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नैनो यूरिया और नैनो डीएपी से कम लागत में ज्यादा उत्पादन, किसानों को मिल रहा बेहतर लाभ

01-Jun-2026
रायपुर( शोर संदेश  । नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का उपयोग खेती में लागत घटाने और पैदावार बढ़ाने के लिए सबसे आधुनिक तकनीक है। ये पारंपरिक खादों का एक अत्यधिक कुशल, पर्यावरण के अनुकूल और सस्ता विकल्प हैं, जो फसल के पोषण को सीधा पौधों तक पहुंचाते हैं। पारंपरिक खादों का बहुत बड़ा हिस्सा मिट्टी में बेकार चला जाता है। वहीं नैनो खाद पौधों को सीधा पोषण देते हैं, जिससे पोषक तत्वों का उपयोग 80 प्रतिशत से ज्यादा हो जाता है। रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। नैनो उर्वरकों का संतुलित उपयोग मिट्टी में पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकता है।
कृषि के आधुनिक तकनीकों को अपनाकर किसान न केवल अपनी लागत कम कर रहे हैं, बल्कि बेहतर उत्पादन भी ले रहे हैं। ऐसा ही एक उदाहरण महासमुंद जिले के ग्राम कोसरंगी के प्रगतिशील किसान भूषण साहू ने पेश किया है। उन्होंने अपनी धान की फसल में पारंपरिक दानेदार खादों की निर्भरता को कम करते हुए नैनो डीएपी और नैनो यूरिया प्लस (तरल खाद) का सफल प्रयोग किया है, जिससे उनके पौधे अधिक स्वस्थ और फसल का विकास शानदार हुआ है। डिमास्ट्रेशन से मिला भरोसा, आधी हो गई दानेदार खाद की जरूरत किसान भूषण साहू ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि खरीफ 2024 में कृषि विभाग और इफको महासमुंद के क्षेत्रीय अधिकारियों ने उन्हें नैनो यूरिया के प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन) के लिए प्रोत्साहित किया था। 
शुरुआत में पारंपरिक खेती की तुलना में नैनो यूरिया वाले पौधे थोड़े कम हरे दिख रहे थे, लेकिन वे पूरी तरह स्वस्थ थे। जब फसल कटी और उत्पादन की तुलना की गई, तो दोनों का उत्पादन बिल्कुल बराबर था। इसके बाद रबी 2024 में मैंने नैनो डीएपी से बीजोपचार किया और फसल 30-35 दिन की होने पर 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से इसका छिड़काव किया। नतीजा यह रहा कि पारंपरिक दानेदार डीएपी की मात्रा 50 प्रतिशत आधी करने के बाद भी उत्पादन में कोई कमी नहीं आई। इस सफल प्रयोग के बाद से भूषण साहू नियमित रूप से तरल नैनो उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं और उन्होंने अपने खेतों में पारंपरिक दानेदार खादों की खपत को 30 प्रतिशत तक घटा दिया है। उनका कहना है कि यह तकनीक भविष्य की खेती के लिए बेहद लाभकारी है। यह कहना है महासमुंद के किसान भूषण साहू का। 
इस वर्ष खाद की सुचारू आपूर्ति बनाए रखने और किसानों की लागत घटाने के उद्देश्य से कृषि विभाग ने किसानों से अधिक से अधिक तरल खादों नैनो यूरिया प्लस एवं नैनो डीएपी का उपयोग करने की अपील की है। जिले में मांग और खपत को देखते हुए इस वर्ष एक बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया गया है। नैनो डीएपी (500 एम एल) 74 हजार बोतल का लक्ष्य, नैनो यूरिया 500 एम एल 30 हजार 250 बोतल का लक्ष्य रखा गया है।
कृषि विभाग के अनुसार किसानों की सुविधा के लिए विभाग द्वारा नैनो खादों के इस्तेमाल के सही तरीके व वैज्ञानिक विधि की जानकारी दी गई है। बीजोपचा- 1 किलोग्राम बीज में 5 एम एल नैनो डीएपी का घोल अच्छी तरह मिलाएं। मिलाने के बाद 20 मिनट तक छांव में सुखाएं, फिर बुवाई करें। थरहा/रोपा उपचार के लिए 1 लीटर पानी में 5 एम एल नैनो डीएपी मिलाकर घोल तैयार करें। रोपाई से पहले धान के थरहा (पौध) को 20 मिनट तक घोल में डुबोकर रखें। पहला छिड़काव फसल 30-35 दिन होने पर 1 लीटर पानी में 4-5 एम एल नैनो डीएपी और नैनो यूरिया प्लस मिलाएं। जब फसल में पत्तियां अच्छी तरह आ जाएं, तब स्प्रेयर से छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव फूल आने से ठीक पहले 1 लीटर पानी में 4-5 एम एल नैनो यूरिया प्लस का घोल बनाएं। पहले छिड़काव के 25-30 दिन बाद (पोटरी पानी के समय) पत्तियों पर छिड़कें। नैनो उर्वरकों को अधिकांश कीटनाशकों के साथ मिलाकर स्प्रे किया जा सकता है, लेकिन इन्हें कॉपर (तांबा) युक्त कीटनाशकों और फफूंदनाशकों के साथ बिल्कुल न मिलाएं।




 

 


धान की जगह औषधीय खेती से किसानों की आय में कई गुना बढ़ोतरी

28-May-2026
रायपुर, ( शोर संदेश छत्तीसगढ़ शासन के छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड की अभिनव पहल ‘पैडी डायवर्सन मॉडल’ किसानों के लिए आर्थिक समृद्धि का नया मार्ग प्रशस्त कर रही है। पारंपरिक धान की खेती में बढ़ती लागत और सीमित लाभ से जूझ रहे कृषकों के लिए यह योजना एक बेहद सफल और व्यावहारिक विकल्प बनकर उभरी है। इस मॉडल के अंतर्गत किसानों को धान के स्थान पर औषधीय पौधों वच और ब्राह्मी की खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसके परिणामस्वरूप किसान अब कम लागत में अधिक आय अर्जित कर रहे हैं और ग्रामीण आत्मनिर्भरता की एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं।
बोर्ड की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत धमतरी, नारायणपुर, कोंडागांव, बस्तर और रायपुर जिले के 23 गांवों को शामिल किया गया है। इन जिलों के 147 किसानों ने कुल 65 एकड़ भूमि पर पारंपरिक खेती को छोड़कर औषधीय फसलें उगाने में सफलता हासिल की है। वच की खेती 63 किसानों द्वारा 39 एकड़ क्षेत्र में और ब्राह्मी का उत्पादन 84 किसानों द्वारा 26 एकड़ क्षेत्र में किया जा रहा है। यह अभूतपूर्व बदलाव उन क्षेत्रों में देखा जा रहा है, जहां पहले किसान केवल और केवल धान की खेती पर निर्भर थे।
इस योजना के क्रियान्वयन और सफलता में धमतरी जिला सबसे अग्रणी रहा है। धमतरी के 16 गांवों के 90 किसानों ने 27.50 एकड़ भूमि पर वच और ब्राह्मी की खेती कर रिकॉर्ड उत्पादन हासिल किया है। रायपुर जिले के 2 गांवों के 35 किसानों ने भी 11.50 एकड़ में औषधीय खेती अपनाकर शानदार लाभ अर्जित किया है। इसके अतिरिक्त नारायणपुर, कोंडागांव और बस्तर जैसे आदिवासी बहुल व सुदूर क्षेत्रों के किसानों ने भी इस मॉडल को अपनाकर अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
पैडी डायवर्सन मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता न्यूनतम निवेश में अधिकतम रिटर्न सुनिश्चित करना है। आंकड़े इसकी सफलता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। छत्तीसगढ़ शासन की यह दूरदर्शी पहल राज्य में औषधीय संपदा को सहेजने के साथ-साथ किसानों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में एक मील का पत्थर साबित हो रही है।
प्रति एकड़ खेती की कुल लागत लगभग 20 हजार एक वर्ष में ओर शुद्ध लाभ लगभग एक लाख रूपए। पारंपरिक धान की खेती की तुलना में औषधीय पौधों की इस जोड़ी वच और ब्राह्मी से किसानों को कई गुना अधिक शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है। 
छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड किसानों को केवल प्रोत्साहित ही नहीं कर रहा, बल्कि हर स्तर पर मजबूत तकनीकी और व्यावहारिक बैकअप दे रहा है।
किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले औषधीय पौधे पूरी तरह मुफ्त उपलब्ध कराए जाते हैं। किसानों वैज्ञानिक पद्धति से खेती करने के लिए विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। किसानों के आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए उन्हें सफल खेतों का एक्सपोजर विजिट कराया जाता है।  
बाजार की सुनिश्चितता
तैयार उत्पाद की शत-प्रतिशत खरीदी के लिए अनुबंधित संस्थाओं के माध्यम से पुख्ता व्यवस्था की गई है, जिससे किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिली है। आत्मनिर्भरता का नया अध्याय ‘पैडी डायवर्सन मॉडल’ ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही मार्गदर्शन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सुनिश्चित बाजार उपलब्ध हो, तो कृषि को बेहद मुनाफे का सौदा बनाया जा सकता है। आज इस योजना से जुड़े किसान न केवल खुद आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं, बल्कि अन्य पारंपरिक किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन रहे हैं।
 

 


खैराडीह के किसानों को मनरेगा की सौगात, 800 मीटर सिंचाई नाली से खेतों तक पहुंचा पानी

26-May-2026
रायपुर।  (शोर संदेश)  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के प्रयास अब किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं। बलरामपुर जिले के विकासखण्ड शंकरगढ़ अंतर्गत ग्राम पंचायत खैराडीह में निर्मित पक्की सिंचाई नाली किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में मनरेगा के अंतर्गत लगभग 800 मीटर लंबी पक्की सिंचाई नाली का निर्माण कराया गया। इस पहल से गांव के किसानों को अब खेतों तक समय पर और नियमित रूप से पानी उपलब्ध हो रहा है। पहले किसान बारिश पर निर्भर होकर खेती करते थे तथा नहर का पानी खेतों तक पहुंचाने के लिए अस्थायी कच्ची नालियां बनानी पड़ती थीं। हर वर्ष बारिश और टूट-फूट के कारण इन नालियों को नुकसान पहुंचता था, जिससे किसानों की मेहनत और लागत दोनों बढ़ जाती थी।
ग्रामीणों की मांग पर निर्मित पक्की नाली ने अब इस समस्या का स्थायी समाधान कर दिया है। वर्तमान में इस नाली के माध्यम से लगभग 200 से 250 एकड़ कृषि भूमि में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो रही है, जिससे गांव के 11 किसान सीधे लाभान्वित हो रहे हैं। खेतों तक सुचारु रूप से पानी पहुंचने से फसल उत्पादन में वृद्धि हुई है और किसान अब खरीफ के साथ-साथ रबी सीजन में भी खेती कर पा रहे हैं।
किसानों का कहना है कि सिंचाई सुविधा बेहतर होने से खेती की लागत घटी है और उत्पादन बढ़ा है। इससे उनकी आय में वृद्धि होने के साथ आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है। ग्रामीणों ने मनरेगा के तहत कराए गए इस कार्य को गांव के विकास और किसानों की समृद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
जिले में मनरेगा के माध्यम से जल संरक्षण, सिंचाई विस्तार और ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास के ऐसे कार्य लगातार किए जा रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और किसानों का जीवन स्तर बेहतर हो रहा है।
 

 


राजनांदगांव का ग्राम घुपसाल बना मिसाल- कम पानी वाली फसलों से बढ़ा भू-जल स्तर, संकट से मिली मुक्ति

26-May-2026
रायपुर।  (शोर संदेश) छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के छुरिया विकासखंड स्थित ग्राम घुपसाल ने जल संरक्षण और टिकाऊ खेती (सस्टेनेबल फार्मिंग) की दिशा में पूरे प्रदेश के सामने एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया है। पारंपरिक और अधिक पानी की खपत वाली धान की फसल के चक्रव्यूह से बाहर निकलते हुए यहाँ के किसानों ने रबी सीजन में एक सामूहिक व ऐतिहासिक निर्णय लिया। किसानों ने धान के स्थान पर कम पानी में तैयार होने वाली मक्का, दलहन और तिलहन की फसलों को अपनाया, जिसके अत्यंत सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर दिखाई देने लगे हैं। इस अभिनव पहल से न केवल ग्राम का भू-जल स्तर सुधरा है, बल्कि पेयजल और निस्तारी की पुरानी समस्या का भी स्थायी समाधान हो गया है।
ग्राम घुपसाल के इस सफल नवाचार की गूंज प्रशासनिक हलकों तक भी पहुँची। जिला कलेक्टर जितेन्द्र यादव ने स्वयं ग्राम घुपसाल का दौरा कर किसानों के इस अनूठे प्रयास का बारीकी से अवलोकन किया। उन्होंने खेतों में जाकर फसलों की स्थिति देखी और ग्रामीणों से सीधे संवाद कर खेती की नई पद्धतियों तथा उनके अनुभवों की जानकारी ली।
वर्तमान समय में पर्यावरण और जल संकट को देखते हुए कम पानी में अधिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन देने वाली फसलों को अपनाना समय की मांग है। इससे न केवल खेती की लागत (इनपुट कॉस्ट) कम होती है, बल्कि वैकल्पिक फसलों के बेहतर बाजार मूल्य से किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है। ग्राम घुपसाल का यह क्रॉप डायवर्सिफिकेशन (फसल विविधीकरण) मॉडल पूरे छत्तीसगढ़ के लिए एक अनुकरणीय मिसाल है।
ग्रामीणों ने अपने पुराने कड़वे अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि पूर्व में गर्मी का मौसम आते ही गांव में हाहाकार मच जाता था। मार्च का महीना बीतते-बीतते गांव के तालाब, हैंडपंप और बरसाती नाले पूरी तरह सूख जाते थे, जिससे पेयजल और मवेशियों के निस्तारी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती थी। इस वर्ष गांव के किसानों ने एकजुट होकर 350 एकड़ से अधिक रकबे में धान की खेती पूरी तरह बंद कर दी और उसकी जगह कम पानी वाली फसलें लीं। इसका सीधा असर यह हुआ कि जमीन के भीतर का पानी सुरक्षित रहा और भू-जल स्तर ऊपर आ गया। ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक बताया कि जिन तालाबों में फागुन (मार्च) के बाद धूल उड़ती थी, वहाँ इस वर्ष अप्रैल के अंत में भी पर्याप्त पानी भरा हुआ है।
ग्राम घुपसाल की यह सफलता कहानी साबित करती है कि अगर नीतिगत समझ और जनभागीदारी का सही समन्वय हो, तो प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण बिना सरकारी दबाव के भी किया जा सकता है। यह गांव आज श्बदलते छत्तीसगढ़श् की जागरूक किसानी का एक जीवंत चेहरा बनकर उभरा है।

 

नाशपाती की खेती से बढ़ी किसानों की आमदनी, जशपुर बना फल उत्पादन का उभरता केंद्र

19-May-2026
रायपुर।  (शोर संदेश) मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ के किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है। जशपुर जिले के किसान नाशपाती की खेती के माध्यम से उल्लेखनीय आय अर्जित कर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। प्राकृतिक रूप से अनुकूल जलवायु और उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन के कारण जशपुर आज राज्य के प्रमुख नाशपाती उत्पादक जिलों में शामिल हो चुका है।
जशपुर की नाशपाती से बढ़ रही किसानों की आमदनी, 3,500 से अधिक कृषक जुड़े फल उत्पादन से
जशपुर जिले में लगभग 3,500 से अधिक किसान करीब 3,500 हेक्टेयर क्षेत्र में नाशपाती की खेती कर रहे हैं। जिले में प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख 75 हजार क्विंटल नाशपाती का उत्पादन हो रहा है। इससे हजारों कृषक परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और जिले की पहचान फल उत्पादन के क्षेत्र में लगातार मजबूत हो रही है।
जशपुर की नाशपाती स्वाद, गुणवत्ता और आकर्षक आकार के कारण देश के विभिन्न राज्यों में विशेष रूप से पसंद की जाती है। जिले के सन्ना, पंडरापाठ, कंवई, महुआ, सोनक्यारी, मनोरा, धवईपाई और गीधा जैसे क्षेत्रों से नाशपाती की खेप दिल्ली, उत्तर प्रदेश, ओडिशा सहित अन्य राज्यों में भेजी जाती है। फल को सावधानीपूर्वक कैरेट में पैक कर बाजारों तक पहुंचाया जाता है।
नाशपाती की खेती किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही है। एक एकड़ क्षेत्र से किसानों को औसतन 1 लाख से 1.50 लाख रुपए तक की वार्षिक आय प्राप्त हो रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और किसान आधुनिक उद्यानिकी की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
उद्यानिकी विभाग तथा नाबार्ड के सहयोग से किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, पौधरोपण, बागवानी प्रबंधन और विपणन संबंधी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत नाशपाती क्षेत्र विस्तार योजना संचालित की जा रही है, जिसके माध्यम से किसानों को अनुदान एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल से जशपुर जिले में उद्यानिकी आधारित कृषि को नई दिशा मिली है। नाशपाती की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि जशपुर को राज्य के एक उभरते हुए फल उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित कर रही है।

धान से टमाटर तक की नई खेती ने बदली किस्मत

18-May-2026
रायपुर,।  (शोर संदेश) महासमुंद जिले के पिथौरा विकासखंड के बरनाईदादर गांव की किसान मीना पटेल ने आधुनिक खेती अपनाकर यह साबित कर दिया है कि नई तकनीक और सही मार्गदर्शन किसानों की आमदनी में बड़ा बदलाव ला सकता है। पारंपरिक धान खेती से सीमित आय पाने वाली मीना आज ग्राफ्टेड टमाटर की खेती से सालाना सात गुना अधिक मुनाफा कमा रही हैं।
करीब 4.13 हेक्टेयर सिंचित भूमि की मालिक मीना पहले केवल धान की खेती करती थीं। उद्यान विभाग की सलाह पर उन्होंने वर्ष 2025-26 में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत एक एकड़ में ग्राफ्टेड टमाटर की खेती शुरू की। ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक के उपयोग से पानी की बचत हुई और उत्पादन भी बेहतर मिला। विभाग की ओर से उन्हें 30 हजार रुपये का अनुदान भी मिला।
मीना बताती हैं कि पहले धान से प्रति एकड़ लगभग 36 हजार रुपये की आय होती थी, लेकिन ग्राफ्टेड टमाटर से लागत निकालने के बाद करीब 2.80 लाख रुपये का शुद्ध लाभ हुआ। एक एकड़ में लगभग 400 क्विंटल उत्पादन लेकर उन्होंने टमाटर को पिथौरा और ओडिशा की मंडियों में बेचा, जहां बेहतर दाम मिले। मीना पटेल की सफलता अब आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन गई है। क्षेत्र के कई किसान अब पारंपरिक खेती छोड़ उद्यानिकी फसलों और आधुनिक तकनीकों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

फूलों की खुशबू और आमों की बहार से महक रही पेण्ड्री की शासकीय उद्यान रोपणी

16-May-2026
रायपुर,  ।  (शोर संदेश) मई की झुलसाती गर्मी में जहां लोग पेड़ों की छांव और ठंडी हवा की तलाश में भटकते नजर आते हैं, वहीं राजनांदगांव शहर के पेण्ड्री स्थित शासकीय उद्यान रोपणी में कदम रखते ही मौसम का मिजाज बदला-बदला सा महसूस होता है। रंग-बिरंगे फूलों से सजी क्यारियां, फलों से लदे वृक्ष और हरियाली से आच्छादित परिसर यहां आने वाले हर व्यक्ति को सुकून और ताजगी का एहसास कराते हैं।
ग्रीष्म ऋतु के बावजूद पेण्ड्री की यह बगिया इन दिनों पूरी तरह खिली हुई है। गुलाब, गंधराज, हरसिंगार, चंपा और बोगनविलिया की महक से वातावरण सुवासित है। वहीं आम्रपाली, लंगड़ा, दशहरी, चौसा और बाम्बेग्रीन जैसी आम की प्रजातियों से लदे पेड़ उद्यान की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे हैं। 
पेण्ड्री की यह रोपणी केवल सुंदरता का केंद्र नहीं है, बल्कि आधुनिक उद्यानिकी और उन्नत कृषि तकनीक का भी महत्वपूर्ण केन्द्र बन चुकी है। यहां स्थापित प्लग टाइप वेजीटेबल सीडलिंग प्रोडक्शन यूनिट किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। जापानी पद्धति पर आधारित इस यूनिट में तापमान, नमी और प्रकाश को नियंत्रित कर पौध तैयार किए जाते हैं, जिससे कम समय में बेहतर गुणवत्ता वाले अंकुरित पौधे मिलते हैं। इन दिनों यूनिट में योगी नामधारी मिर्च की पौध तैयार की जा रही है। किसान स्वयं अपने बीज यहां देकर थरहा तैयार करवा रहे हैं। डीएमएफ मद से यूनिट के जीर्णाेद्धार के बाद यहां फिर से बड़े पैमाने पर किसानों को गुणवत्तायुक्त पौधे उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
इस आधुनिक तकनीक की खासियत यह है कि इसमें मिट्टी का उपयोग नहीं होता। नारियल बुरादा, परलाईड और वर्मी कोलाईट जैसे माध्यमों से पौध तैयार किए जाते हैं। मशीनरी स्वींग मेथड से बीजों का अंकुरण किया जाता है, जिससे पौधे रोगमुक्त और एक समान वृद्धि वाले बनते हैं। टमाटर, बैंगन, पत्ता गोभी, फूलगोभी, खीरा, करेला, लौकी और कद्दू जैसी सब्जियों की पौध यहां तैयार की जा रही है। 
विशेषज्ञ बताते हैं कि इस पद्धति से तैयार पौधों की खेत में जीवित रहने की क्षमता अधिक होती है और फसल जल्दी तैयार होती है। यही कारण है कि अब किसान आधुनिक सीडलिंग तकनीक की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। पेण्ड्री की समृद्ध नर्सरी में फलदार, छायादार और सजावटी पौधों की बड़ी श्रृंखला उपलब्ध है। यहां आम, अमरूद, संतरा, आंवला, लीची, अनार, पपीता, नारियल, चीकू और मुनगा जैसे पौधों के साथ अशोक, सिल्वर ओक, कदम और पीपल जैसे वृक्ष भी मिलते हैं। वहीं जरबेरा, रजनीगंधा, कनेर, यूफोर्बिया, एक्जोरा और मनीप्लांट जैसे सजावटी पौधे लोगों को खासा आकर्षित कर रहे हैं। पेण्ड्री की यह बगिया केवल हरियाली का ठिकाना नहीं, बल्कि किसानों के लिए आधुनिक खेती की प्रयोगशाला बन गई है।

 


योजना, मार्गदर्शन और नवाचार से समृद्धि की नई कहानी

01-May-2026
रायपुर(शोर संदेश) । बदलती कृषि पद्धतियों और शासन की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का सशक्त उदाहरण सक्ती जिले के डभरा तहसील अंतर्गत ग्राम जवाली के किसान  रामकुमार पटेल ने प्रस्तुत किया है। सीमित संसाधनों के बावजूद सूझबूझ, मेहनत और कृषि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन के बल पर उन्होंने खेती को लाभकारी बनाते हुए समृद्धि की नई राह तैयार की है।
लगभग ढाई हेक्टेयर कृषि भूमि के स्वामी पटेल वर्ष 2024-25 तक ग्रीष्मकालीन धान की खेती करते थे। हालांकि, बढ़ती लागत और अपेक्षाकृत कम लाभ के कारण उन्हें संतोषजनक आय प्राप्त नहीं हो पा रही थी। ऐसे में वर्ष 2025-26 में कृषि विभाग के अधिकारियों ने उन्हें फसल विविधीकरण अपनाने, विशेषकर सरसों की उन्नत खेती और कम लागत में अधिक उत्पादन देने वाली तकनीकों की जानकारी दी।
विभागीय मार्गदर्शन से प्रेरित होकर पटेल ने धान की जगह सरसों की खेती अपनाने का निर्णय लिया। राष्ट्रीय मिशन ऑन एडिबल ऑयल-ऑयल सीड्स योजना के अंतर्गत उन्हें 1.00 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए सरसों की उन्नत किस्म पीएम-32 उपलब्ध कराई गई। इसके साथ ही आवश्यक कृषि आदान सामग्री और समय-समय पर तकनीकी परामर्श भी दिया गया। उन्नत बीज, वैज्ञानिक पद्धतियों और सतत मार्गदर्शन का परिणाम यह रहा कि उन्हें सरसों की पीएम-32 किस्म से लगभग 12.45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त हुआ। कुल 2.432 हेक्टेयर में उन्होंने 26.20 क्विंटल सरसों का उत्पादन किया।
पटेल ने बीते दिनों प्राथमिक सेवा सहकारी समिति कोटमी में 23 क्विंटल सरसों बीज 6200 रुपये प्रति क्विंटल की दर से विक्रय किया, जिससे उन्हें कुल 1,42,600 रुपये की आय प्राप्त हुई। कम लागत में बेहतर लाभ ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया, बल्कि खेती के प्रति उनका विश्वास भी और सुदृढ़ हुआ है।
रामकुमार पटेल ने अपनी सफलता का श्रेय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और कृषि विभाग को देते हुए आभार व्यक्त किया। उनकी इस उपलब्धि से प्रेरित होकर अब गांव के अन्य किसान भी फसल परिवर्तन, जल संरक्षण और सरसों जैसी लाभकारी फसलों की खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं। स्वयं पटेल भी किसानों को शासकीय योजनाओं और आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी देकर उन्हें आत्मनिर्भर और समृद्ध बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।



 

हरी खाद से समृद्ध खेती: बढ़ेगा उत्पादन, सुधरेगी मिट्टी की सेहत

30-Apr-2026
रायपुर (शोर संदेश) आज के दौर में टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना समय की मांग है। रसायनों के बोझ तले दबती मिट्टी को राहत देने के लिए हरी खाद एक बेहतरीन समाधान बनकर उभरी है। यह न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन की उर्वरता को भी सुरक्षित रखती है। मिट्टी बचेगी, तो किसान बचेगा और किसान बचेगा, तो देश समृद्ध होगा।
कृषि विभाग द्वारा किसानों को खेती में हरी खाद के उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और उत्पादन में सुधार लाने में मदद मिल सके। विभाग के अनुसार धान के खेतों में लगातार रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से मिट्टी में लाभदायक सूक्ष्म जीवों की गतिविधियां कम हो रही हैं और मिट्टी की संरचना भी प्रभावित हो रही है।
हरी खाद वह सहायक फसल है जिसे मुख्य फसल बोने से पहले खेत में उगाया जाता है और फूल आने की अवस्था में ही उसे हल चलाकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग और उड़द जैसी फसलें हरी खाद के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। हरी खाद के तहत कई फसलों का उपयोग किया जाता है जिनमें दलहनी और बिना दलहनी फसलें शामिल होती हैं। हरी खाद के लिए झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियों, टहनियों को भी उपयोग में ला सकते हैं, लेकिन इसके लिए विशेष रूप से ढैंचा फसलों का उपयोग किया जाता है। इन फसलों को खेतों में लगाकर भूमि में सुधार किया जाता है।
हरी खाद का सबसे बड़ा प्रभाव मिट्टी की भौतिक और रासायनिक संरचना पर पड़ता है। यह मिट्टी में नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थों (ह्यूमस) की मात्रा को तेजी से बढ़ाती है। हरी खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाती है, जिससे हवा का संचार बढ़ता है और पौधों की जड़ें गहराई तक जा पाती हैं। इसके उपयोग से मिट्टी की पानी सोखने की शक्ति बढ़ जाती है, जो सूखे के समय फसलों के लिए जीवन रक्षक साबित होती है।
जब मिट्टी स्वस्थ होती है, तो उत्पादन का बढ़ना निश्चित है। हरी खाद के प्रयोग से पैदावार में 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है। यूरिया और अन्य रासायनिक खादों पर निर्भरता कम हो जाती है, जिससे किसान की फसल की लागत घटती है। मित्र कीटों से फसल का संरक्षण करता है। यह जमीन के भीतर लाभकारी सूक्ष्मजीवों और केंचुओं की संख्या बढ़ाने में मदद करती है।
क्षेत्र की जलवायु के अनुसार सनई या ढैंचा का चुनाव करें। बुवाई का समय मानसून की शुरुआत (जून-जुलाई) इसके लिए सबसे उपयुक्त है। जब फसल लगभग 40-50 दिन की हो जाए और उसमें फूल आने लगें, तब उसे पाटा लगाकर या रोटावेटर की मदद से मिट्टी में मिला दें। पलटने के बाद 10-15 दिनों तक खेत में नमी बनाए रखें ताकि खाद अच्छी तरह सड़कर मिट्टी का हिस्सा बन जाए।
हरी खाद केवल एक उर्वरक नहीं है, बल्कि यह मिट्टी का उपचार है। यदि किसान हर दूसरे या तीसरे साल अपने खेत में हरी खाद का प्रयोग करें, तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि हम समाज को रसायनों से मुक्त, शुद्ध और पौष्टिक अनाज भी उपलब्ध करा पाएंगे।
हरी खाद का उपयोग कृषि के लिए एक ष्वरदानष् के समान है। वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है, ऐसे में हरी खाद (ळतममद डंदनतम) प्राकृतिक तरीके से मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सुलभ विकल्प है।
कृषि विभाग द्वारा खरीफ फसल से पूर्व हरी खाद के बीज उपलब्ध कराने की भी पहल की जा रही है। इसके लिए क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से किसानों से मांग लेकर बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।

फूलों की खुशबू से महकी किस्मत ईश्वरचरण पैकरा का

28-Apr-2026
रायपुर,। (शोर संदेश)  परंपरागत खेती (गेहूं-धान) की तुलना में फूलों की खेती कम लागत में 3-4 गुना तक अधिक मुनाफा दे रही है। गेंदा, गुलाब और गुलदाउदी जैसे फूलों की 12 महीने मांग होने से किसान हर सीजन में बंपर कमाई कर रहे हैं। कम पूंजी से शुरू होकर, यह व्यवसाय प्रति हेक्टेयर लाखों रुपये का शुद्ध लाभ दे रहा है, जिससे किसान आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रहे हैं।  शादी, पार्टी, त्यौहार और धार्मिक आयोजनों में फूलों की मांग साल भर बनी रहती है, जिससे अच्छी कीमतें मिलती हैं।
राज्य शासन की योजनाओं का लाभ लेकर रायगढ़ जिले के किसान अब परंपरागत खेती से आगे बढ़ते हुए उद्यानिकी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी कड़ी में लैलूंगा विकासखंड के ग्राम गमेकेरा निवासी किसान ईश्वरचरण पैकरा ने राष्ट्रीय बागवानी मिशन से फूलों की खेती अपनाकर अपनी आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि की है। किसान की सफलता आज सबके लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है।
पैकरा पहले परंपरागत रूप से धान की खेती किया करते थे, जिसमें मेहनत के मुकाबले आय सीमित थी। वर्ष 2025-26 में उन्होंने उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में 0.400 हेक्टेयर भूमि पर गेंदा फूल की खेती शुरू की। विभाग द्वारा तकनीकी सहयोग एवं आवश्यक मार्गदर्शन मिलने से उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति से खेती की, जिसका परिणाम बेहद सकारात्मक रहा। जहां पहले धान की खेती से उन्हें लगभग 11 क्विंटल उत्पादन मिलता था और सीमित आय होती थी, वहीं फूलों की खेती से उन्हें करीब 38 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ। इस उत्पादन से उनकी कुल आमदनी लगभग 3 लाख 4 हजार रुपये तक पहुंच गई। लागत निकालने के बाद उन्हें लगभग 2 लाख 59 हजार रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ, जो पारंपरिक खेती की तुलना में कई गुना अधिक है।
फूलों की खेती में सफलता मिलने के बाद पैकरा का आत्मविश्वास बढ़ा है। वे बताते हैं कि कम समय में अधिक लाभ मिलने के कारण अब वे इस खेती को और विस्तार देने की योजना बना रहे हैं। उनके खेत में खिले गेंदा फूलों की रंगीन पंक्तियां आज उनकी मेहनत और सफलता की कहानी बयां करती हैं। उनकी इस उपलब्धि को देखकर गांव के अन्य किसान भी अब उद्यानिकी फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और विभाग से संपर्क कर फूलों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। इस प्रकार राज्य शासन की योजनाएं न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हो रही हैं, बल्कि कृषि के स्वरूप में भी सकारात्मक बदलाव ला रही हैं।







 


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