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सुनो भाई उधो, अरे तोला का भइगे..?

16-Jul-2024
  ( शोर संदेश )  परमानंद वर्मा स़ोचिये, सब  कहीं कानून व्यवस्था, मर्यादा व परम्पराओं को तोडना शुरू कर दें, न माने तब संसार व सृष्टि का क्या होगा। बरसात ठेंगा दिखा रहा है, धरती सूखी पडी है, कंठ प्यासे हैं। सबकी निगाहें आसमान की ओर है। इसी संदर्भ में पेश हे यह छत्तीसगढी आलेख....।

देखत हौं, एकर चाल ला? अभी हकन  देहूं, ठठा देहूं तब जउन ए इतरावत हे ना तउन सब घुसड़ जाही। जान दौ... जान दौ काहत हौं तब एकर मतलब ए तो नइ होवय के मुड़ी चढ़के मूतय, छानही मं होरा भुंजय?
गुड़ी चंवरा मं बइठ के भकाड़ू पइरा डोरी बरत रहिथे तब नंदू ढेरा चलावत पटवा डोरी बनावत रहिथे ततके बेर महावीर भइया बजार कोती ले आवत रिहिसे तउन हा दूनो झन ल साहेब बंदगी, सत कबीर काहत जय जोहार करथे। 
भकाड़ू पूछथे- कते डहर ले आवत हस साहेब, गजब दिन मं दीखत हस? तब ओहर बताथे- काला बताबे भइया, अरे अमलेसर मं गुरु साहेब के सत्संग चलत रिहिसे उहिचे गे रेहेंव। परन दिन आय हौं, चलव धान बोनी, खेती किसानी के दिन आगे हे, अब भिड़े जाय। 
अब देख न साहेब, ये बादर हा तो आंखी-कान ल निच्चट मूंद दे हे गा, एको बूंद तो भला टपकतिस? भकाड़ू के बात ल सुनके महावीर कहिथे- टपकही कहां ले, रुख-राई, नदिया-नरवां, जंगल, पहाड़ के तो सतियानास करत हौ। प्रकृति दाई के आंसू ल जाके तो भला देखव, रो-रो के बारा हाल होगे हे। ओकर लोग लइका, शेर-भालू, चीता, हिरण, हाथी, कोलिहा, हुड़रा, बेंदरा अउ चिरई-चिरगुन के बसेरा उजारत हौ, उजार दे हौ। ओमन कहां रइही, कहां जांही, का खाही, का पिही, हे कहूं कोनो मेर ओकर मन के ठिकाना। 
साहेब तोर बात हे तो सोला आना सही, फेर सरकार ला विकास करे खातिर काम तो कुछ करे ले परही ना। भकाड़ू बताथे- जंगल मं ही तो सबो खनिज संसाधन भरे परे हे, खदान के तो दोहन करे ले परही ना?
ककरो घर ल उजार के, बरबाद करके देस-परदेस के विकास करई कोनो विकास नोहे भकाड़ू। तोर संग कहूं अइसने भला हो जही तब तोला कइसे लगही? 
भयरा ठेठवार घला अतके बेर आ जथे अउ ओकर मन के बीच मं जउन गोठ-बात चलत रिहिस तउन ल कान टेढ़ के सुने ले धर लिस।  मुड़ी मं बड़ेक जनिक पागा बांधे राहय तउन ल खोल देथे अउ पूछथे- का गोठियावत हौ जी तुमन। 
नंदू के ढेरा घला घूमना बंद होगे रिहिसे। भैरा ठेठवार उही ल पूछथे- कस रे नंदू, का-का गोठियावत हौ?
भैरा के बात ल सुनके भकाड़ू थोकन तमके असन कहिथे- ये निपोर भैरा गतर के हा, कांही ल सुन पाही न समझ पाही अउ काहत हे का-का गोठियावत हौ?
नंदू हा ओला महावीर साहेब जउन रुख-राई, नदिया-नरवा, तरिया, कुआं, जंगल, पहाड़ के विनाश के बात सुनाथे तब ओहर कहिथे- बने बात तो काहत हे महावीर साहेब हा। अरे जब पेड़-पौधा नइ रइही, जंगल-पहाड़, नदिया नइ रइही, कुंआ बवली नइ रइही तब जंगली जानवर, पशु-पक्षी ल छोड़ मनखे के बारा हाल हो जही। भाड़ मं जाय तुंहर सरकार के विकास के काम, जनता के जीवन ल पहिली देखव।
महावीर साहेब कहिथे- देख, एको अक्षर नइ पढ़े-गुने हे, गाय-भइस चराथे तेन अतेक सब बात ल समझथे अउ तुंहर सब झन के आंखी मुंदागे हे, पथरा परगे हे, गोबर भरगे हे दिमाग मं। कहां ठेंगवा ल बरसही पानी हा?
ओहर कहिथे- चाहे कतको पूजा-पाठ, हवन, जग, गीता-भागवत, सत्संग करा लौ, दाई, बेटी, बहिनी अउ गोसइन के आंखी डहर ले कहूं आंसू झरत रइही तब ओकर परिवार, समाज अउ देश मं सुख-शांति कभू नइ आ सकय। ये प्रकृति कोन हे, इही दाई, बहिनी, बेटी मन तो आय। रुख-राई, जंगल, पहाड़, नदी-नरवा खुलेआम नीलाम होवत हे, ओकर मन के छाती मं बुलडोजर चलत हे। ओकर मन के दुख ल उही मन जानही?
भैरा ठेठवार पूछथे- का काहत हे साहेब हा गा? तब भकाड़ू कंझावत कहिथे- अरे काला का सुनाबे गा, कहिबे आन तब सुनही आन। तभो ले नंदू हा सबो बात ल ओला सुनाथे, समझाथे। 
ठेठवार कहिथे- बने काहत हे साहब हा, धरती मं पाप बढ़गे हे, पेड़ के जउने डारा मं बइठे हौ अउ ओकरे ऊपर टंगिया चलाहौ तब मरिहौ ते बाचिहौ? जा उही पाके पानी नइ गिरत हे तुंहर परदेस मं। आन कोती देख कइसन बरसत हे चारों मुड़ा पानी-पानी। बांधा फूटत हे, पुल-पुलिया टूटत हे, घर-दुआर बोहावत हे अउ छत्तीसगढ़ ल देख बादल हा मुंह अइठ ले हे। जइसन करनी तइसन भरनी। कतको चिल्लावौ, गोहार पारौ, अरे तोला का भइगे... फेर ओकर खेल ल उही जानही। 
जाती-बिराती
आगे असाड़ गिरगे पानी
धर ले नांगर धर ले तुतारी
चल रे बइला अररर, त-त-त
चल रे बइला अररर, त-त-त।


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