कोई दिल की चोरी करता है तो कोई नींद की। सत्ता, सुंदरी और शील हरण भी कोई कम नहीं हो रहा है। धन, विद्या, कला, संगीत, ज्ञान, विज्ञान के अलावा भी अनेक प्रकार की चोरियां हैं, जिन्हें हम नहीं जानते, बेखौफ हो रही है। इसी संदर्भ में पेश है छत्तीसगढ़ी आलेख....
बंधागे हंव गा, छंदागे हंव रे
संगी मया म तोर, अलबेला रे मोर
फंदागे रे हंव जोड़ी निरमोही मोर
मया म तोर लपटागेंव हंव ना।।
-जुगनू जायसवाल, कोरबा
चोरी करही एक ठन सुग्घर कला हे, जउन ल ए कला आथे ओमन ल एकर भरपूर उपयोग करना चाही। अउ जउन मन ल नइ आवय ओमन ल सीखे के कोशिश करना चाहीए कला ल सीखे मं अड़बड़ फायदा हे। गरीबी दूर हो जथे। चार दिन, महीना अउ सालभर मं देखते देखत अइसन मन मालामाल हो जथे। गांव, कस्बा, शहर अउ देश-विदेश मं अइसन-अइसन लाखों नामी-गिरामी मनखे हे जउन मन ए कला के बदौलत फकीरचंद ले अमीरचंद बन बइठे हें। बैंक बैलेंस बना डरे हें, झोपड़ी के रहवइया आज महल-अटारी मं ठसन अउ शान-ए-शौकत मं रहत हें।
दुनिया मं कोन अइसे मनखे होही जउन ए काहय भला के ओमन चोरी नइ करे होही या नइ करत होही? अब ये अलग बात हे के सरकार ह एला अपराध के दायरा मं ला दे हे अइसन-अइसन करइया मन बर सजा के प्रावधान कर दे हे। जइसन ये कला हे ओइसने चोरी करइया मन घला एक ले बढ़के एक कलाकार हे। अतेक बारीकी अउ सफाई से चोरी करथें ते कोनो ल कानो कान खबर नइ लागे। जादूगर मन सही अतेक सफाई से चोरी करथे। अइसन माहिर कलाकार मनके तो जिला, राज्य अउ राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान होना चाही। जइसन दूसर क्षेत्र के कलाकार मन के सम्मान करे जाथे।
चोरी नींद के करथे, दिल के करथे, धन, विद्या, सोना-चांदी, सत्ता, सुंदरी के करथे। गांव मन ले गाय-भंइस, नांगर, कोला बारी ले आमा, भाटा, पाताल तक के चोरी करे के खबर मिलत रहिथे। ककरो बहू, बेटी, गोसइन तक ल चोरहा मन नइ छोडय़। रावन कस भगा (चोरी) करके ले जथे। अइसन घटना तो आजकल खुलेआम होय ले धर ले हे। चोरी-छुपे अइसन करम करत जउन बेटी, बहू अउ गोसइन पकड़ागे तब तो ओमन दांत निपोर देथें। चोरी आखिर कब तक छिपही।
चोरी कतको परकार के होथे। ज्ञान-विज्ञान, तंत्र-मंत्र, कल-कारखाना, जमीन-जायदा, घर-द्वार, गाड़ी, घोड़ा, गीत, गजल, कविता, साहित्य तक मं चोरी करे के शिकायत मिलत रहिथे। पटवारी, आरआई, तहसीलदार बड़े-बड़े चोरहा मन के लम्बरदार होथे। जतके बड़े मनखे, नेता, मंतरी, नौकरशाह, सेठ, उद्योगपति होथे, ओतके ओमन बड़े चोर होथे। कोनो मनखे, संस्था ऊपर आरोप नइ लगावत हन, अदालत मं जइसन आज सैकड़ों मामला चोरी-चकारी, गबन, धन के अफरा-तफरी अउ भ्रष्टाचार चलत हे, ओकर ये सबूत हे, गवाह हे। है ना ए बहुत बड़े कला, चोरी के कतेक ताकत हे, हैसियत हे। इही तो ये कला के कमाल हे। रंक ले राजा बना देथे।
परदा कूद के ककरो बारी, घर मं खुसरे के का मतलब होथे? सपड़ मं आगे तहां ले दे कुटाई। याहा दइसन ढंग के चोरी घला होथे। बात पंचायत मं जाथे तब असली बात ल नइ बकर के अंते-तंते गोठियाथे। फेर चोर के दाढ़ी मं तिनका असन बात ल पंच मन पकड़ लेथे अउ फेर कर देथे दंड।
~परमानंद वर्मा
चोरी के कलाबाजी मं भगवान कृष्ण के नांव जादा उजागर होय हे। दूध, दही अउ मक्खन के का कमी रिहिसे नंद बाबा के घर मं फेर नहीं जेकर टकराहा (आदत) पर जथे चोरी करे के ओहर छूटय नहीं। रोज कहूं न कहूं चोरी करत पकड़ा जाय। कभू दूध, दही बेचे ल जात राहय तउन गोप-गुवालिन मन ल छेक (रोक) के ओकर मन के मटका फोर दय, लूटपाट मचावय। बहुत उतलंग (उत्पात) करय।
महराज मन कथा-भागवत मं एक ठन अनफभक कथा सुनाथे, जेला सुने मं हांसी लगथे। अब तरिया मं नहावत रिहिन गोप-गुवालिन मन तेकर लुगरा (साड़ी) ल चोरी करके पेड़ मं टांग के तमाशा देखे के का मतलब होथे। बताथे- ओमन नग्न होके नहावत रिहिसे। तब साड़ी संग मं ओकर मन के ब्रेजियर, ब्लाउज, पेटी कोट अउ जांघिया ल घला लुका ले रिहिस होही? अब ये कथा मं बात कतका सही हे अउ कतका लबारी हे तेला उही मन जानय। फेर जब ये कथा चलथे, सुनइया मन कान टेड़के के चाव से सुनथे।
चोरी के अइसन कतको परसंग हे, घटना हे। सब जुग मं चोरी के इतिहास हे। अली बाबा चालीस चोर अउ चरणदास चोर के कहिनी ल तो सबो झन सुन डरे हवौ। किसम-किसम के चोरी, किसम-किसम के चोर, छोटे चोर, बड़े चोर। फेर छोटे चोर फंस जाथे, बड़े बुलक जाथे, सालों चलत रहिथे अदालत मं मामला। चोर पुरान इति...।
जाती-बिराती
दुनियादारी छोड़ पिया जी, बोल मया के बोली ला।
नींद चैन लेगेव संघरा, छोड़व हँसी ठिठोली ला।।
घेरी-बेरी सुरता आथे, मुचमुच हाँसत दिखथस जी।
बुता घलो हा होवत नइहे, कइसे अलहन करथस जी।
रद्दा देखव ले के आबे ,कब कहार अउ डोली ला।।
नींद चैन लेगेव संघरा, छोड़व हँसी-ठिठोली ला।।
-डॉ. दीक्षा चौबे, दुर्ग