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छत्तीसगढ़ में सर्वाइकल कैंसर से बचाव की पहल, एचपीवी टीकाकरण अभियान शुरू

07-Apr-2026
रायपुर,।  ( शोर संदेश )  सर्वाइकल कैंसर के विरुद्ध प्रारंभ किए गए राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण अभियान को छत्तीसगढ़ की साय सरकार प्रदेशभर में प्रभावी रूप से क्रियान्वित कर रही है। इसी क्रम में सरगुजा जिले के लखनपुर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम हेतु एचपीवी टीकाकरण अभियान की शुरुआत की गई।  कैबिनेट मंत्री राजेश अग्रवाल ने आज लखनपुर पहुंचकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उन्होंने टीकाकरण के लिए आई बेटियों से मुलाकात कर उनसे आत्मीय बातचीत की और उन्हें एचपीवी वैक्सीन के महत्व के बारे में जानकारी देते हुए इस टीके को लगाने के लिए प्रेरित किया। मंत्री अग्रवाल ने कहा कि यह टीकाकरण भविष्य में सर्वाइकल कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचाव का प्रभावी उपाय है और सभी पात्र बालिकाओं को इसका लाभ अवश्य लेना चाहिए।
निरीक्षण के दौरान उन्होंने स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों एवं स्टाफ से चर्चा करते हुए निर्देश दिए कि अभियान को पूरी गंभीरता, सतर्कता और सुव्यवस्थित ढंग से संचालित किया जाए, ताकि अधिक से अधिक किशोरियों तक इसका लाभ पहुंच सके। इसके साथ ही उन्होंने अस्पताल में उपचाररत अन्य मरीजों से मुलाकात कर उनका कुशलक्षेम जाना और स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में फीडबैक भी लिया। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण अभियान का उद्देश्य किशोरियों को ह्यूमन पैपिलोमा वायरस से सुरक्षित करना है, जो आगे चलकर सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण बनता है। यह टीका विशेष रूप से 9 से 14 वर्ष आयु वर्ग की बालिकाओं के लिए अत्यंत लाभकारी है और इसे निःशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार “स्वस्थ नारी, सशक्त राष्ट्र” के संकल्प के साथ महिलाओं और किशोरियों के स्वास्थ्य संरक्षण की दिशा में निरंतर कार्य कर रही है। एचपीवी टीकाकरण अभियान इसी सोच का सशक्त उदाहरण है, जो प्रदेश को सर्वाइकल कैंसर मुक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सराहनीय पहल साबित होगा।
 

 


मरीज को मिला समय पर उपचार, सुकमा के चिकित्सकों की टीम ने दिखाई तत्परता

06-Apr-2026
रायपुर,।  ( शोर संदेश ) सुकमा जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवा की तत्परता और आधुनिक संसाधनों की उपलब्धता का एक सराहनीय उदाहरण सामने आया है। सिविल सर्जन डॉ. एमआर कश्यप से प्राप्त जानकारी के अनुसार छिंदगढ़ विकासखंड के कुन्ना निवासी 38 वर्षीय पाली कवासी को गंभीर अवस्था में जिला अस्पताल सुकमा में भर्ती कराया गया।
देरी से अस्पताल पहुंचने के कारण स्थिति अत्यंत जोखिमपूर्ण थी और तत्काल सर्जरी आवश्यक हो गई। अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुजा ने बिना समय गंवाए तुरंत एलएससीएस (सीजर) ऑपरेशन कर मरीज का उपचार प्रारंभ किया। हालांकि ऑपरेशन के दौरान मृत बच्चा पैदा होने से महिला की स्थिति और अधिक जटिल हो गई। 
महिला की हालत लगातार बिगड़ती चली गई और रेफर करने की तैयारी की जा रही थी। इसी दौरान महिला का श्वास बंद सा हो गया, साथ ही नाड़ी और हृदय की धड़कन भी थम सी गई। ऐसे संकट की घड़ी में जिला अस्पताल की मेडिकल टीम ने त्वरित निर्णय लेते हुए महिला को दो बार सीपीआर दिया और तत्काल वार्ड में शिफ्ट कर आधुनिक वेंटीलेटर की सहायता से उपचार शुरू किया गया। इसके बाद महिला को दो यूनिट रक्त चढ़ाया गया।
डॉक्टरों की सतर्कता और उपलब्ध संसाधनों के कारण महिला की जान बचा ली गई। आज पाली कवासी पूरी तरह स्वस्थ हैं और जिला अस्पताल के डॉक्टरों व स्टाफ के प्रयासों की सराहना कर रही हैं।




 

ग्रीन एनेस्थीसिया: सिम्स में इलाज के साथ पर्यावरण संरक्षण की नई पहल

29-Mar-2026
रायपुर।  ( शोर संदेश ) छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) बिलासपुर में स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देते हुए “ग्रीन एनेस्थीसिया” की पहल की जा रही है। इस पहल के तहत मरीजों को सुरक्षित उपचार प्रदान करने के साथ-साथ पर्यावरण और चिकित्सकों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
ऑपरेशन थिएटर में उपयोग होने वाली एनेस्थीसिया गैसों के दुष्प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से सिम्स द्वारा आधुनिक और पर्यावरण हितैषी तकनीकों को अपनाया जा रहा है।
सर्जरी के दौरान उपयोग की जाने वाली गैसें, जैसे डेसफ्लुरेन और नाइट्रस ऑक्साइड, ग्रीनहाउस गैसों के रूप में जानी जाती हैं। इनका प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना अधिक होता है और ये लंबे समय तक वातावरण में बनी रहती हैं।
हर वर्ष बड़ी संख्या में होने वाली सर्जरी से निकलने वाली ये गैसें ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
एनेस्थीसिया का प्रभाव केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता। जहां एक मरीज को ऑपरेशन के दौरान एक बार एनेस्थीसिया दिया जाता है, वहीं एनेस्थीसिया विशेषज्ञ चिकित्सक दिनभर में 10 से 12 घंटे तक लगातार कई मरीजों को एनेस्थीसिया प्रदान करते हैं।
इस दौरान वे बार-बार इन गैसों के संपर्क में आते हैं, जिससे लंबे समय में उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है। ऐसे में ग्रीन एनेस्थीसिया चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
ग्रीन एनेस्थीसिया एक ऐसी पद्धति है, जिसमें मरीज को सुरक्षित बेहोशी देने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को कम किया जाता है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाना है।
सिम्स में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं—
टी.आई.वी.ए. (Total Intravenous Anesthesia)
इस तकनीक में प्रोपोफोल, मिडाज़ोलम आदि दवाओं को इंट्रावेनस (रक्त शिरा द्वारा) दिया जाता है, जो बेहद प्रभावी एवं सुरक्षित माना जाता है। इससे गैसों के उपयोग में कमी आती है और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव भी कम होता है।
कम मात्रा में गैस देकर भी सुरक्षित एनेस्थीसिया दिया जाता है, जिससे गैस की खपत और प्रदूषण दोनों में कमी आती है।
नई तकनीकों के माध्यम से गैस लीकेज को नियंत्रित कर ऑपरेशन थिएटर के बाहर प्रदूषण को कम किया जा रहा है।
यह पद्धति पर्यावरण के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी लाभकारी (Cost Effective) साबित हो रही है।
निश्चेतना में उपयोग होने वाली गैसों का अत्यधिक प्रयोग ग्लोबल वार्मिंग और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ग्रीन एनेस्थीसिया के माध्यम से इन दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सिम्स इस दिशा में निरंतर प्रयासरत है।
ग्रीन एनेस्थीसिया सिम्स की एक सराहनीय और दूरदर्शी पहल है, जो यह दर्शाती है कि बेहतर इलाज के साथ पर्यावरण और मानव दोनों की सुरक्षा संभव है। यह प्रयास भविष्य में अन्य चिकित्सा संस्थानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा।

बस्तर के नन्हे ललित की आंखों में लौटी रोशनी

26-Mar-2026
रायपुर, । ( शोर संदेश )  बस्तर के नौ वर्षीय बालक ललित मौर्य के जीवन में अब खुशियों का एक नया सवेरा हुआ है। जिले के विकासखंड बस्तर के अंतर्गत ग्राम पंचायत नदीसागर के आश्रित ग्राम पराली का निवासी ललित जन्म से ही मोतियाबिंद जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहा था। इस जन्मजात विकार के कारण वह दुनिया की खूबसूरती देखने में पूरी तरह असमर्थ था और उसका बचपन अंधेरे के साये में बीत रहा था। हालांकि ललित के मोतियाबिंद की पहचान पूर्व में ही हो गई थी, लेकिन सर्जरी को लेकर मन में बैठे डर और संशय के कारण उसके परिजन ऑपरेशन के लिए तैयार नहीं हो रहे थे।
ललित के उजाले की ओर बढ़ने का सफर 20 मार्च को बस्तर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में आयोजित दिव्यांग सशक्तिकरण शिविर से शुरू हुआ, जहाँ वह दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाने पहुँचा था। कलेक्टर आकाश छिकारा की पहल पर आयोजित इस विशेष शिविर में स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान नेत्र विशेषज्ञों ने ललित की स्थिति को समझा। इस दौरान पलारी के नेत्र सहायक अधिकारी अनिल नेताम ने विशेष सक्रियता दिखाते हुए परिजनों को ऑपरेशन के महत्व के बारे में विस्तार से समझाया। उनके अथक प्रयासों और निरंतर दी गई समझाइश का ही परिणाम था कि परिजन अंततः सर्जरी के लिए राजी हुए, जिसके बाद ललित को तत्काल बेहतर उपचार के लिए जिला अस्पताल रेफर किया गया।
कलेक्टर बस्तर आकाश छिकारा के विशेष दिशा-निर्देशों के अनुरूप स्वास्थ्य विभाग ने तत्परता दिखाते हुए इस केस को प्राथमिकता दी। मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सेवा योजना और जिला प्रशासन के कुशल समन्वय से 24 मार्च को जिला महारानी अस्पताल जगदलपुर में डॉ सरिता थॉमस द्वारा ललित का सफल मोतियाबिंद ऑपरेशन संपन्न हुआ। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय बसाक, सिविल सर्जन डॉ. संजय प्रसाद और जिला कार्यक्रम प्रबंधक कुमारी रीना लक्ष्मी के मार्गदर्शन में मेडिकल टीम ने इस चुनौतीपूर्ण सर्जरी को अंजाम दिया।
इस पुनीत कार्य में नेत्र सहायक अधिकारी कुमारी दिव्या पाण्डे, सुंकर अमृत राव, देवकरण व्यास सहित वार्ड इंचार्ज अन्नपूर्णा साहू और स्टाफ नर्स  स्मृता कच्छ व नमिता मौर्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा। साथ ही ऑपरेशन थिएटर में सहायक डोलेश्वर जोशी की सक्रियता ने इस पूरी प्रक्रिया को सुगम बनाया। ऑपरेशन के बाद जब ललित की आंखों से पट्टी हटाई गई, तो उसके चेहरे पर आई चमक ने पूरी मेडिकल टीम की मेहनत को सफल कर दिया। अब ललित न केवल अपनी आंखों से दुनिया को देख पा रहा है, बल्कि अपने परिजनों और आसपास की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से पहचानने भी लगा है। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की इस संवेदनशीलता ने एक मासूम के जीवन से अंधेरा मिटाकर एक परिवार के घर में उम्मीद का दीया जला दिया है।






 

आयुर्वेद से मिला नई जिंदगी का रास्ता, गंभीर बीमारियों में भी राहत

25-Mar-2026
रायपुर।  ( शोर संदेश ) बदलते दौर में लोग मधुमेह (डायबिटीज), उच्च रक्तचाप (बीपी), सर्वाइकल पेन, स्पोंडिलाइटिस, माइग्रेन, एलर्जी, मोटापा, एनीमिया, बाल झड़ना, तनाव और पाचन संबंधी समस्याओं जैसी अनेक बीमारियों से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में आयुर्वेद एक बार फिर भरोसे का मजबूत आधार बनकर उभर रहा है। छत्तीसगढ़ शासन के आयुष विभाग द्वारा रायगढ़ जिले के आयुष अस्पतालों में जटिल से जटिल रोगों का निःशुल्क और प्रभावी उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे कई मरीजों का जीवन फिर से सामान्य और खुशहाल हो रहा है।
इस सफलता के पीछे आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी लोईग में पदस्थ डॉ. माकेश्वरी संभाकर जोशी प्रभारी आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी, आयुष केंद्र लोईग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके मार्गदर्शन और सतत देखरेख में इन मरीजों का उपचार किया गया, जहां औषधियों के साथ-साथ आहार-विहार और दिनचर्या पर विशेष ध्यान दिया गया। जानकारी के अभाव में जहां कई लोग महंगे इलाज में समय और पैसा गंवा देते हैं, वहीं जागरूक मरीज आयुर्वेद के इस निःशुल्क उपचार का लाभ लेकर बेहतर स्वास्थ्य की ओर लौट रहे हैं। ऐसे ही छह मरीजों की कहानियां आज उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई हैं।
इस संबंध में प्रभारी आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी लोईग के डॉ. माकेश्वरी संभाकर जोशी ने कहा कि आयुर्वेद केवल रोग का उपचार नहीं, बल्कि जीवनशैली को संतुलित करने की एक संपूर्ण पद्धति है। यदि मरीज नियमित रूप से आहार-विहार और चिकित्सकीय परामर्श का पालन करें, तो जटिल से जटिल रोगों में भी सकारात्मक परिणाम मिलते हैं। आयुष विभाग द्वारा निःशुल्क उपचार की सुविधा उपलब्ध है, जिसका अधिक से अधिक लोगों को लाभ लेना चाहिए।
ग्राम लोईग की 78 वर्षीय लुवा सारथी पिछले दो वर्षों से मधुमेह और उच्च रक्तचाप से परेशान थीं। हालत इतनी गंभीर हो गई थी कि उन्हें चलने-फिरने में भी कठिनाई होने लगी थी। आयुर्वेदिक उपचार और नियमित दिनचर्या के पालन से जहां उनका शुगर स्तर 390 से घटकर 170-180 तक पहुंच गया, वहीं बीपी भी 170-180 से घटकर 130/70 तक नियंत्रित हो गया। विशेष बात यह रही कि उन्होंने दो महीने पहले से एलोपैथी दवाओं का उपयोग भी बंद कर दिया है।
इसी तरह गौवर्धनपुर के 38 वर्षीय गनपत उरांव सर्वाइकल पेन, स्पोंडिलाइटिस और मधुमेह से पीड़ित थे। लंबे समय तक एलोपैथी उपचार के बावजूद राहत नहीं मिली और सर्जरी की सलाह दी गई थी। लेकिन आयुर्वेदिक उपचार, पंचकर्म और संतुलित दिनचर्या अपनाने से उन्हें 70 प्रतिशत तक सुधार हुआ। अब वे बिना सर्जरी के सामान्य जीवन जी पा रहे हैं।
ग्राम रेगड़ा के 30 वर्षीय यासिम हुसैन का वजन काफी कम था, जिससे वे शारीरिक कमजोरी से जूझ रहे थे। आयुर्वेदिक औषधियों और सही आहार-विहार के पालन से मात्र दो माह में उनका वजन 49 किलो से बढ़कर 60 किलो हो गया।
रायगढ़ के बंटी मेहर, जो सिरदर्द और कमजोरी से परेशान थे, ने भी आयुर्वेदिक उपचार से दो महीने में 8 किलो वजन बढ़ाया और स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार पाया।
ममता जोशी (43 वर्ष) के मामले में आयुर्वेद ने और भी व्यापक प्रभाव दिखाया। बाल झड़ना, एसिडिटी, एनीमिया और मोटापे जैसी समस्याओं से जूझ रही ममता का वजन 90 किलो से घटकर 76 किलो हो गया। साथ ही बाल झड़ना बंद हुआ, हीमोग्लोबिन स्तर 13 ग्राम तक पहुंचा और लंबे समय से अनियमित मासिक धर्म भी फिर से नियमित हो गया।
वहीं 37 वर्षीय बी. डड़सेना, जो पिछले 8-9 वर्षों से एलर्जी, क्रॉनिक सर्दी, माइग्रेन और तनाव से पीड़ित थे, उन्हें भी आयुर्वेदिक उपचार से लगभग 70 प्रतिशत तक राहत मिली।
इन सभी उदाहरणों से हम यह कह सकते है कि आयुर्वेद न केवल रोगों का उपचार करता है, बल्कि जीवनशैली में सुधार लाकर व्यक्ति को संपूर्ण रूप से स्वस्थ बनाने का कार्य करता है। रायगढ़ के आयुष अस्पताल में उपलब्ध यह निःशुल्क उपचार उन लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जो बिना अधिक खर्च के बेहतर स्वास्थ्य की तलाश में हैं।

सरकार ने नेशनल डेंटल कमीशन का किया गठन, दंत चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में आएगी गुणवत्ता

21-Mar-2026
देश में दंत चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को नई दिशा देने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। सरकार ने नेशनल डेंटल कमीशन (एनडीसी) का गठन किया है, जो अब देश में दंत शिक्षा और पेशेवर मानकों के नियमन का प्रमुख निकाय होगा। इसके साथ ही डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया को समाप्त कर दिया गया है। इस संबंध में अधिसूचना 19 मार्च 2026 को जारी की गई और उसी दिन से नई व्यवस्था लागू हो गई।
यह सुधार दंत शिक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और गुणवत्ता-आधारित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। नई व्यवस्था में चुनाव आधारित संरचना के स्थान पर विशेषज्ञों द्वारा संचालित नियामक ढांचा स्थापित किया गया है, जिससे निर्णय प्रक्रिया अधिक प्रभावी और पेशेवर बनेगी।
नेशनल डेंटल कमीशन के तहत तीन स्वायत्त बोर्डों का गठन किया गया है, जो दंत शिक्षा, संस्थानों के मूल्यांकन और पेशेवर आचरण से जुड़े कार्यों को देखेंगे।
इनमें अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट डेंटल एजुकेशन बोर्ड दंत शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करेगा, डेंटल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड संस्थानों के मूल्यांकन और मान्यता का कार्य करेगा, जबकि दंत शिक्षा और पेशेवर मानकों दंत चिकित्सकों के पंजीकरण और आचार संहिता की निगरानी करेगा।
कमीशन और उसके बोर्डों के नेतृत्व के लिए अनुभवी और प्रतिष्ठित विशेषज्ञों की नियुक्ति की गई है। डॉ. संजय तिवारी को एनडीसी का अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि डॉ. मौसुमी गोस्वामी को अंशकालिक सदस्य नियुक्त किया गया है। इसके अलावा विभिन्न बोर्डों में भी विशेषज्ञों को जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिससे इस नई व्यवस्था को मजबूत आधार मिल सके।
नेशनल डेंटल कमीशन की प्रमुख जिम्मेदारियों में दंत शिक्षा से जुड़े नियम बनाना, संस्थानों का मूल्यांकन करना, मानव संसाधन का आकलन करना, अनुसंधान को बढ़ावा देना और निजी दंत कॉलेजों की फीस के लिए दिशा-निर्देश तय करना शामिल है। इसके साथ ही सामुदायिक दंत स्वास्थ्य, शिक्षा और पेशेवर नैतिकता के लिए भी मानक निर्धारित किए जाएंगे।
इस नई व्यवस्था के लागू होने के साथ ही 1948 का डेंटिस्ट्स एक्ट समाप्त हो गया है और डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया भंग कर दी गई है। सरकार का मानना है कि यह सुधार न केवल दंत शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाएगा, बल्कि आम जनता को सस्ती और बेहतर मौखिक स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध कराने में मदद करेगा।



 

रायगढ़ में महिला पार्षद किया जहरीले पदार्थ का सेवन, अस्पताल में भर्ती

13-Mar-2026
रायगढ़। ( शोर संदेश )  रायगढ़ नगर निगम की एक महिला पार्षद द्वारा जहरीले पदार्थ का सेवन करने का मामला सामने आया है। वार्ड क्रमांक 02 से भारतीय जनता पार्टी की पार्षद नेहा देवांगन ने गुरुवार को अपने घर में ही जहर का सेवन कर लिया। घटना के बाद उनकी तबीयत बिगड़ने पर परिजनों ने तत्काल उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया, जहां उनका इलाज जारी है।
जानकारी के अनुसार जहर खाने के बाद पार्षद की हालत बिगड़ती देख परिवार के सदस्यों ने पड़ोसियों की मदद से उन्हें अस्पताल पहुंचाया। फिलहाल डॉक्टरों की निगरानी में उनका उपचार चल रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि महिला पार्षद की हालत में फिलहाल सुधार है, लेकिन अगले 24 घंटे तक उनकी स्थिति पर नजर रखी जाएगी।
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस भी अस्पताल पहुंची और मामले की जांच शुरू कर दी है। हालांकि अभी तक पार्षद के इस कदम के पीछे के कारण स्पष्ट नहीं हो पाए हैं। पुलिस का कहना है कि पार्षद की तबीयत सामान्य होने के बाद उनका बयान लिया जाएगा, जिससे पूरे मामले की जानकारी मिल सकेगी।
इस घटना के बाद नगर निगम की राजनीति में हलचल मच गई है। पार्षद होने के कारण यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। मेयर, सभापति और अन्य जनप्रतिनिधि भी अस्पताल पहुंचकर उनका हालचाल जान रहे हैं। वहीं परिजन फिलहाल इस मामले में कोई बयान देने से बच रहे हैं।


 

बार-बार संक्रमण और थकान हो सकते हैं एप्लास्टिक एनीमिया के संकेत

10-Mar-2026
नई दिल्ली। ( शोर संदेश ) एप्लास्टिक एनीमिया एक दुर्लभ और गंभीर ब्लड डिसऑर्डर है, जिसमें बोन मैरो पर्याप्त मात्रा में रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स का निर्माण नहीं कर पाता। भारत में हर साल कई लोगों की मृत्यु एप्लास्टिक एनीमिया के कारण होती है। कई मरीजों में इसका सही कारण पता नहीं चल पाता, लेकिन यह स्थिति ऑटोइम्यून डिसऑर्डर्स, वायरल इंफेक्शन्स और कुछ टॉक्सिक सब्सटेंसेस, केमिकल्स और रेडिएशन के कॉन्टैक्ट से जुड़ी हो सकती है।
वी.पी. कृष्णन, कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक हीमेटो-ऑन्कोलॉजी एवं बीएमटी, के अनुसार बोन मैरो शरीर का ब्लड सेल बनाने वाला मुख्य केंद्र होता है। जब यह केंद्र धीमा पड़ जाता है या काम करना बंद कर देता है, तो इसके परिणाम जानलेवा हो सकते हैं। मरीज बार-बार इंफेक्शन, अत्यधिक थकान और अनकंट्रोल्ड ब्लीडिंग के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। हालांकि एप्लास्टिक एनीमिया एक गंभीर डिसऑर्डर है, लेकिन इसके प्रभावी इलाज उपलब्ध हैं। कई योग्य मरीजों के लिए ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट एक संभावित इलाज और जीवन का दूसरा अवसर दे सकता है।
भारतीय आंकड़े बताते हैं कि बोन मैरो फेल्योर सिंड्रोम में एप्लास्टिक एनीमिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कई मरीज डॉक्टर के पास तब पहुंचते हैं जब लैबोरेटरी रिपोर्ट में पैनसाइटोपेनिया पाया जाता है, यानी शरीर में रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स की कमी। इंडियन जर्नल ऑफ हेमेटोलॉजी एंड ब्लड ट्रांसफ्यूजन में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि भारत में बोन मैरो फेल्योर के मामलों का बड़ा हिस्सा एप्लास्टिक एनीमिया के कारण होता है।
रिकॉर्ड के अनुसार, भारत में मरीज पश्चिमी देशों की तुलना में कम उम्र में ही बीमारी के लक्षण दिखाने लगते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जागरूकता और समय पर पहचान कितनी आवश्यक है।
(स्रोत: https://link.springer.com/journal/12288)
एप्लास्टिक एनीमिया में क्या होता है?
एक सामान्य शरीर में बोन मैरो लगातार रेड ब्लड सेल्स बनाता है, जो शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाते हैं; व्हाइट ब्लड सेल्स, जो इंफेक्शन्स से लड़ते हैं; और प्लेटलेट्स, जो ब्लीडिंग रोकते हैं। एप्लास्टिक एनीमिया में यह निर्माण प्रक्रिया रुक जाती है। अधिकतर मामलों में इम्यून सिस्टम ब्लड बनाने वाली स्टेम सेल्स पर हमला कर उन्हें नष्ट कर देता है, जो रक्त के सभी कंपोनेंट्स के निर्माण के लिए जिम्मेदार होती हैं।
जैसे-जैसे ब्लड सेल्स की संख्या घटती है, लक्षण दिखाई देने लगते हैं। हीमोग्लोबिन कम होने से लगातार थकान, कमजोरी, हल्का काम करने पर भी सांस फूलना और पीलापन दिखाई देता है। व्हाइट ब्लड सेल्स की कमी से मरीज बार-बार या गंभीर इंफेक्शन के शिकार हो जाते हैं। प्लेटलेट्स कम होने से आसानी से चोट लगना, मसूड़ों या नाक से ब्लीडिंग होना, छोटे कट पर भी देर तक ब्लीडिंग रहना और त्वचा पर नीले निशान पड़ना जैसे लक्षण दिखते हैं।
डॉक्टर हीमोग्लोबिन, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स की कमी की इस स्थिति को पैनसाइटोपेनिया कहते हैं। समय पर कम्प्लीट ब्लड काउंट और आवश्यकता होने पर बोन मैरो जांच कर सही डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट शुरू करना बहुत जरूरी है।
(स्रोत: https://www.nhlbi.nih.gov/health/aplastic-anemia)
क्या इसका उपचार संभव है?
हाँ। इलाज का चुनाव बीमारी की गंभीरता, मरीज की उम्र और उसकी हेल्थ कंडीशन पर निर्भर करता है। कुछ मामलों में इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं से बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे ब्लड सेल्स की संख्या बढ़ सकती है। लेकिन कई मरीजों, खासकर गंभीर रूप से प्रभावित युवाओं के लिए, ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट सबसे प्रभावी और आशाजनक ट्रीटमेंट हो सकता है।
ट्रांसप्लांट की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि डोनर का एचएलए प्रोफाइल मरीज से कितना मैच करता है। डॉक्टर 10/10 एचएलए मैच की तलाश करते हैं, जिससे कॉम्प्लिकेशन्स कम हों और रिजल्ट बेहतर मिलें। दुर्भाग्य से, परिवार में उपयुक्त मैच केवल लगभग 30 प्रतिशत मरीजों को ही मिल पाता है। बाकी 70 प्रतिशत मरीज नेशनल या इंटरनेशनल रजिस्ट्रियों में दर्ज अनरिलेटेड डोनर्स पर निर्भर रहते हैं।
भारत में रजिस्टर्ड ब्लड स्टेम सेल डोनर्स की संख्या अभी कम है जिसके कारण मरीजों के लिए ट्रांसप्लांट तक पहुंच काफी सीमित हो जाती है।
गलत जानकारी डोनर रजिस्ट्रेशन में बड़ी बाधा है। दर्द, लंबे समय तक हेल्थ पर असर या फर्टिलिटी पर प्रभाव जैसी गलत धारणाएं लोगों को हतोत्साहित करती हैं। वास्तव में, ब्लड स्टेम सेल डोनेशन एक सुरक्षित और वॉलंटरी प्रक्रिया है और ज्यादातर मामलों में प्लेटलेट्स डोनेशन के समान होती है।
एप्लास्टिक एनीमिया के मैनेजमेंट के लिए सरकारी सपोर्ट, डोनर रजिस्ट्रेशन कैंपेन और डोनर पूल बढ़ाने की आवश्यकता है। बार-बार इंफेक्शन, अत्यधिक थकान, बिना कारण ब्लीडिंग और नीले निशान जैसे लक्षणों की समय पर पहचान से जल्दी डायग्नोसिस और रेफरल संभव है। साथ ही, डोनर बेस मजबूत करने से पूरे भारत में हजारों मरीजों को जीवनदान दिया जा सकता है।


 

नारायणपुर के सुदूर गांवों में पहुंच रही हैं स्वास्थ्य सेवाएं : 107 ग्रामीणों को मिला उपचार

07-Mar-2026
रायपुर( शोर संदेश ) । नारायणपुर जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए ग्राम पंचायत घमंडी के आश्रित ग्राम जटवर में सुशासन एक्सप्रेस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान लगाए गए विशेष स्वास्थ्य जांच शिविर में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने पहुंचकर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया।
शिविर में ग्राम पंचायत घमंडी के अंतर्गत आने वाले जटवर, घमंडी, कोगालीं, ओरछापार, कारकाबेड़ा, हिकोनार, गोडेलेमाका और वाडापेंदा जैसे गांवों के ग्रामीण शामिल हुए। दो दिनों तक चले इस शिविर में कुल 107 मरीजों का उपचार किया गया और उन्हें आवश्यक दवाइयों के साथ स्वास्थ्य संबंधी परामर्श भी दिया गया।
स्वास्थ्य जांच के दौरान 84 लोगों की मलेरिया जांच की गई, जिनमें 15 मरीज पॉजिटिव पाए गए। इसके अलावा टीबी स्क्रीनिंग, रक्तचाप, शुगर, हीमोग्लोबिन और नेत्र जांच भी की गई। गर्भवती महिलाओं की विशेष एएनसी जांच कर उन्हें आवश्यक सलाह दी गई, जिससे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
शिविर में मौसमी बीमारियों जैसे सर्दी-खांसी, बुखार, खुजली, दस्त, कमजोरी और दर्द से पीड़ित मरीजों को भी उपचार और आवश्यक दवाइयां प्रदान की गईं। साथ ही ग्रामीणों को विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी दी गई और उन्हें अधिक से अधिक लाभ लेने के लिए प्रेरित किया गया। इस अवसर पर 80 ग्रामीणों को प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत जन आरोग्य योजना के तहत् आयुष्मान कार्ड भी वितरित किए गए।
इस स्वास्थ्य शिविर में 10 सदस्यीय स्वास्थ्य टीम ने सेवाएं दीं, जिसमें डॉ. बृजनंदन बनपुरिया, राजीव सिंह, डॉ. हेमेंद्र जुरी, प्रदीप देवांगन, सूरज साहू, रामनाथ उसेंडी, जयसिंह मांझी, नकुल पोटाई, कमलेश कुमार नाग और कु. चंद्रिका गोटा शामिल थे। शिविर का संचालन उप स्वास्थ्य केंद्र वाडापेंदा के माध्यम से किया गया।
दो दिवसीय सुशासन एक्सप्रेस कार्यक्रम के सफल आयोजन से ग्रामीणों को अपने ही क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हुईं। इससे न केवल लोगों को समय पर उपचार मिला, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ी। यह पहल दूरस्थ गांवों तक शासन की सेवाएं पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।

 

होली त्योहार पर अम्बेडकर अस्पताल में 24 घंटे जारी रहेगी इमरजेंसी सेवा

03-Mar-2026
रायपुर( शोर संदेश ) । होली त्योहार के मद्देनज़र अम्बेडकर अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए अस्पताल अधीक्षक डॉ. संतोष सोनकर ने चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ तथा पैरामेडिकल स्टाफ सहित सभी विभागों को आवश्यक निर्देश जारी किए हैं।
होली के दौरान संभावित दुर्घटनाओं एवं आपात स्थितियों को ध्यान में रखते हुए अधीक्षक डॉ. सोनकर द्वारा आपातकालीन सेवाओं के निर्बाध संचालन के विशेष निर्देश दिए गए हैं।
होली त्योहार के दिन 4 मार्च को शासकीय अवकाश होने के कारण अस्पताल में बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) का संचालन नहीं होगा। हालांकि, इमरजेंसी सेवा पूर्व की भांति 24 घंटे निरंतर जारी रहेगी। आपात चिकित्सा विभाग में आने वाले मरीजों को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए सभी वार्डों में जीवन रक्षक दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा समस्त मेडिकल स्टाफ को अलर्ट मोड में रहने के निर्देश दिए गए हैं।
त्योहार को देखते हुए अस्पताल परिसर की सुरक्षा व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया गया है।आवश्यकतानुसार मरीजों को डीकेएस अस्पताल स्थित सुपर स्पेश्यलिटी विभाग में रेफर किए जाने के लिए अम्बेडकर अस्पताल से डीकेएस अस्पताल तक एम्बुलेंस परिवहन सेवा उपलब्ध रहेगी।
अस्पताल प्रबंधन ने सभी लोगों से सुरक्षित एवं सावधानीपूर्वक होली मनाने की अपील की है तथा किसी भी प्रकार की मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति में अम्बेडकर अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में आकर उपचार प्राप्त करने को कहा है।
 

 



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