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बीजापुर में विकास की दस्तक: धुर माओवाद प्रभावित क्षेत्र में पहली बार सात गांवों में लगा मेगा हेल्थ कैंप

06-Nov-2025
रायपुर,  ( शोर संदेश )। कभी माओवाद की छाया में सिमटे बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लॉक के इन्द्रावती नदी पार बसे गांवों में अब विकास की नई सुबह दिखने लगी है। छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति 2025 के सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर नजर आने लगे हैं। बड़ी संख्या में माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद अब इन दुर्गम इलाकों में प्रशासन ने पहली बार सात गांवों में एक साथ मेगा हेल्थ कैंप का आयोजन किया, जिसने ग्रामीणों के जीवन में उम्मीद की नई किरण जगा दी।
इस अभियान में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम शामिल रही। टीम ने उसपरी, बेलनार, सतवा, कोसलनार, ताड़पोट, उतला और इतामपार गांवों में स्वास्थ्य शिविर लगाए। कुल 989 ग्रामीणों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। कैंप में सामान्य जांच के 777, रक्तचाप 371, मुख कैंसर 344, ब्रेस्ट कैंसर 112, नेत्र जांच 199, दंत जांच 154, टीकाकरण 14, संपूर्ण टीकाकरण 8, मलेरिया 156, क्षय रोग 7 तथा उल्टी-दस्त के 24 प्रकरणों की जांच की गई। इनमें 54 वरिष्ठ नागरिक भी शामिल रहे। 
विशेषज्ञों ने एक बालक को हृदय रोग से ग्रस्त पाया, जिसे ‘चिरायु योजना’ के तहत उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा प्रदान की जाएगी। कैंप के दौरान बीमार ग्रामीणों का मौके पर ही उपचार कर मुफ्त दवाइयों का वितरण किया गया। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुरूप साहू और डॉ. बी.एस. साहू ने बताया कि अब दूरस्थ अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाएं सुलभ हो रही हैं, जिससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद है। ग्रामीणों में भी अब भय की जगह विश्वास और आशा का माहौल दिखाई दे रहा है। वे शासन-प्रशासन से जुड़कर शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के प्रति सजग हो रहे हैं।
बीजापुर कलेक्टर संबित मिश्रा ने स्वास्थ्य विभाग की टीम को बधाई देते हुए कहा “शासन के निर्देशानुसार प्रशासन अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के लिए संकल्पित है। ‘नियद नेल्लानार योजना’ के तहत अंदरुनी क्षेत्रों में विकास कार्यों में तेजी आई है और प्रशासन की टीमें पूरी तत्परता से काम कर रही हैं।”जिससे बीजापुर में अब सकारात्मक बदलाव नजर आ रहे है।
बीजापुर में यह पहल न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को बढ़ाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रही है, बल्कि यह संदेश भी दे रही है कि अब माओवाद नहीं, मुख्यधारा और विकास ही बीजापुर की नई पहचान बनेगा।
 

बस्तर में स्वास्थ्य क्रांति: 25 वर्षों में मेडिकल कॉलेज, सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और ग्रामीण स्वास्थ्य नेटवर्क मजबूत

31-Oct-2025

रायपुर  ( शोर संदेश )  राज्य गठन के बाद बीते 25 वर्षों में बस्तर संभाग में स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक परिवर्तन और उल्लेखनीय सुधार देखने को मिले हैं। पहले जहां ग्रामीण और अंदरूनी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित थीं, वहीं अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पताल तक आधुनिक संसाधनों और विशेषज्ञ डॉक्टरों से सुसज्जित हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के 25 वर्ष पूरे होने पर बस्तर जिले की स्वास्थ्य सेवाओं में आई क्रांतिकारी बदलाव की कहानी प्रेरणादायक है। दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में जहां कभी बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं भी दुर्लभ थीं, वहां आज आधुनिक मेडिकल कॉलेज, सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और मजबूत ग्रामीण स्वास्थ्य नेटवर्क खड़े हो चुके हैं। यह प्रगति न केवल लाखों लोगों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ा रही है, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक उन्नति का आधार भी बन रही है।  

वर्ष 2006 में स्थापित यह मेडिकल कॉलेज बस्तर की स्वास्थ्य क्रांति का प्रतीक है। शुरुआत में प्रतिवर्ष 50 सीटों पर प्रवेश के साथ शुरू हुए इस कॉलेज का भूमि पूजन तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा 9 अगस्त 2006 को किया गया। निर्माण कार्य 2010 में शुरू होकर फरवरी 2013 में पूरा हुआ, और 3 अक्टूबर 2013 को मुख्यमंत्री द्वारा इसका लोकार्पण किया गया। मार्च 2014 में जगदलपुर से डिमरापाल में स्थानांतरित होने के बाद, यह कॉलेज प्रदेश का एकमात्र वायरोलॉजी लैब संचालित कर रहा है, जो माइक्रोबायोलॉजी विभाग में स्थित है। भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (एमसीआई) से मान्यता प्राप्त इस संस्थान में एमसीआई मानकों के अनुरूप सभी चिकित्सा उपकरण उपलब्ध हैं। अस्पताल का स्थानांतरण 6 जुलाई 2018 को नए भवन में हो चुका है, जिससे विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं और मजबूत हुई हैं। यह कॉलेज न केवल डॉक्टर तैयार कर रहा है, बल्कि महामारी जैसी चुनौतियों से निपटने में भी अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल: बस्तर को मिला विश्व स्तरीय स्वास्थ्य केंद्र
संभाग मुख्यालय जगदलपुर में डिमरापाल स्थित सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल अब बनकर तैयार है और जल्द ही सेवाएं शुरू होने वाली हैं। यह अस्पताल जटिल रोगों के इलाज में क्रांति लाएगा, जहां हृदय, किडनी और न्यूरो जैसी स्पेशलिटी सेवाएं उपलब्ध होंगी। बस्तर जैसे सुदूर क्षेत्र में यह अस्पताल स्थानीय लोगों को बड़े शहरों की यात्रा से मुक्ति दिलाएगा, जिससे समय और खर्च दोनों की बचत होगी।
1937 से बस्तर संभाग का सबसे बड़ा शासकीय अस्पताल महारानी अस्पताल आज भी स्वास्थ्य सेवाओं का मजबूत स्तंभ है। अगस्त 2006 से यह स्व. बलीराम कश्यप चिकित्सा महाविद्यालय सह अस्पताल के रूप में जाना जाता था, जहां 500 बिस्तर सक्रिय थे। 6 जुलाई 2018 से मेडिकल कॉलेज के अलग होने के बाद इसे पुनः महारानी अस्पताल के रूप में स्थापित किया गया। अस्पताल के जीर्णोद्धार के तीन चरणों में धन्वंतरी ओपीडी, सुश्रुत अस्थि रोग शल्य चिकित्सा कॉम्प्लेक्स, डिजिटल एक्स-रे, आईसीयू, मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर जैसी सुविधाएं शुरू की गईं। दूसरे चरण में फिजियोथेरेपी, आयुष विभाग और ऑडिटोरियम जोड़े गए, जबकि तीसरे चरण में कादम्बिनी मातृ-शिशु स्वास्थ्य संस्थान ने गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए टीकाकरण, सोनोग्राफी, प्रसव पूर्व-पश्चात जांच, सामान्य-सिजेरियन डिलीवरी, परिवार नियोजन और सीटी स्कैन जैसी सेवाएं शुरू कीं। वर्तमान में 200 बिस्तरों वाला यह अस्पताल दैनिक 700-800 ओपीडी, 40-45 आईपीडी, 8 प्रसव, 2200-2500 पैथोलॉजी टेस्ट और 65 एक्स-रे संचालित कर रहा है। प्रमुख विभागों में हमर लैब पैथोलॉजी, सर्जरी, मेजर सर्जरी, स्त्री रोग/प्रसूति, नेत्र चिकित्सा, कैंसर, इमरजेंसी, रेडियोलॉजी, शिशु रोग, अस्थि रोग और डायलिसिस शामिल हैं। भविष्य में 12 बिस्तर शिशु आईसीयू, जिला शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र और 30 बिस्तर डेडिकेटेड शिशु वार्ड शुरू होने वाले हैं।
महारानी अस्पताल की उत्कृष्टता को कई पुरस्कारों से नवाजा गया है- 2023 में सर्वश्रेष्ठ सिविल सर्जन पुरस्कार, एनक्यूएएस सर्टिफिकेशन से 17 विभागों को राष्ट्रीय प्रमाणन, 2022-23 में कायाकल्प पुरस्कार में राज्य स्तर पर प्रथम स्थान। 2023-24 में कायाकल्प पुरस्कार की कंसिस्टेंसी श्रेणी में सम्मान। अस्थि रोग विभाग में पहली बार हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी शुरू, जिसमें एक महिला का सफल ऑपरेशन।
पिछले 25 वर्षों में बस्तर जिले में 2 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 7 से 8 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 3 शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बढ़े हैं, जिससे 20-30 हजार जनसंख्या पर एक केंद्र उपलब्ध हो गया है। साथ ही, 50 से 60 उप स्वास्थ्य केंद्रों की वृद्धि से 3-5 हजार जनसंख्या और 3-5 किमी दायरे में प्राथमिक सेवाएं पहुंच रही हैं। अधोसंरचना के साथ मानव संसाधन, लैब जांच, ओपीडी/आईपीडी सुविधाओं में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
ये उपलब्धियां छत्तीसगढ़ सरकार की दूरदर्शिता का प्रमाण हैं, जो बस्तर जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रही हैं।राज्य सरकार की प्राथमिकता सूची में स्वास्थ्य क्षेत्र को शीर्ष स्थान देने के परिणामस्वरूप बस्तर में नए स्वास्थ्य केंद्र, आयुष्मान कार्ड, मातृ एवं शिशु देखभाल सेवाएं, एम्बुलेंस सुविधा और टेलीमेडिसिन सेवा जैसी पहलें सफलतापूर्वक लागू की गई हैं।कोविड-19 महामारी के दौरान बस्तर की स्वास्थ्य व्यवस्था ने मजबूती का परिचय दिया — ऑक्सीजन प्लांट, कोविड अस्पताल और टीकाकरण अभियान ने नए आयाम स्थापित किए।
वर्तमान में बस्तर जिला अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और ब्लॉक स्तर के स्वास्थ्य संस्थान आधुनिक उपकरणों, लैब सुविधाओं और विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम से सुसज्जित हैं। आने वाले वर्षों में सरकार का लक्ष्य है कि बस्तर के हर नागरिक को “गांव के पास ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधा” मिले।
 
 

कोरिया जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक विस्तार, 25 वर्षों में दर्ज की ऐतिहासिक प्रगति

30-Oct-2025
रायपुर ( शोर संदेश )  कोरिया जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और गुणवत्तापूर्ण उपचार सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पिछले 25 वर्षों में निरंतर और ऐतिहासिक प्रगति दर्ज की गई है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वर्ष 2000 से लेकर 2025 के बीच अनेक उपलब्धियां हासिल की गई है। उप स्वास्थ्य केंद्र 82 से बढ़कर 89, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 8 से बढ़कर 11 तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र 2 से बढ़कर 4 एवं जिला अस्पताल 100 बिस्तर क्षमता से बढ़कर 200 बिस्तर वाला अस्पताल संचालित हो रहा है।
जिले में मातृ एवं शिशु अस्पताल, फर्स्ट रेफरल यूनिट, हमर लैब, एनआरसी, वायरोलॉजी लैब, डायलिसिस, सीटी स्कैन, सोनोग्राफी, ईको मशीन एवं ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना की गई है। राज्य का पहला वयोवृद्ध हेल्थ चेकअप सेंटर भी कोरिया जिले में संचालित हो रहा है।
जिले में वर्तमान में 55 चिकित्सक, 11 विशेषज्ञ, 97 नर्सिंग स्टाफ, 16 लैब टेक्नीशियन, 93 एएनएम, 78 एमपीडब्ल्यू, कुल 10 एम्बुलेंस और 07 मुक्तांजलि वाहन उपलब्ध हैं।
आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत अब तक 2,67,244 कार्ड, तथा आयुष्मान वय वंदना योजना के 7,177 कार्ड बनाए जा चुके हैं।
वर्ष 2000 में जिले में केवल 05 आयुर्वेद औषधालय थे जो बढ़कर 7 हो गए हैं। पहले 05 आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी और 02 फार्मासिस्ट नियुक्त थे जबकि अब 07 आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी और 07 फार्मासिस्ट कार्यरत हैं। सभी औषधालय नवीन भवनों में संचालित हो रहे हैं।
जिला अस्पताल बैकुंठपुर में आयुष विंग संचालित है, जहाँ आयुर्वेद एवं पंचकर्म उपचार स्नेहन, स्वेदन, कटिबस्ति, जानुबस्ति, अभ्यंग तथा शिरोधारा आदि विधियों के माध्यम से किए जा रहे हैं। वर्तमान में जिले में आयुर्वेद के 07, होम्योपैथी के 04 तथा यूनानी के 02 आयुष केन्द्र संचालित हैं। इन केंद्रों से अब-तक 8 लाख 88 हजार से अधिक रोगी लाभान्वित हो चुके हैं। जिले के 07 आयुर्वेद औषधालयों में से 05 को आयुष्मान आरोग्य मंदिर के रूप में विकसित किया गया है। वहीं मोबाइल मेडिकल यूनिट (आयुष) के संचालन से ग्रामीण मरीजों का लाभ होने लगा है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय तथा स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल प्रदेश के सभी गांवों, शहरों खासकर सुदूर गांवों में स्वास्थ्य अधोसंरचना, आधुनिक स्वास्थ्य व आयुष सुविधाओं के विस्तार के लिए लगातार काम कर रहे हैं। निश्चित ही इन 25 बरसों के विकास यात्रा में कोरिया जिला स्वास्थ्य व आयुष के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की है।



 

गले में सूजन और खराश की समस्या से हैं परेशान तो आजमाएं ये घरेलू उपाय

28-Oct-2025

 बारिश के मौसम में, जब हमारी इम्यूनिटी कमज़ोर हो जाती है, तो सर्दी-खांसी और गले से जुड़ी समस्याएं आम हो जाती हैं। कई बार तो गला बैठ जाता है और इन्फेक्शन भी हो जाता है। गले में खराश के कई कारण हो सकते हैं, जैसे धूप से आकर तुरंत ठंडा पानी पी लेना या फिर गले में इन्फेक्शन। लेकिन घबराएं नहीं, कुछ घरेलू उपायों से आप इस समस्या से जल्द राहत पा सकते हैं।

नमक के पानी से गरारा: गले की खराश के लिए यह सबसे आसान और असरदार तरीका है। नमक में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं जो इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करते हैं। एक चौथाई चम्मच नमक को एक गिलास गुनगुने पानी में घोलें। दिन में तीन से चार बार इस पानी से गरारे करें, आपको तुरंत आराम मिलेगा।
हल्दी का दूध: हल्दी अपने औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है, और यह गले की खराश से निपटने में बहुत फायदेमंद है। एक गिलास पानी में एक चम्मच हल्दी डालकर पाँच मिनट तक उबालें। इस पानी से दिन में दो से तीन बार गरारे करें। यह गले की सूजन और दर्द दोनों में राहत देगा।
कैमोमाइल चाय: यह चाय औषधीय गुणों से भरपूर होती है और गले के इन्फेक्शन और खराश से छुटकारा दिला सकती है। इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण आँखों, नाक और गले की सूजन से राहत दिलाने में मदद करते हैं।
स्टीम है फायदेमंद: अगर आपके गले में बहुत ज़्यादा सूजन है और बोलने में भी दिक्कत हो रही है, तो स्टीम लेना बहुत फायदेमंद साबित होगा। स्टीम लेने से बंद नसें खुलती हैं और ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है। दिन में 3 से 4 बार स्टीम लेने से आपको काफी आराम मिलेगा।

स्वास्थ्य सेवाओं में नई उपलब्धि — मानपुर में सफल सिजेरियन डिलीवरी से मिली बड़ी राहत

18-Oct-2025
रायपुर ( शोर संदेश )  स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज करते हुए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, मानपुर में सफलतापूर्वक सिजेरियन डिलीवरी की गईं। कलेक्टर तुलिका प्रजापति के निर्देश एवं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के मार्गदर्शन में मानपुर स्वास्थ्य केन्द्र में सिजेरियन डिलीवरी शुरू होने जाने अब इस इलाके की गर्भवती माताओं को सिजेरियन ऑपरेशन के लिए 100 किलोमीटर दूर राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज तक नहीं जाना पड़ेगा।
ग्राम मानपुर की शशि परतेती एवं विकासखंड मोहला के ग्राम गिधाली की  राजेश्वरी सलामे का सफल ऑपरेशन किया गया। दोनों माताएँ एवं शिशु पूर्णतः स्वस्थ हैं। इस उल्लेखनीय सफलता में डॉ. अरविंद बनकर (स्त्री रोग विशेषज्ञ), डॉ. दिलीप किशोर शर्मा (निश्चेतना विशेषज्ञ), डॉ. सुजाता किशोर शर्मा (शिशु रोग विशेषज्ञ), डॉ. सीमा ठाकुर (चिकित्सा अधिकारी), डॉ. गिरीश खोब्रागढ़े (खंड चिकित्सा अधिकारी) तथा संपूर्ण चिकित्सा दल का सराहनीय योगदान रहा।
पूर्व में क्षेत्र की गर्भवती महिलाओं को सिजेरियन डिलीवरी हेतु राजनांदगांव जाना पड़ता था, जिससे उन्हें आर्थिक बोझ और असुविधाओं का सामना करना पड़ता था। अब मानपुर में यह सुविधा प्रारंभ होने से स्थानीय महिलाओं को न केवल राहत मिली है, बल्कि आकस्मिक परिस्थितियों में त्वरित चिकित्सीय सहायता भी सुलभ होगी। यह उपलब्धि स्वास्थ्य विभाग के उस लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसके तहत ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएँ सुलभ कराई जा रही हैं। 














 

 


अम्बेडकर अस्पताल में दुर्लभ एवं अपने आप में अनोखी सेकेंडरी एब्डोमिनल प्रेग्नेंसी का सफल ऑपरेशन

17-Oct-2025
रायपुर ( शोर संदेश )   नि:स्वार्थ सेवा, जीवन बचाने की चिकित्सा क्षमता और मानवीय करुणा के कारण डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है। कई बार रोगी की जान बचाने के लिए अपने अधिकतम प्रयास की सीमा से ऊपर उठकर वे रोगी को मौत के मुँह से भी निकालकर ले आते हैं। कुछ ऐसे ही सेवा, समर्पण और करुणा की परिभाषा और मिसाल कायम करते हुए चिकित्सालय के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की डॉक्टरों ने न केवल महिला का जीवन सुरक्षित किया बल्कि महिला के जटिलताओं से भरे गर्भ को बचाते हुए उसे मातृत्व सुख का अहसास भी दिलाया। 
पं. नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय एवं डॉ. भीमराव अम्बेडकर अस्पताल रायपुर के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की टीम ने अत्यंत दुर्लभ और जटिल परिस्थिति में 40 वर्षीय एक गर्भवती महिला की सफल डिलीवरी कर माँ और शिशु दोनों को जीवनदान दिया।
यह मामला सेकेंडरी एब्डोमिनल प्रेग्नेंसी का है, जिसमें भ्रूण गर्भाशय में न होकर पेट (एब्डोमिनल कैविटी) में विकसित हो रहा था। डॉक्टरों के अनुसार यह मध्य भारत का पहला और दुनिया के अत्यंत दुर्लभ मामलों में से एक है।
इस गर्भावस्था के दौरान महिला इमर्जेंसी में चौथे महीने के मध्यरात्रि में अम्बेडकर अस्पताल रेफर होकर आई। स्त्री रोग विभाग ने गंभीरता समझ तुरंत कार्डियोलॉजिस्ट से संपर्क  किया और तुरंत एंजियोप्लास्टी हुई। अम्बेडकर अस्पताल के एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट में हुई इस प्रक्रिया में डॉक्टरों ने विशेष सावधानी बरती ताकि गर्भस्थ शिशु को कोई हानि न पहुँचे। महिला खून पतला करने की दवाओं पर भी थी, गर्भ सुरक्षित रहा। 
यह गर्भावस्था के दौरान एंजियोप्लास्टी करने का पहला मामला था। 
स्त्री प्रसूति रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. ज्योति जायसवाल स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. रुचि किशोर गुप्ता बताती हैं कि - गर्भावस्था के 37वें हफ्ते में महिला पुन: स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग आई और उसे तुरंत भर्ती किया गया। केस की गंभीरता को देखते हुए गायनी, सर्जरी, एनेस्थीसिया और कार्डियोलॉजी विभाग की संयुक्त टीम बनाई गई। ऑपरेशन के दौरान हमने पाया कि शिशु गर्भाशय में नहीं, बल्कि पेट में विकसित हो रहा था और आंवल कई अंगों से रक्त ले रही थी। टीम ने सुरक्षित रूप से शिशु को बाहर निकाला। साथ ही भारी रक्तस्राव की संभावना को रोकने के लिए सावधानीपूर्वक चिपकी प्लेसेंटा के साथ गर्भाशय को भी निकालना पड़ा।
दोनों डॉक्टरों का कहना है कि इस केस पर विस्तृत अध्ययन कर इसे अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में प्रकाशित करने की तैयारी की जा रही है।
टीम के अथक प्रयासों से शिशु सकुशल पैदा हुआ और माँ भी पूरी तरह स्वस्थ है। महिला की डिलीवरी के बाद उसमें कोई जटिलता ना आए और उसका शिशु भी पूरी तरीके से स्वस्थ रहे इसके लिए हमने लगातार एक महीने तक महिला एवं शिशु को अस्पताल से डिस्चार्ज के बाद अपने यहां फॉलोअप के लिए बुलाया। तब हमने इस केस के बारे में बाकी लोगों को जानकारी दी क्योंकि यह शिशु महिला के लिए “प्रेशियस चाइल्ड” है। उसकी कोई संतान नहीं थी।  कई वर्ष पूर्व महिला को एक बच्चा हुआ था जो डाउन सिंड्रोम और हृदय रोग से ग्रस्त था और उसकी मृत्यु हो गई। अतः ऐसी महिला को मातृत्व सुख का एहसास कराना हमारे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। 
पं. नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय के डीन डॉ. विवेक चौधरी एवं अम्बेडकर अस्पताल के अधीक्षक डॉ. संतोष सोनकर ने कहा कि कठिन परिस्थितियों में मरीज जब अस्पताल आई, तब स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की टीम ने अद्भुत तत्परता और समर्पण के साथ उसका जीवन बचाया। 
स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा ही इस कार्य में सभी टीमों ने आपसी सहयोग और समन्वय की मिसाल पेश की। यह सामूहिक प्रयास चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल परिवार की उत्कृष्ट कार्य संस्कृति को दर्शाता है। पूरी चिकित्सक टीम इस सफलता की हार्दिक बधाई की पात्र है। आशा है कि भविष्य में भी इसी एकजुटता और समर्पण के साथ संस्थान निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर रहेगा।
डॉ. ज्योति जायसवाल ने बताया कि सेकेंडरी एब्डोमिनल प्रेग्नेंसी एक्टोपिक प्रेग्नेंसी का वह रूप है, जिसमें भ्रूण पहले गर्भाशय/ट्यूब में ठहरता है और बाद में पेट के अंगों में जाकर विकसित होने लगता है। यह माँ के लिए अत्यंत खतरनाक स्थिति होती है और अधिकांशतः भ्रूण जीवित नही रहते। ऑपरेशन ही इसका एकमात्र समाधान है। ”सेकेंडरी” इसलिए कहा जाता है क्योंकि संभवतः भ्रूण पहले गर्भाशय/फैलोपियन ट्यूब में ठहरता है और प्रारम्भिक  समय में ही वहां से हट कर पेट के अंगों (जैसे- आंत, लिवर, स्प्लीन या ओमेंटम या गर्भाशय की बाहरी सतह ) पर जाकर चिपक जाता है। यह माँ के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है, क्योंकि इसमें भारी रक्तस्राव और जटिलताओं का खतरा रहता है। माँ और शिशु की जान का पूरा जोखिम रहता है।
इस ऑपरेशन में स्त्री रोग विभाग से डॉ. ज्योति जायसवाल, डॉ. रुचि किशोर गुप्ता, डॉ. सुमा एक्का , डाॅ. नीलम सिंह, डाॅ. रुमी, एनेस्थीसिया विभाग से डाॅ. शशांक,  डाॅ. अमृता , जनरल सर्जरी विभाग से डॉ. अमित अग्रवाल (मल्टीडिसीप्लीन टीम) थी। ऑपरेशन के बाद भी मरीज के स्वास्थ्यलाभ के लिये स्त्री रोग विभाग, कार्डियोलॉजी विभाग और मेडिसिन विभाग से विशेषज्ञ शामिल रहे। मरीज एवं उनके परिवार ने भी डॉक्टर्स की टीम के प्रति अपना आभार प्रकट किया।
 

आयुष्मान योजना ने नया जीवन दिया दिव्यांग शंकर को

10-Oct-2025
रायपुर,। ( शोर संदेश ) 32 वर्षीय शंकर गुप्ता पहले से ही शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं। रोज़ की तरह वे घर लौट रहे थे, इस दौरान आकस्मिक दुर्घटना में शंकर के पैर की हड्डियाँ चार जगहों से टूट गईं जिनमें घुटने का पटेला, फीमर और लांग बोन क्षति हुई। उन्हें तत्काल जिला अस्पताल ले जाया गया। जहां चिकित्सकों ने बताया कि स्थिति गंभीर है और सर्जरी ही एकमात्र उपाय है। आयुष्मान भारत योजना से शंकर का निःशुल्क उपचार हुआ, जिससे उसे नया जीवन मिला।
जिले के विकासखण्ड रामचन्द्रपुर अंतर्गत ग्राम चाकी निवासी 32 वर्षीय शंकर गुप्ता  का इलाज का अनुमानित खर्च लगभग 80 हजार रुपये बताया गया। सीमित साधनों वाला परिवार असमंजस में था कि इतनी बड़ी रकम ईलाज के लिए कहाँ से लाए। ऐसी स्थिति में आयुष्मान भारत योजना उनके लिए संजीवनी बनकर आई। योजना के अंतर्गत उनका पूरा ईलाज निःशुल्क हुआ। सर्जरी, सीटी स्कैन और दवाइयाँ सभी इसी योजना के तहत कवर हुईं। सर्जरी सफल रही और अब शंकर की सेहत में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। चिकित्सकों की निगरानी में वे पुनः खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। 
ईलाज पूरा होने के बाद शंकर भावुक स्वर में कहते हैं, मैं पहले से दिव्यांग हूँ, दुर्घटना के बाद लगा कि अब शायद जीवनभर चल नहीं पाऊँगा। लेकिन आयुष्मान योजना मेरे लिए वरदान बन गई। यदि आयुष्मान योजना न होती तो मेरा ईलाज संभव नहीं था। सरकार की इस योजना ने मुझे न सिर्फ ईलाज, बल्कि दोबारा जीने का हौसला दिया है। शंकर गुप्ता की यह कहानी बताती है कि जब सरकारी योजनाएं सही जरूरतमंद तक पहुँचती हैं, तो वे किसी के लिए नया जीवन बन जाती हैं।














 

हृदय के पास छिपा था कैंसर, डॉक्टरों ने ढूंढकर किया ऑपरेशन, दी नई ज़िंदगी

09-Oct-2025
रायपुर,( शोर संदेश ) पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय, रायपुर के डॉक्टरों ने एक बार फिर 35 वर्षीय युवक के हृदय से चिपकी 11x7 सेंटीमीटर की जटिल कैंसरग्रस्त गांठ की सफल सर्जरी कर मरीज को नई जिंदगी दी है। मरीज को थाइमस ग्रंथि से उत्पन्न होने वाला दुर्लभ और आक्रामक कैंसर - इंवेसिव कार्सिनोमा ऑफ थाइमस (Invasive carcinoma of thymus) नामक बीमारी थी। पाँच घंटे चले जटिल ऑपरेशन के बाद गांठ को सफलतापूर्वक निकाल दिया गया। कैंसर सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. आशुतोष गुप्ता और हार्ट सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू के नेतृत्व में सर्जन की टीम ने हार्ट और फेफड़े से चिपके कैंसरग्रस्त हिस्से के साथ गांठ को निकालते हुए लगातार पांच घंटे की जटिल सर्जरी की। डॉक्टरों के अनुसार सम्भवत: यह मध्य भारत में इंवेसिव कार्सिनोमा ऑफ थाइमस का पहला केस है।
 डॉ. आशुतोष गुप्ता के अनुसार यह गांठ इतनी गहराई से हृदय की बड़ी रक्त नलियों जैसे - एओर्टा, जुगलर वेन और सुपीरियर वेनाकेवा (Aorta, Jugular Vein & SVC), से जुड़ी थी कि इसे पूरी तरह निकाल पाना चिकित्सीय दृष्टि से अत्यंत चुनौतीपूर्ण माना जाता है। पैथोलॉजी रिपोर्ट में इसे इंवेसिव कार्सिनोमा ऑफ थाइमस बताया गया जो कि अत्यंत दुर्लभ कैंसरों में से एक है।
चिकित्सा महाविद्यालय के डीन डॉ. विवेक चौधरी एवं अम्बेडकर अस्पताल के अधीक्षक डॉ. संतोष सोनकर ने दोनों विभाग के डॉक्टरों के संयुक्त प्रयासों से की गई इस सफल सर्जरी को अस्पताल के लिए एक और उपलब्धि बताया है और कहा है कि यह सर्जरी अस्पताल की कैंसर सर्जरी (आंकोसर्जरी) और कार्डियक सर्जरी टीम की दक्षता एवं आपसी समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। 
ओडिशा निवासी 35 वर्षीय पुरुष मरीज सीने में दर्द और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत लेकर अस्पताल के कैंसर सर्जरी ओपीडी में पहुंचे थे। डॉ. आशुतोष गुप्ता के मार्गदर्शन में मरीज की जांचें की गईं, जिनमें खून की जांच, सीटी स्कैन एवं सोनोग्राफी शामिल थीं। जांचों में मरीज की छाती के हृदय के सामने स्थित छाती के क्षेत्र (anterior mediastinum) क्षेत्र में 11×7 सेंटीमीटर की गांठ पाई गई, जो हृदय की बड़ी रक्त नलियों से चिपकी हुई थी। बायोप्सी रिपोर्ट में थाइमोमा (Thymoma) होने की जानकारी मिली जो एक दुर्लभ प्रकार का ट्यूमर है।
गांठ की जटिल स्थिति को देखते हुए कैंसर सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. आशुतोष गुप्ता ने हार्ट सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. के.के. साहू से परामर्श किया। उसके बाद विशेषज्ञों की टीम ने ऑपरेशन का निर्णय लिया।
ऑपरेशन के दौरान मेडियन स्टर्नोटॉमी (Median Sternotomy) शल्य प्रक्रिया के माध्यम से छाती की हड्डी को काटकर हृदय तक पहुंच बनाई गई। गांठ हृदय की सतह (Pericardium) और बड़ी रक्त वाहिकाओं - एओर्टा, जुगलर वेन और सुपीरियर वेनाकेवा (Aorta, Jugular Vein & SVC) से गहराई तक चिपकी हुई थी। लगभग पाँच घंटे तक चले इस जटिल ऑपरेशन में रक्त वाहिकाओं को गांठ से सावधानीपूर्वक अलग करके रिपेयर किया गया तथा गांठ को दाएँ फेफड़े के कुछ हिस्से सहित पूरी तरह निकाला गया।
ऑपरेशन सफल रहा और मरीज की स्थिति अब स्थिर एवं बेहतर है। पैथोलॉजी जांच में गांठ को इंवेसिव कार्सिनोमा ऑफ थाइमस (Invasive carcinoma of thymus) बताया गया, जो अत्यंत दुर्लभ कैंसरों में से एक है।
डॉ. के.के. साहू के अनुसार, यह सर्जरी सेंट्रल इंडिया में इसलिए विशेष है क्योंकि इस कैंसर का पता देर से चलता है और तब तक यह सर्जरी संभव नहीं हो पाती, और हर अस्पताल में ये सर्जरी हो, यह भी कई बार संभव नहीं होता क्योंकि इसकी सर्जरी के लिए कैंसर सर्जन और हार्ट सर्जन की बड़ी टीम चाहिए होती है। 
इस जटिल सर्जरी में डॉ. आशुतोष गुप्ता, डॉ. के.के. साहू, डॉ. किशन सोनी, डॉ. गुंजन अग्रवाल, डॉ. सुश्रुत अग्रवाल, डॉ. के. लावण्या, डॉ. समृद्ध, डॉ. सोनम, डॉ. अनिल, तथा निश्चेतना विभाग से डॉ. रचना एवं डॉ. अविनाश की महत्वपूर्ण भूमिका रही।






 

छत्तीसगढ़ में महिला स्वास्थ्य का नया अध्याय – “स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार” अभियान से ग्रामीण अंचल हुए जागरूक

04-Oct-2025
रायपुर।  ( शोर संदेश )  केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की महत्वाकांक्षी पहल “स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार अभियान” ने छत्तीसगढ़ में कई नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। बीते पखवाड़े भर में प्रदेशभर में 31 हजार से अधिक स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए गए, जिनमें लगभग 22 लाख लोगों ने जांच और उपचार की सेवाएं प्राप्त कीं। विशेष बात यह रही कि इन शिविरों में महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक रही। यह इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि अब ग्रामीण अंचलों में भी महिलाएं अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूक हो रही हैं। यह सहभागिता अभियान के उस मूल विचार को सशक्त करती है, जिसके अनुसार जब महिला स्वस्थ होती है, तभी पूरा परिवार और समाज सशक्त बनता है।
इन शिविरों में महिला स्वास्थ्य, पोषण और अनीमिया जांच को विशेष प्राथमिकता दी गई। इस दौरान पाँच लाख से अधिक लोगों की अनीमिया जांच की गई। यह न केवल जांच की व्यापकता को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि राज्य सरकार महिलाओं में खून की कमी जैसी पुरानी समस्या के समाधान हेतु ठोस कदम उठा रही है। शिविरों में गर्भवती महिलाओं की एएनसी जांच, बच्चों का टीकाकरण, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, टीबी, कैंसर और सिकल सेल जैसी बीमारियों की स्क्रीनिंग को भी शामिल किया गया। परिणामस्वरूप 1.91 लाख गर्भवती महिलाओं की जांच की गई, 2.72 लाख लोगों की सिकल सेल स्क्रीनिंग हुई, 3.72 लाख लोगों की टीबी जांच की गई और 67 हजार से अधिक बच्चों को टीके लगाए गए।
अभियान अंतर्गत महिला स्वास्थ्यकर्मियों और विशेषज्ञों ने बड़ी संख्या में महिलाओं को संतुलित आहार, आयरन-फोलिक एसिड की महत्ता, स्वच्छता और जीवनशैली में सुधार जैसे विषयों पर परामर्श दिया। यह पहल उपचार से आगे बढ़कर समय रहते रोगों की पहचान और रोकथाम की दिशा में भी कारगर सिद्ध हो रही है। लगभग 13 लाख लोगों को विभिन्न स्वास्थ्य विषयों पर जागरूक किया गया, जिससे यह स्पष्ट है कि यह अभियान केवल बीमारियों का उपचार नहीं, बल्कि समाज में स्वास्थ्य के प्रति सोच बदलने का प्रयास भी है।
अभियान की व्यापकता का अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि इसे नवरात्रि महोत्सव से जोड़कर महिला स्वास्थ्य और परिवार सशक्तिकरण की अभिनव पहल की गई। राज्य के विभिन्न जिलों में नवरात्रि के दौरान माता पंडालों और गरबा स्थलों पर हजारों महिलाओं ने ‘स्वस्थ नारी–सुरक्षित परिवार’ का संकल्प लिया। इस अवसर पर स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने महिलाओं को स्वच्छता, संतुलित आहार, नियमित स्वास्थ्य जांच और मासिक धर्म स्वच्छता के महत्व से अवगत कराया।
राज्य सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों को भी इस अभियान से जोड़ा है। इस दौरान 36,186 हितग्राहियों को आयुष्मान वय वंदना कार्ड एवं प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के कार्ड वितरित किए गए, जिससे अब उन्हें उच्चस्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं तक निःशुल्क पहुंच मिल सकेगी। छत्तीसगढ़ का यह अभियान केवल स्वास्थ्य सुविधा का विस्तार नहीं, बल्कि सामाजिक सशक्तिकरण का एक मॉडल बनकर उभर रहा है। गांव-गांव और दूरस्थ अंचलों तक पहुँचते हुए यह पहल दर्शाती है कि जब नीतियां ज़मीन पर उतरती हैं, तो बदलाव केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि जीवन के हर स्तर पर दिखाई देता है।
भारत सरकार ने वर्ष 2025 तक टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य निर्धारित किया है और इसी दिशा में लगातार निर्णायक कदम उठाए जा रहे हैं। इस लक्ष्य की प्राप्ति में छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी पूरी प्रतिबद्धता के साथ योगदान दे रहे हैं।‘स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार’ अभियान के दौरान ही 3,72,985 लोगों की टीबी स्क्रीनिंग की गई, जिनमें लक्षण पाए जाने पर तुरंत इलाज की प्रक्रिया शुरू की गई। टीबी रोगियों के पोषण और सहयोग के लिए 7,000 से अधिक ‘निक्षय मित्रों’ को पंजीकृत किया गया है, जो उन्हें पोषण आहार और मानसिक संबल प्रदान कर रहे हैं।
"स्वस्थ नारी ही सशक्त परिवार और समाज की नींव है और इसी सोच के साथ छत्तीसगढ़ में स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार अभियान ने व्यापक सफलता हासिल की है। बीते पखवाड़े में आयोजित हजारों शिविरों में लाखों लोगों ने जांच व उपचार कराए, जिनमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने यह साबित किया कि अब ग्रामीण अंचलों में भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। इस अभियान में महिला स्वास्थ्य, पोषण, टीकाकरण और गंभीर बीमारियों की जांच के साथ-साथ परामर्श और जागरूकता पर भी जोर दिया गया है, जिससे यह पहल सिर्फ इलाज तक सीमित न रहकर सामाजिक सशक्तिकरण का मॉडल बन गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के टीबी मुक्त भारत 2025 संकल्प की दिशा में छत्तीसगढ़ का यह योगदान महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।"
"स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार अभियान ने गांव-गांव और दूरस्थ अंचलों तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाकर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। लाखों महिलाओं को अनीमिया, सिकल सेल और टीबी जैसी बीमारियों की जांच एवं परामर्श की सुविधा मिली है।  राज्य सरकार की प्रतिबद्धता है कि हर परिवार तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचे और यह अभियान इस दिशा में एक मजबूत कदम साबित हुआ है।"

कैबिनेट ने दालों में आत्मनिर्भरता के लिए 11,440 करोड़ रुपए के प्लान को दी मंजूरी

02-Oct-2025
नई दिल्ली। शोर संदेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को 11,440 करोड़ रुपए के वित्तीय परिव्यय के साथ दालों में आत्मनिर्भरता मिशन को मंजूरी दे दी। घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और दालों में आत्मनिर्भरता हासिल करने के उद्देश्य से इस ऐतिहासिक पहल को 2025-26 से 2030-31 तक छह वर्षों की अवधि में क्रियान्वित किया जाएगा।
आधिकारिक बयान के अनुसार, दलहन मिशन के तहत अगले 4 वर्षों के दौरान लगभग 2 करोड़ किसानों को बेहतर बीजों की आपूर्ति की जाएगी और कटाई के बाद फसल के प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचे तैयार किया जाएगा। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उत्पादकों से तुअर, उड़द और मसूर दालों की 100 प्रतिशत खरीद सुनिश्चित की जाएगी।
भारत की फसल प्रणालियों और आहार में दालों का विशेष महत्व है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और उपभोक्ता देश है। बढ़ती आय और जीवन स्तर के साथ, दालों की खपत में भी वृद्धि हुई है। हालांकि, घरेलू उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं रहा है, जिसके कारण दालों के आयात में 15-20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
उन्नत किस्मों को व्यापक रूप से उपलब्ध कराने के लिए, दलहन उत्पादक किसानों को 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरित किए जाएंगे, जो 2030-31 तक 370 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करेंगे।
इस मिशन का उद्देश्य चावल की फसल केंद्रित भूमि और अन्य विविधीकरण योग्य भूमि को लक्षित करके दलहनों के क्षेत्रफल को 35 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना है, जिसमें अंतर-फसलीय खेती और फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके लिए किसानों को 88 लाख बीज किट निःशुल्क वितरित की जाएंगी।
इस मिशन से 2030-31 तक दलहनों का क्षेत्रफल 310 लाख हेक्टेयर तक बढ़ने, उत्पादन 350 लाख टन तक बढ़ने और उपज 1130 किलोग्राम/हेक्टेयर तक पहुचने की उम्मीद है। उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ, इस मिशन से रोजगार के महत्वपूर्ण अवसर भी पैदा होंगे।
वहीं, दालों की नवीनतम किस्मों के विकास और प्रसार पर ज़ोर दिया जाएगा, जो उच्च उत्पादकता वाली, कीट-प्रतिरोधी और जलवायु-प्रतिरोधी हों। क्षेत्रीय उपयुक्तता सुनिश्चित करने के लिए प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में बहु-स्थानीय परीक्षण किए जाएंगे।
इसके अलावा, प्रीमियम गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए राज्य पांच वर्षीय रोलिंग बीज उत्पादन योजना तैयार करेंगे। प्रजनक बीज उत्पादन की निगरानी आईसीएआर (ICAR) द्वारा की जाएगी। आधारभूत और प्रमाणित बीज उत्पादन राज्य और केंद्रीय स्तर की एजेंसियों द्वारा किया जाएगा, और समग्र सूची (SATHI) पोर्टल के माध्यम से इस पर कड़ी नज़र रखी जाएगी। 
 



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