ते हैं। यही है नवरात्रि का महात्म्य शक्ति का जागरण, आत्मा का उत्थान और जीवन का उत्सव।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने जगन्नाथ मंदिर में की पूजा-अर्चना

16-Mar-2026
रायपुर । ( शोर संदेश )  मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आज राजधानी रायपुर स्थित जगन्नाथ मंदिर पहुँचकर भगवान जगन्नाथ महाप्रभु की भव्य महाआरती में शामिल हुए और विधिवत पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों के जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और निरंतर प्रगति की मंगलकामना की।
इस अवसर पर विधायक पुरंदर मिश्रा सहित अन्य स्थानीय जनप्रतिनिधि और श्रद्धालुजन उपस्थित थे।
 

राज्यपाल ने माँ महामाया का दर्शन कर छत्तीसगढ़ की सुख-समृद्धि, खुशहाली की कामना की

06-Mar-2026
रायपुर( शोर संदेश )  राज्यपाल रमेन डेका ने रतनपुर पहुंचकर माँ महामाया मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना की। उन्होंने माँ महामाया से छत्तीसगढ़ की सुख-समृद्धि, खुशहाली और प्रदेशवासियों के कल्याण की कामना कर आशीर्वाद लिया।
मंदिर परिसर में राज्यपाल का मंदिर समिति के पदाधिकारियों और श्रद्धालुओं ने आत्मीय स्वागत किया। इस अवसर पर नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष लवकुश कश्यप, कलेक्टर संजय अग्रवाल, एसएसपी रजनेश सिंह सहित अन्य अधिकारी-कर्मचारी, सहित मोहित जायसवाल एवं माँ महामाया मंदिर समिति के पदाधिकारियों मौजूद थे।



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