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*अम्मट बासी-चटा गोंदली*

20-Jun-2024

बटकी म बासी जागे,

मलिया म जागे साग।
कंवरा ढेलवानी जागे,
माटी म जागे भाग।।
बदरी बिशाल, परमानंद
 
छत्तीसगढ़ में  बोरे बासी का अपना विशिष्ट स्थान है। खासकर गांवों में तो यह ग्रामीणों का प्रमुख आहार है। गर्मी के दिनों में तो दोनों जून इसका सेवन करते हैं। इसीलिए 'अम्मट बासी चटा गोंदली, नंदलाल सखी पुनिया डोकरी  नामक लोक गीत प्रचलित है। शहर के किसी होटलों, मालों में 'बासी मांगने पर नहीं मिलता। भूतपूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे प्रचारित करने की दिशा में कदम तो उठाया था लेकिन...? छत्तीसगढ़ी में पढ़िए यह आलेख...
 
बाप रे बाप, जान दे एसो के जेठ महीना तेकर ले नवा तपा, का तपिश ते सब के जीव हलाकान करके रख दीस। ऊपर से ये नवपंचक बाचे-खुचे हे तउनो आगी मूतत हे। अइसन गरमी के बखत मं ये चुनाव का झपागे, कतको मनखे रेंग दीस ऊपर कोती। आगी अंगरा कस तपत हे घाम हा। 
काबर अतेक घाम करत हे, ओकर कारन का हे तउन ला अब जाने ले परही। जम्मो रुख-राई, जंगल, पहाड़, नदिया, नरवा, तलाब सब रोवत हे। ओकर विपदा, दुख, करलेस के कोनो हियाव करइया नइहे। लगथे ये धरती मं कोनो राक्षस मन उतरगे हे। ओकर नजर मं सिरिफ अउ सिरिफ विकास दीखत हे तब ये विकास कइसे आही... सब जंगल-झाड़ी, परबत, नदिया ल विनास करे मं। जब सब साफ हो जाही तब ये जमीन के भीतर जउन हंडा गड़े हे उही मं तो विकास छिपे हे। 
छत्तीसगढ़ के भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी के हे रिहिसे- इहां के अमीर धरती मं गरीब जनता निवास करथे। बासी खा-खा के जीवन गुजार दीन फेर पुरखौती जउन जायदाद हे ओला लुका (छिपा) के रखिन, नइ कोनो ल बतइन। जानत रिहिन हे, कहूं ये खजाना ला जान परही तब एक नइ बचाही। 
ओ खजाना ल जान डरे हें। ये परदेसी मन सगा बनके अइन अउ आज इही सगा मन छत्तीसगढ़िया मन के छाती मं चढ़के शासन करे ले धर लीन। छत्तीसगिढ़या बासी खाते रहिगे अउ ओमन जउन हाथ पसारे अइन आज मॉल, पांच सितारा होटल के मालिक बने बइठ गे। अउ माल मसाला झड़कत हे। 
ओमन कहिथे अउ आज जेने आथे तउने मन तको कहिथे- 'छत्तीसगढ़िया-सब ले बढ़िया । काबर ये नारा ला  राग धर के कोनो गीत, गजल, कव्वाली, शेर अउ गीता, रमायन, वेद, पुरान के इसलोक, मंत्र असन गाथे, दुहरावत रहिथे? कोनो तो गीता रहस्य बरोबर ये नारा के रहस्य होही?
ये भारी रहस्य हे, ओ रहस्य ल ओ दिन अंतराष्ट्रीय कथावाचक सिहोर वाले महराज पं. प्रदीप मिश्रा हा तीन-चार लाख के भीड़ भरे सभा मं सबके आगू मं बताइस- शांत, सरल, मीठ-गुरतुर बोली, सहज सुभाव, छल-कपट, प्रपंच, झूठ-लबारी ले कोसों दूर, जउन मिलगे तउन मं संतोष, उदारता- जलन ले दूर, ये गुन के रहस्य भाव छत्तीसगढ़िया मन हे। 
महाराज जी हा आगू किहिस- इही मन असली छत्तीसगढ़िया हे अउ अब जउन मन इहां पेट बिगारी, रोजगार धंधा, कारोबार, उद्योग, राजनीति करे के नांव ले के बस गे हे, ओमन नोहय छत्तीसगढ़िया, ओमन का जानही इहां के माटी के मरम ल। ये सप्तरिसी अऊ राम के महतारी कौशिल्या के  तपोभूमि हे, तेकर अइसन संतान हे। सीधा-साधा, भोला-भाला हे इहां के मनखे। बासी-पानी, पेज पसइया खाके आजो ओमन अपन जीवन ल गुजारना जानथे। फेर ककरो दुआरी मं भीख मांगे ल नइ जाय न चोरी चकारी अउ गलत कारोबार, धंधा करय। ये तो बाहिर वाले मन इहां आके जब बसना शुरू करिन हे तब अपन दुरगुन अउ जहर ल बगरावत जात हे। 
बासी आज घलो इहां के मुख्य भोजन हे, बड़काहा मनखे मन तात भात खाथें नइते बासी ल आज ले नइ छोड़े हे इहां के निवासी मन। सुरता आवत हे सन् बैंसठ-पैंसठ पर भयंकर अकाल परिस, एक दाना नइ होइस, तब कहां अमरीका ले सरकार हा चांउर (चांवल) मंगाय रिहिसे। ओकर न भात मिठावत रिहिसे न बासी। बासी ल हाथ मं धरते ते पच-पच ले हो जात रिहिसे। अइसन ओ बइरी देस हे, जेन हा सड़े-गले चावल अउ गहूं ल भेजे रिहिसे। ओ अनाज ल जानवर मन खाथे, तेला भारत मं भेज रिहिस हे। छिनमिनहा छत्तीसगढ़ कइसनो करके जीव परान ल बचाना रिहिसे, ओ बिपत के दिन ले गुजारिन।
ओ अकाल ह छत्तीसढ़िया मन ल हिला के रख दीस। इही पइत ले गांव के मनखे मन शहर कोती झांकना शुरू करिन हे, रोजी-रोटी कमाय खातिर शहर वाले मन घला, भोला-भाला सिधवा जान के लुटे मन कोनो कमी नइ करिन। 
गरीब के कोनो देखइया, सुनइया नइहे। न तब रिहिस, न आजो हे। सरकार, उद्योगपति, सेठ, साहूकार अउ बड़े-बड़े मन के बोलबाला हे। सब ठगराज बने बइठे हे। मस्त हे गरीब बासी खा-खाके, बासी ही ओकर मन के माखन  मिसरी हे। नवतपा मं तो सब बोरे बासी झड़के हे अथान के चटनी अउ गोंदली के संग मं। एकर ले बड़े सुख अउ का लेबे?
जाती-बिराती
 
बटकी मं बासी अउ चुटकी मन नून।
मंय गावत हौं ददरिया तंय कान दे के सुन। 
ओ चना के दार राजा, चना के रानीचना के दार  चना के दार गोंदली,
कडकत हे रे।
टुरा परबुधिया,
होटल म भजिया,
धडकत हे रे।
चना के दार राजा,
चना के दार रानी,
हो हो होई रे,,,,
 
 
-परमानंद वर्मा 


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