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किसान

फूलों की खुशबू और आमों की बहार से महक रही पेण्ड्री की शासकीय उद्यान रोपणी

16-May-2026
रायपुर,  ।  (शोर संदेश) मई की झुलसाती गर्मी में जहां लोग पेड़ों की छांव और ठंडी हवा की तलाश में भटकते नजर आते हैं, वहीं राजनांदगांव शहर के पेण्ड्री स्थित शासकीय उद्यान रोपणी में कदम रखते ही मौसम का मिजाज बदला-बदला सा महसूस होता है। रंग-बिरंगे फूलों से सजी क्यारियां, फलों से लदे वृक्ष और हरियाली से आच्छादित परिसर यहां आने वाले हर व्यक्ति को सुकून और ताजगी का एहसास कराते हैं।
ग्रीष्म ऋतु के बावजूद पेण्ड्री की यह बगिया इन दिनों पूरी तरह खिली हुई है। गुलाब, गंधराज, हरसिंगार, चंपा और बोगनविलिया की महक से वातावरण सुवासित है। वहीं आम्रपाली, लंगड़ा, दशहरी, चौसा और बाम्बेग्रीन जैसी आम की प्रजातियों से लदे पेड़ उद्यान की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे हैं। 
पेण्ड्री की यह रोपणी केवल सुंदरता का केंद्र नहीं है, बल्कि आधुनिक उद्यानिकी और उन्नत कृषि तकनीक का भी महत्वपूर्ण केन्द्र बन चुकी है। यहां स्थापित प्लग टाइप वेजीटेबल सीडलिंग प्रोडक्शन यूनिट किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। जापानी पद्धति पर आधारित इस यूनिट में तापमान, नमी और प्रकाश को नियंत्रित कर पौध तैयार किए जाते हैं, जिससे कम समय में बेहतर गुणवत्ता वाले अंकुरित पौधे मिलते हैं। इन दिनों यूनिट में योगी नामधारी मिर्च की पौध तैयार की जा रही है। किसान स्वयं अपने बीज यहां देकर थरहा तैयार करवा रहे हैं। डीएमएफ मद से यूनिट के जीर्णाेद्धार के बाद यहां फिर से बड़े पैमाने पर किसानों को गुणवत्तायुक्त पौधे उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
इस आधुनिक तकनीक की खासियत यह है कि इसमें मिट्टी का उपयोग नहीं होता। नारियल बुरादा, परलाईड और वर्मी कोलाईट जैसे माध्यमों से पौध तैयार किए जाते हैं। मशीनरी स्वींग मेथड से बीजों का अंकुरण किया जाता है, जिससे पौधे रोगमुक्त और एक समान वृद्धि वाले बनते हैं। टमाटर, बैंगन, पत्ता गोभी, फूलगोभी, खीरा, करेला, लौकी और कद्दू जैसी सब्जियों की पौध यहां तैयार की जा रही है। 
विशेषज्ञ बताते हैं कि इस पद्धति से तैयार पौधों की खेत में जीवित रहने की क्षमता अधिक होती है और फसल जल्दी तैयार होती है। यही कारण है कि अब किसान आधुनिक सीडलिंग तकनीक की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। पेण्ड्री की समृद्ध नर्सरी में फलदार, छायादार और सजावटी पौधों की बड़ी श्रृंखला उपलब्ध है। यहां आम, अमरूद, संतरा, आंवला, लीची, अनार, पपीता, नारियल, चीकू और मुनगा जैसे पौधों के साथ अशोक, सिल्वर ओक, कदम और पीपल जैसे वृक्ष भी मिलते हैं। वहीं जरबेरा, रजनीगंधा, कनेर, यूफोर्बिया, एक्जोरा और मनीप्लांट जैसे सजावटी पौधे लोगों को खासा आकर्षित कर रहे हैं। पेण्ड्री की यह बगिया केवल हरियाली का ठिकाना नहीं, बल्कि किसानों के लिए आधुनिक खेती की प्रयोगशाला बन गई है।

 


योजना, मार्गदर्शन और नवाचार से समृद्धि की नई कहानी

01-May-2026
रायपुर(शोर संदेश) । बदलती कृषि पद्धतियों और शासन की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का सशक्त उदाहरण सक्ती जिले के डभरा तहसील अंतर्गत ग्राम जवाली के किसान  रामकुमार पटेल ने प्रस्तुत किया है। सीमित संसाधनों के बावजूद सूझबूझ, मेहनत और कृषि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन के बल पर उन्होंने खेती को लाभकारी बनाते हुए समृद्धि की नई राह तैयार की है।
लगभग ढाई हेक्टेयर कृषि भूमि के स्वामी पटेल वर्ष 2024-25 तक ग्रीष्मकालीन धान की खेती करते थे। हालांकि, बढ़ती लागत और अपेक्षाकृत कम लाभ के कारण उन्हें संतोषजनक आय प्राप्त नहीं हो पा रही थी। ऐसे में वर्ष 2025-26 में कृषि विभाग के अधिकारियों ने उन्हें फसल विविधीकरण अपनाने, विशेषकर सरसों की उन्नत खेती और कम लागत में अधिक उत्पादन देने वाली तकनीकों की जानकारी दी।
विभागीय मार्गदर्शन से प्रेरित होकर पटेल ने धान की जगह सरसों की खेती अपनाने का निर्णय लिया। राष्ट्रीय मिशन ऑन एडिबल ऑयल-ऑयल सीड्स योजना के अंतर्गत उन्हें 1.00 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए सरसों की उन्नत किस्म पीएम-32 उपलब्ध कराई गई। इसके साथ ही आवश्यक कृषि आदान सामग्री और समय-समय पर तकनीकी परामर्श भी दिया गया। उन्नत बीज, वैज्ञानिक पद्धतियों और सतत मार्गदर्शन का परिणाम यह रहा कि उन्हें सरसों की पीएम-32 किस्म से लगभग 12.45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त हुआ। कुल 2.432 हेक्टेयर में उन्होंने 26.20 क्विंटल सरसों का उत्पादन किया।
पटेल ने बीते दिनों प्राथमिक सेवा सहकारी समिति कोटमी में 23 क्विंटल सरसों बीज 6200 रुपये प्रति क्विंटल की दर से विक्रय किया, जिससे उन्हें कुल 1,42,600 रुपये की आय प्राप्त हुई। कम लागत में बेहतर लाभ ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया, बल्कि खेती के प्रति उनका विश्वास भी और सुदृढ़ हुआ है।
रामकुमार पटेल ने अपनी सफलता का श्रेय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और कृषि विभाग को देते हुए आभार व्यक्त किया। उनकी इस उपलब्धि से प्रेरित होकर अब गांव के अन्य किसान भी फसल परिवर्तन, जल संरक्षण और सरसों जैसी लाभकारी फसलों की खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं। स्वयं पटेल भी किसानों को शासकीय योजनाओं और आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी देकर उन्हें आत्मनिर्भर और समृद्ध बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।



 

हरी खाद से समृद्ध खेती: बढ़ेगा उत्पादन, सुधरेगी मिट्टी की सेहत

30-Apr-2026
रायपुर (शोर संदेश) आज के दौर में टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना समय की मांग है। रसायनों के बोझ तले दबती मिट्टी को राहत देने के लिए हरी खाद एक बेहतरीन समाधान बनकर उभरी है। यह न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन की उर्वरता को भी सुरक्षित रखती है। मिट्टी बचेगी, तो किसान बचेगा और किसान बचेगा, तो देश समृद्ध होगा।
कृषि विभाग द्वारा किसानों को खेती में हरी खाद के उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और उत्पादन में सुधार लाने में मदद मिल सके। विभाग के अनुसार धान के खेतों में लगातार रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से मिट्टी में लाभदायक सूक्ष्म जीवों की गतिविधियां कम हो रही हैं और मिट्टी की संरचना भी प्रभावित हो रही है।
हरी खाद वह सहायक फसल है जिसे मुख्य फसल बोने से पहले खेत में उगाया जाता है और फूल आने की अवस्था में ही उसे हल चलाकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग और उड़द जैसी फसलें हरी खाद के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। हरी खाद के तहत कई फसलों का उपयोग किया जाता है जिनमें दलहनी और बिना दलहनी फसलें शामिल होती हैं। हरी खाद के लिए झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियों, टहनियों को भी उपयोग में ला सकते हैं, लेकिन इसके लिए विशेष रूप से ढैंचा फसलों का उपयोग किया जाता है। इन फसलों को खेतों में लगाकर भूमि में सुधार किया जाता है।
हरी खाद का सबसे बड़ा प्रभाव मिट्टी की भौतिक और रासायनिक संरचना पर पड़ता है। यह मिट्टी में नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थों (ह्यूमस) की मात्रा को तेजी से बढ़ाती है। हरी खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाती है, जिससे हवा का संचार बढ़ता है और पौधों की जड़ें गहराई तक जा पाती हैं। इसके उपयोग से मिट्टी की पानी सोखने की शक्ति बढ़ जाती है, जो सूखे के समय फसलों के लिए जीवन रक्षक साबित होती है।
जब मिट्टी स्वस्थ होती है, तो उत्पादन का बढ़ना निश्चित है। हरी खाद के प्रयोग से पैदावार में 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है। यूरिया और अन्य रासायनिक खादों पर निर्भरता कम हो जाती है, जिससे किसान की फसल की लागत घटती है। मित्र कीटों से फसल का संरक्षण करता है। यह जमीन के भीतर लाभकारी सूक्ष्मजीवों और केंचुओं की संख्या बढ़ाने में मदद करती है।
क्षेत्र की जलवायु के अनुसार सनई या ढैंचा का चुनाव करें। बुवाई का समय मानसून की शुरुआत (जून-जुलाई) इसके लिए सबसे उपयुक्त है। जब फसल लगभग 40-50 दिन की हो जाए और उसमें फूल आने लगें, तब उसे पाटा लगाकर या रोटावेटर की मदद से मिट्टी में मिला दें। पलटने के बाद 10-15 दिनों तक खेत में नमी बनाए रखें ताकि खाद अच्छी तरह सड़कर मिट्टी का हिस्सा बन जाए।
हरी खाद केवल एक उर्वरक नहीं है, बल्कि यह मिट्टी का उपचार है। यदि किसान हर दूसरे या तीसरे साल अपने खेत में हरी खाद का प्रयोग करें, तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि हम समाज को रसायनों से मुक्त, शुद्ध और पौष्टिक अनाज भी उपलब्ध करा पाएंगे।
हरी खाद का उपयोग कृषि के लिए एक ष्वरदानष् के समान है। वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है, ऐसे में हरी खाद (ळतममद डंदनतम) प्राकृतिक तरीके से मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सुलभ विकल्प है।
कृषि विभाग द्वारा खरीफ फसल से पूर्व हरी खाद के बीज उपलब्ध कराने की भी पहल की जा रही है। इसके लिए क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से किसानों से मांग लेकर बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।

फूलों की खुशबू से महकी किस्मत ईश्वरचरण पैकरा का

28-Apr-2026
रायपुर,। (शोर संदेश)  परंपरागत खेती (गेहूं-धान) की तुलना में फूलों की खेती कम लागत में 3-4 गुना तक अधिक मुनाफा दे रही है। गेंदा, गुलाब और गुलदाउदी जैसे फूलों की 12 महीने मांग होने से किसान हर सीजन में बंपर कमाई कर रहे हैं। कम पूंजी से शुरू होकर, यह व्यवसाय प्रति हेक्टेयर लाखों रुपये का शुद्ध लाभ दे रहा है, जिससे किसान आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रहे हैं।  शादी, पार्टी, त्यौहार और धार्मिक आयोजनों में फूलों की मांग साल भर बनी रहती है, जिससे अच्छी कीमतें मिलती हैं।
राज्य शासन की योजनाओं का लाभ लेकर रायगढ़ जिले के किसान अब परंपरागत खेती से आगे बढ़ते हुए उद्यानिकी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी कड़ी में लैलूंगा विकासखंड के ग्राम गमेकेरा निवासी किसान ईश्वरचरण पैकरा ने राष्ट्रीय बागवानी मिशन से फूलों की खेती अपनाकर अपनी आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि की है। किसान की सफलता आज सबके लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है।
पैकरा पहले परंपरागत रूप से धान की खेती किया करते थे, जिसमें मेहनत के मुकाबले आय सीमित थी। वर्ष 2025-26 में उन्होंने उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में 0.400 हेक्टेयर भूमि पर गेंदा फूल की खेती शुरू की। विभाग द्वारा तकनीकी सहयोग एवं आवश्यक मार्गदर्शन मिलने से उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति से खेती की, जिसका परिणाम बेहद सकारात्मक रहा। जहां पहले धान की खेती से उन्हें लगभग 11 क्विंटल उत्पादन मिलता था और सीमित आय होती थी, वहीं फूलों की खेती से उन्हें करीब 38 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ। इस उत्पादन से उनकी कुल आमदनी लगभग 3 लाख 4 हजार रुपये तक पहुंच गई। लागत निकालने के बाद उन्हें लगभग 2 लाख 59 हजार रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ, जो पारंपरिक खेती की तुलना में कई गुना अधिक है।
फूलों की खेती में सफलता मिलने के बाद पैकरा का आत्मविश्वास बढ़ा है। वे बताते हैं कि कम समय में अधिक लाभ मिलने के कारण अब वे इस खेती को और विस्तार देने की योजना बना रहे हैं। उनके खेत में खिले गेंदा फूलों की रंगीन पंक्तियां आज उनकी मेहनत और सफलता की कहानी बयां करती हैं। उनकी इस उपलब्धि को देखकर गांव के अन्य किसान भी अब उद्यानिकी फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और विभाग से संपर्क कर फूलों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। इस प्रकार राज्य शासन की योजनाएं न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हो रही हैं, बल्कि कृषि के स्वरूप में भी सकारात्मक बदलाव ला रही हैं।







 

जैविक खेती को बढ़ावा, जशपुर में हरी खाद से सुधरेगी मिट्टी की सेहत

28-Apr-2026
रायपुर, । (शोर संदेश)  मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में टिकाऊ और जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। इसी क्रम में जशपुर जिले में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के उद्देश्य से हरी खाद के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
कृषि विभाग द्वारा जिले के सभी विकासखंडों में इस वर्ष 600 हेक्टेयर क्षेत्र में हरी खाद का प्रदर्शन किया जा रहा है। किसानों से अपील की गई है कि वे कृषि विभाग के मैदानी अमले से संपर्क कर हरी खाद तकनीक अपनाएं, जिससे मिट्टी की सेहत में सुधार के साथ दीर्घकालीन उत्पादकता सुनिश्चित हो सके।
हरी खाद के अंतर्गत ढेंचा, सनई, मूंग, उड़द और बरसीम जैसी फसलों को खेत में उगाकर 40 से 50 दिन बाद जुताई कर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके पश्चात 2 से 3 सप्ताह बाद मुख्य फसल की बुवाई की जाती है। यह प्रक्रिया मिट्टी में प्राकृतिक पोषक तत्वों की पूर्ति करती है।
हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन, पोटाश एवं अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है, साथ ही जैविक पदार्थों में वृद्धि होती है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बेहतर होती है और भूमि भुरभुरी एवं अधिक उपजाऊ बनती है। हरी खाद अपनाने से रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया, की आवश्यकता में कमी आती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हरी खाद का उपयोग कम लागत में अधिक लाभ देने वाला उपाय है, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक है। राज्य सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयास किसानों को आत्मनिर्भर और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं।




 

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना से फायदा : ग्राफ्टेड टमाटर की खेती से दुबेलाल का बढ़ा मुनाफा

26-Apr-2026
रायपुर,(शोर संदेश) प्रदेश के किसान शासन की योजनाओं का लाभ लेकर और आधुनिक खेती किसानी की तकनीकों को अपनाकर अपनी आमदानी में इजाफा कर रहे हैं। ऐसे ही महासमुन्द जिले के अंतर्गत ग्राम बम्बुरडीह के किसान दुबेलाल कोसरे ने आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर उल्लेखनीय सफलता अर्जित की है। कोसरे, बताते हैं कि पूर्व में वे पारंपरिक रूप से धान एवं अन्य फसलों की खेती करते थे। इस पारंपरिक खेती में लागत अपेक्षाकृत अधिक होने के बावजूद उन्हें सीमित लाभ ही प्राप्त हो पाता था, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पा रहा था।
वर्ष 2025-26 में उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में उन्हें यह जानकारी प्राप्त हुई कि उद्यानिकी फसलों के माध्यम से कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन एवं अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है। इस जानकारी से प्रेरित होकर उन्होंने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत ग्राफ्टेड टमाटर सीडलिंग प्रदर्शन घटक का लाभ लिया। कोसरे बताते है कि योजना के तहत उन्हें 30 हजार रुपए का अनुदान भी प्राप्त हुआ, जिससे उन्होंने अपने 0.40 हेक्टेयर सिंचित भूमि में आधुनिक तकनीक के माध्यम से ग्राफ्टेड टमाटर की खेती प्रारंभ की।
कृषक दुबेलाल कोसरे द्वारा उच्च गुणवत्ता वाली ग्राफ्टेड पौध, सिंचाई हेतु ड्रिप प्रणाली तथा खरपतवार नियंत्रण के लिए मल्चिंग तकनीक का उपयोग किया गया। वे बताते हैं कि उन्नत तकनीकों के समुचित उपयोग से उन्हें प्रति एकड़ लगभग 16 से 18 टन तक उत्पादन प्राप्त हुआ। बाजार में टमाटर का औसत विक्रय मूल्य लगभग 20 रुपए प्रति किलोग्राम मिलने से उन्हें कुल लगभग 3 लाख 9 हजार रुपए का लाभ प्राप्त हुआ। यह लाभ धान की खेती की तुलना में कई गुना अधिक रहा, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। कोसरे द्वारा अन्य किसानों को उन्नत तकनीकों को अपनाने तथा बाजार की मांग के अनुरूप फसल उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा हैं। उनके मार्गदर्शन से ग्राम बम्बुरडीह के अन्य कृषक भी उद्यानिकी फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और आधुनिक खेती को अपनाने लगे हैं।

एक्सटेंशन रिफॉर्म (आत्मा) योजना से गोविंद जायसवाल की बढ़ी आमदनी

25-Apr-2026
रायपुर(शोर संदेश), 25 अप्रैल 2026 कृषि विभाग की एक्सटेंशन रिफॉर्म (आत्मा) योजना किसानों के लिए आय बढ़ाने का सशक्त माध्यम बन रही है। इसका सफल उदाहरण मुंगेली जिले के कृषक गोविंद जायसवाल हैं, जिन्होंने योजना के तहत सरसों फसल से बेहतर लाभ अर्जित किया है। रबी वर्ष 2025-26 में आत्मा योजना के अंतर्गत उन्हें सरसों की उन्नत किस्म पी.एम.-32 का बीज 01 एकड़ क्षेत्र के लिए निःशुल्क उपलब्ध कराया गया। इसके साथ ही उनके गांव में कृषक खेत पाठशाला का आयोजन किया गया, जिसमें उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई।
कृषक जायसवाल ने बताया कि प्रशिक्षण कार्यशाला के माध्यम से उन्हें बीज उपचार, खरपतवार प्रबंधन एवं सरसों की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट एफिड से बचाव के लिए आवश्यक तकनीकी जानकारी दी गई। साथ ही कृषि विभाग द्वारा फफूंदनाशक एवं कीटनाशक दवाइयां भी निःशुल्क उपलब्ध कराई गईं। उन्होंने आगे बताया कि उन्नत तकनीकों के उपयोग और विभागीय मार्गदर्शन के परिणामस्वरूप प्रति एकड़ लगभग 06 क्विंटल सरसों का उत्पादन प्राप्त हुआ। सरसों के उत्पादन में वृद्धि और लागत में कमी के कारण उन्हें लगभग 25 हजार रुपये का शुद्ध लाभ हुआ। गोविंद जायसवाल ने इस सफलता के लिए कृषि विभाग एवं आत्मा योजना के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस योजना ने उनकी खेती को लाभकारी बनाया है।
 

हरी खाद और नील-हरित काई से खेती को मिलेगी नई दिशा

24-Apr-2026
रायपुर,(शोर संदेश) खेती की बढ़ती लागत और मृदा की गिरती उर्वरता के बीच मुंगेली जिला प्रशासन ने टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। कलेक्टर के निर्देशन में कृषि विभाग द्वारा किसानों को रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग के साथ-साथ जैविक विकल्प अपनाने के लिए जागरूक किया जा रहा है।
जिले में ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से गांव-गांव में शिविर और चौपाल आयोजित किए जा रहे हैं, जहां किसानों को हरी खाद और नील-हरित काई (ब्लू-ग्रीन एल्गी) के उपयोग और लाभों की जानकारी दी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन प्राकृतिक विकल्पों के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, उत्पादन लागत में कमी आती है तथा मृदा की उर्वरता और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।
कृषि विभाग के उपसंचालक ने बताया कि किसानों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से बीज निगम, धरमपुरा में नील-हरित काई उत्पादन हेतु आवश्यक संरचना का निर्माण किया जा रहा है। अधिकारियों द्वारा निर्माण प्रक्रिया का अध्ययन करते हुए इसे ग्राम स्तर तक विस्तारित करने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है। उन्होंने बताया कि जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वे स्वयं नील-हरित काई का उत्पादन कर अपने खेतों में इसका उपयोग कर सकते हैं। इसके लिए विभाग द्वारा “मदर कल्चर” उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे अधिक से अधिक किसान इस तकनीक को अपनाकर लाभान्वित हो सकें।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि हरी खाद और नील-हरित काई के उपयोग से न केवल खेती की लागत में कमी आएगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ टिकाऊ कृषि प्रणाली को भी सुदृढ़ किया जा सकेगा।

 

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से बदली तस्वीर

23-Apr-2026
रायपुर । (शोर संदेश) ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर एवं आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से संचालित राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ कोंडागांव जिले में सकारात्मक बदलाव की मिसाल प्रस्तुत कर रहा है। इसी कड़ी में कोण्डागांव जिले के फरसगांव विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत गट्टीपलना की निवासी सिदाय नेताम आज एक सफल कृषक उद्यमी के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। उनकी सफलता न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र की महिलाओं के लिए प्रेरणादायक है।
फरसगांव से लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम गट्टीपलना की श्रीमती सिदाय नेताम ‘शिव शक्ति स्व-सहायता समूह’ से जुड़ी हुई हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत उन्हें बैंक लिंकेज के माध्यम से 50 हजार रुपये की वित्तीय सहायता प्राप्त हुई, जिसने उनके जीवन में परिवर्तन की दिशा तय की।
मिशन के तहत कार्यरत टीम एवं इंटीग्रेटेड फार्मिंग क्लस्टर के माध्यम से उन्हें आधुनिक एवं वैज्ञानिक खेती की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया। मल्चिंग, ड्रिप इरिगेशन जैसी उन्नत विधियों के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाले बीजों के उपयोग की जानकारी भी प्रदान की गई। इन तकनीकों को अपनाते हुए सिदाय नेताम ने टमाटर, करेला एवं पॉपकॉर्न मक्का की खेती प्रारंभ की। उन्होंने अपनी कृषि गतिविधियों में कुल 1 लाख 50 हजार रुपये का निवेश किया। उनकी मेहनत, लगन और वैज्ञानिक पद्धतियों के उपयोग का परिणाम यह रहा कि उन्हें 3 लाख 60 हजार रुपये की कुल आय प्राप्त हुई, जिससे 2 लाख 10 हजार रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित हुआ।
यह सफलता केवल आर्थिक उपलब्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे उनके आत्मविश्वास में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्तमान में वे अपने गांव एवं आसपास के क्षेत्रों में “कृषि सखी” के रूप में कार्य करते हुए अन्य महिलाओं को आधुनिक खेती, जैविक खाद के उपयोग तथा कृषि यंत्रों के समुचित उपयोग के लिए प्रेरित कर रही हैं। प्रशिक्षण एवं वित्तीय सहायता ने उन्हें आत्मनिर्भर बनने का मार्ग दिखाया है। आज वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं तथा बेहतर भविष्य सुनिश्चित कर रही हैं।
जिला प्रशासन एवं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की पहल से जिले में ऐसे अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं, जहां महिलाएं स्व-सहायता समूहों के माध्यम से संगठित होकर आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हो रही है, बल्कि सामाजिक स्तर पर उनकी स्थिति भी सशक्त हो रही है। यदि ग्रामीण महिलाओं को उचित मार्गदर्शन, प्रशिक्षण एवं संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो वे कृषि एवं स्वरोजगार के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर सकती हैं। सिदाय नेताम की सफलता इसी का सशक्त प्रमाण है।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का उद्देश्य ग्रामीण गरीब परिवारों, विशेषकर महिलाओं को स्व-सहायता समूहों के माध्यम से संगठित कर वित्तीय समावेशन, कौशल विकास एवं आजीविका संवर्धन के अवसर प्रदान करना है। जिले में मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन से अनेक परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार देखा जा रहा है। सिदाय नेताम की यह सफलता उनकी मेहनत, लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचायक है। आज वे न केवल अपने परिवार को सशक्त बना रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत भी बनी हुई हैं।

जशपुर में टिकाऊ खेती की पहल, हरी खाद से सुधरेगी मिट्टी की सेहत

18-Apr-2026
रायपुर, (शोर संदेश)   मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में टिकाऊ और जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। इसी क्रम में जशपुर जिले में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के उद्देश्य से हरी खाद के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
कृषि विभाग द्वारा जशपुर जिले के सभी विकासखंडों में इस वर्ष 600 हेक्टेयर क्षेत्र में हरी खाद का प्रदर्शन किया जा रहा है। किसानों से अपील की गई है कि वे कृषि विभाग के मैदानी अमले से संपर्क कर हरी खाद तकनीक अपनाएं, जिससे मिट्टी की सेहत में सुधार के साथ दीर्घकालीन उत्पादकता सुनिश्चित हो सके।
हरी खाद के अंतर्गत ढेंचा, सनई, मूंग, उड़द और बरसीम जैसी फसलों को खेत में उगाकर 40 से 50 दिन बाद जुताई कर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके पश्चात 2 से 3 सप्ताह बाद मुख्य फसल की बुवाई की जाती है। यह प्रक्रिया मिट्टी में प्राकृतिक पोषक तत्वों की पूर्ति करती है।
हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन, पोटाश एवं अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है, साथ ही जैविक पदार्थों में वृद्धि होती है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बेहतर होती है और भूमि भुरभुरी एवं अधिक उपजाऊ बनती है। हरी खाद अपनाने से रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया, की आवश्यकता में कमी आती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हरी खाद का उपयोग कम लागत में अधिक लाभ देने वाला उपाय है, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक है। राज्य सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयास किसानों को आत्मनिर्भर और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं।
 



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