परमानंद वर्मा बोरसी (बेमेतरा), ( शोर संदेश ) बस्तर और बलौदाबाजार में दनादन बाजा बज रहा है। कहीं बारूद, कहीं बंदूक की गोलियां तो कहीं तोड़फोड़, उत्पात। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सुशासन के स्वर लहरी छत्तीसगढ़ भर में गूंज रही है। छत्तीसगढ़ हम ही बनाए हैं तो हम ही इसे संवारेेगे भी। साय साहब सत्ता संभालते ही घट रही इन घटनाओं से 'सांय... सांय... कर रहे हैं तो वहीं जनता 'रांय... रांय... कर रही है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख...
मुसुआ ल देख के बिलई भागत हे, बिलई ल देखके कुकुर दुम हिलावत कोलकी कोती जाके जीव लुकावत हे, कुकुर ल देख के बेंदरा पेड़ मं जाके परान बचावत हे, मछरी ल देख के कोकड़ा दुबकत हे, मनखे ल देख के मगर तरिया भीतर पानी मं बूड़ जावत हे। अउ चोर-डाकू ल देखके पुलिस डेर्रावत हे। याहा का उलटा नदिया-नरवा बोहाय ले धर ले हे। वइसन कस हाल जनता ल देखके सरकार घला डेर्राय कस होगे हे।
समे अउ इतिहास अपन आप दुहराथे, कहिथे तउन सही बात हे का? कोनो-कोनो सियान, गुनी अउ पंडित-महराज मन अब अइसे केहे ले धर ले हे, बने खुलके तो नइ काहत हे फेर आधा डर-आधा बल करके ये काहत हे, कलजुग के मियाद खतम होगे हे या फेर ओकर चला-चली के बेरा हे तेकर सेती जाते जात अपन 'अटपट राजा चउपट नगरी, टका सेर भाजी टका सेर खाजा कस खेल देखावत हे।
जइसन कभू नइ होय हे, कभू देखे-सुने ले नइ मिले हे तइसन-तइसन चरित्तर होय ले धर ले हे। सब नाक-कान कटा डरे हे। जुन्ना संस्कार, संस्कृति, रहन-सहन, बोली-बतरा, खान-पान, पहिनावा-ओढ़ावा सब धीरे-धीरे, एक-एक करके नंदावत जात हे। ये कलजुग जाती-बिराती हद करत हे। दाई, बहिनी, बेटी, बहू का करत भये... सुनबे देखबे ते बक्खाय असन लगथे। मुंह मं कपड़ा बोज के राह, आंखी ल मूंद के राह तभे कलियान हे, कुछु बोले, केहे तब खैर नइहे।
होनी तो होके रहिथे, ओला कोनो रोक नइ सकय। कहिथे नहीं, कुछ करनी कुछ करम गति, कु्छ पुरबल के भाग, जाम्बुक तो अइसा कहे तैं का के हे रे काग? नदिया, नरवा,तरिया, ढोलगा, जंगल, पहाड़, रुख-राई, पशु-पक्षी सब रोवत हे। बड़ करलई के दिन आगे हे। दुख के पहाड़ सब के ऊपर खपलागे हे। सब भागे-भागे फिरत हे। कहां जाही, कोन बचाही, कोन हे मालिक?
लंका ल कोन जलइस बेंदरा। अशोक वाटिका ल कोन उजारिस बेंदरा? जउन जघा गलत काम होथे, तउन मन गलत करथे वइसन जघा ल जलाय अउ उझारे के काम बेंदरा मन करथे। बेंदरा मन कोन हे भगवान राम के गण होथे, सेना, सिपाही होथे। धरम के हियाव, रक्षा करना ओकर मन के धरम हे, काम हे, जइसे एक बेंदरा ला देख के लंका के राक्षस मन मैदान छोड़ के भाग गे, वइसने कस काम बलौदाबाजार मं होगे। जब-जब जउन मन धरम ल हानि, नुकसान पहुंचाथे, धरम देवता रूप धर के अपन गण ल उहां भेज देथे। भगवान केहे हे- 'धर्म संस्थापनार्धाय संभवामि युगे-युगे...।
अब सब एती गुना-भाग करे मं लगे हे के ये कइसे होगे, कोन करिस, काबर करिस। अतेक दिन ले उहां खिचड़ी चुरत रिहिसे, तब सरकार, जनप्रतिनिधि अउ नौकरसाह का आंखी-कान मूंद के बइठे रिहिन हे? तरिया-कुआं, नदिया मं जइसे कोनो बूड़त रहिथे तब भगवान वइसन मनखे ल बचाय खातिर तीन बार मौका देथे। उझाल देथे ताकि कोनो देख सकय त बूड़त जीव के रक्षा कर दय। कोनो नइ देखिही तहां ले ओकर सीताराम हो जथे वइसने कस हाल बलौदाबाजार के होगे।
सब जीव-जन्तु परेशान, हाथी, बेंदरा, सियार, शेर, भालू सब अब गांव-गांव भटके ले धर ले हें। जंगल साफ होगे हे, नदिया-नरवा, तरिया सब झुक्खा परगे हे, ए जानवर मन मनखे मन ल खाय बर दउड़ावत हे, पटकत हे, मारत हे। अब एती का होही, कइसे होही तेला भगवान जानय अउ सरकार।