ब्रेकिंग न्यूज

सुनो भाई उधो, नाटक जिनगी के...

12-Jul-2024
 परमानंद वर्मा ( शोर संदेश )  लोग किसी का सुख, आगे बढ़ते, खाते-पीते, विकास के नए सोपान गढ़ते नहीं देख सकते, क्योंकि तकलीफ होती है जबकि अपनी मेहनत और पुरुषार्थ से आगे बढ़ते हैं। सुख, आनंद और विकास पर किसी एक व्यक्ति का, वर्ग का एकाधिकार तो नहीं है। लेकिन हां, समाज में ऐसी विद्रुपता, बुराई देखने को मिलती है। बढ़ते हुए व्यक्ति, वर्ग व समाज का ऐसा टांग खींचते हैं, गिरा देते हैं कि एक गिलास पानी के लिए तड़पता रह जाता है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी तथा-कथा...
परछी मं अलदहीन काकी मइरसा मं दही ला बिलोवत रिहिसे। ओ डाहर एक कोती ढेकी मं सुकवारो अउ रामहीन एक बोरा धान ला कूटत राहय। फेकन काकी हा खोवत राहय तब दुकलहीन हा कुटे चाउंर ला छीनत-निमारत राहय। 
फेंकन काकी हा अलदहीन ला पूछथे- कस ओ दीदी, एक-डेढ़ घंटा ले ऊपर होगे, दही ला बिलोवत अभी ले लेवना नइ निकले हे का?
आधा मइरसा ले ऊपर हे फेकन दीदी दही हा, देख ना बिलोवत-बिलोवत थकासी असन लगे ले धर ले हे, तभो ले ये चंडाल लेवना हा निकले के नांव नइ लेवत हे। ओकर बात ल सुनके फेकन हा मजाक करत कहिथे- सिद्धो मं लइका नइ होय रे अलदहीन, बारा कुंआ मं बांस डारबे तब कहूं जाके सिद्ध परथे, हांसत-खेलत लइका ल पाबे?
कहां के बात ल कहां घुमा फिराके कोन कोती ले जाय के अक्कल तो तहीं सीखे हस बहिनी, हमन अइसन लटर-पटर ला नइ जानन। फेकन अउ अलदहीन मं अइसने हास-परिहास चलत रिहिसे ततके बेर सुकवारो आथे अउ बताथे- तोर बहू सतवंतीन हा कलहरत हे। 
दही बिलोवत रिहिसे तउन बुता ल गनेसिया ल देथे अउ कहिथे- मंय देखत हौं का बात हे। बहू के हरू-गरू होय के समे आगे रिहिसे। ओकर कुरिया मं जाके देखथे तब बहू दरद के मारे छटपटावत, कलहरत, चिल्लावत हे- मरगेंव दाई, मरगेंव ददा, मोर परान छटके लेवत हे, बचा ले दाई। 
अलदहीन जानगे, जचकी के बेरा हे। अपन बहू तीर जाथे तब ओकर  हाथ ल कस के पकड़ लिस अउ कहिथे- दाई मोर परान ल बचा ले, नइ बाचौं तइसे लागथे। 
अपन गोसइया शिव परसाद करा अलदहीन हा गांव मं जचकी कराथे तउन दाई केजिया बाई ल बलवाय बर संदेश भेजवाथे। ओहर आथे अउ ओ दे घंटा भर के भीतर सुंदर एक बेटा के जनम के होथे। 
केजिया परछी मं आके सबो झन ल बेटा अवतरे हे कहत बधाई देथे, सबो झन के चेहरा मारे खुशी के फूले नइ समाइस। शिव परसाद केजिया ला सौ रुपिया के नोट निछावर मं देथे। खोर मं एक ठन दनाका फटाका फूटिस तब जानगे, शिव  परसाद  इहां लइका अवतरे हे। 
समे गुजरत का लगथे, थोरको पता नइ चलय। एक दिन ये हांसत-खेलत परिवार ऊपर अइसे पहाड़ टूटगे के गांव के मालगुजार चालाकी करके ओकर जम्मो जायदाद ल तोर बाप हा मोर से करजा ले रिहिसे कइके छीन लिस। रोइस, गिड़गिड़ाइस फेर शिव परसाद के एक नइ सुनिस ओ गौंटिया हा। 
बेघरबार शिव परसाद उही दिन गांव छोड़े के परन कर लिस। शहर आके बनी-भूती करके अपन लोग-लइका के लालन-पालन  करे लगिस। शिव परसाद अउ अलदहीन अब बाजार मं सब्जी बेचे के धंधा करिस। 
बहू के जउन बेटा होय रिहिसे तेन मिस्त्री बनगे अउ घर-मकान बनावत-बनावत, सुंदर जमीन खरीद के खुद के अपन घर बना डरिस। धंधा चल परिस। अब मिस्त्री घला समे बीते के बाद अपन बेटा के बिहाव करथे। साल-दू-साल बाद ओकरो एक झन सपूत बेटा के जन्म होथे। दिन बहुरत समे नइ लागय कहिथे तइसने कस अलदहीन के भाग लहराय ले लग गे, फेर अपन ठेला पेलके बाजार जवई अउ साग-सब्जी बेचना आज ल नइ छोड़े हे। 
भगवान भरपूर भर देहे घर ला, डोकरा होगे हे शिव परसाद धकर-धकर करत हे फेर डोकरी ओला भसेड़त कइसनो करके बाजार ले जथे अउ ओला कहिथे- मरते दम तक हम धंधा ल नइ छोड़न। जेकर परसादे अतेक बढ़े हन, पनके हन, ओला तियागन नहीं, इही हमर मालिक हे, भगवान हे। 
देख तो देख अलदहीन अउ शिव परसाद के भाग ला, ओकर नाती गया परसाद बेंगलोर मेकेनिकल इंजीनियर बनगे हे। पच्चीस लाख के पैकेज हे ओ बाबू हा अपन दादी-दादा ल लाख मनाय के कोशिश करथे अउ कहिथे- अब तुमन ला ये धंधा करे के जरूरत नइहे। अतेक करेव। मैं ठाढ़ होगे हौं, कमाहौं, तुंहर घर ल भरिहौं, लबालब कर देहौं। 
नाती के बात ल सुनके अलदहीन अउ शिव परसाद के आंखी डहर ले आंसू झरे ले धर लेथे अउ ओकर सिर मं हाथ फेरत कहिथे- तोर मुंह मं दूध-भात बेटा। तोर बिहाव कर देथौं, सुंदर पुतरी कस बहू ला देथौं तहां ले ना छोड़ देबो ये धंधा ला। 
शिव परसाद गांव के मालगुजार के अतियाचार के सुरता करत ओकर धियान अपन जुन्ना घर-दुआर कोती चले जाथे। कइसे रेहेन, कइसे होगेन। बने दिन बहुरिस तेकर बर भगवान ल बधाई देवत कहिथे- जय होवय मालिक, जय होवय तोर। मोला जइसे दिन देखाय हस तइसे अउ कोनो ल झन देखावे।
 

 



leave a comment

Advertisement 04

kalyan chart

Feedback/Enquiry



Log In Your Account