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किसान

सौर सुजला योजना से सिंचाई सुविधा में हो रहा विस्तार

11-Oct-2025
रायपुर, शोर संदेश )  छत्तीसगढ़ में किसानों को आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से राज्य शासन द्वारा सौर सुजला योजना का सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत किसानों को सोलर पम्प उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिससे अब वर्षा पर निर्भर रहने वाले खेतों में भी सिंचाई की सुविधा सुलभ हो गई है। परिणामस्वरूप किसान अब वर्ष में दोहरी फसल लेकर अपनी आय दोगुनी कर रहे हैं।
जिले के विकासखण्ड रामचन्द्रपुर के ग्राम झारा के किसान मुनेश्वर प्रसाद यादव ने सौर सुजला योजना से लाभ लेकर अपनी खेती को नई दिशा दी है। उनके पास 5 एकड़ भूमि है, जिसमें पहले केवल 2 एकड़ ही सिंचित थी। क्रेडा विभाग की सहायता से सोलर पम्प लगवाने के बाद अब पूरी भूमि पर सिंचाई संभव हो गई है। यादव अब धान के साथ-साथ साग-सब्जियों की खेती भी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले खरीफ सीजन में लगभग 60 हजार रुपये की आमदनी होती थी, जबकि सोलर पम्प लगने के बाद अब वार्षिक आय बढ़कर करीब 1 लाख रुपये तक पहुँच गई है।उन्होंने कहा कि पहले वर्षा आधारित खेती से जोखिम और नुकसान की आशंका बनी रहती थी, परंतु सौर सुजला योजना से सिंचाई की निर्बाध सुविधा मिलने के बाद खेती अब अधिक लाभदायक हो गई है। अब वे रबी और खरीफ दोनों सीजन में फसलें ले रहे हैं और साग-सब्जी उत्पादन से अतिरिक्त आमदनी अर्जित कर रहे हैं।
वर्तमान में सौर सुजला योजना फेस-9 के अंतर्गत बलरामपुर जिले को 300 सोलर पम्प लगाने का लक्ष्य प्राप्त हुआ है। इच्छुक किसान आधार कार्ड, भूमि का खसरा, रकबा, प्रमाणित नक्शा, जाति प्रमाण पत्र, पासबुक की छायाप्रति, स्थापना स्थल के फोटोग्राफ्स तथा आवेदन शुल्क (3 एचपी पम्प के लिए 3000 रुपए, 5 एचपी के लिए 4800 रुपए) के साथ अपने ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, क्रेडा या उप संचालक कृषि कार्यालय में संपर्क कर योजना का लाभ ले सकते हैं।











 

 


विशेष लेख : कम जल खपत वाली धान की नई किस्म एमटीयू 1156 एवं 1153 से अधिक उपज – कीट एवं व्याधि के प्रति प्रतिरोधी फसल

10-Oct-2025
धमतरी। ( शोर संदेश ) प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण एवं रत्नागर्भा कहलाने वाला जिला धमतरी वनों से आच्छादित है तथा इसे नैसर्गिक संपदा का वरदान प्राप्त है। महानदी के उद्गम स्थल के रूप में प्रसिद्ध यह जिला सुनिश्चित सिंचाई क्षेत्र के विस्तृत रकबे के लिए भी जाना जाता है। मेहनतकश किसानों द्वारा खरीफ एवं रबी दोनों मौसम में बड़े पैमाने पर धान की खेती की जाती है। धान फसल के लिए उपयुक्त जलवायु एवं उपजाऊ भूमि के कारण इस जिले को ‘धनहा धमतरी’ के नाम से भी जाना जाता है।
कृषि के क्षेत्र में निरंतर प्रगति के साथ-साथ भूमिगत जल स्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता भी बढ़ी है। चूंकि जिले में बड़े पैमाने पर धान की पैदावारी की जाती है, जिससे जल की अधिक खपत होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने कम जल खपत वाली नई धान की किस्में विकसित की हैं।
जिला धमतरी में एमटीयू श्रृंखला की दो नई किस्में – एमटीयू 1153 (चन्द्रा) एवं एमटीयू 1156 (तरंगिनी) – किसानों को प्रदर्शन फसल के रूप में उपलब्ध कराई गई हैं।
एमटीयू 1153 किस्म को वर्ष 2015 में विकसित किया गया। यह मध्यम अवधि की किस्म है, जो लगभग 115 से 120 दिनों में पककर तैयार होती है। इसकी पौध की ऊँचाई कम तथा तना मजबूत होने के कारण फसल गिरने (लॉगिंग) की संभावना नगण्य होती है। यदि फसल गिर भी जाए तो जल अंकुरण की समस्या नहीं होती। इसमें दो सप्ताह की सुसुप्ता अवस्था का गुण पाया जाता है। यह ब्लास्ट एवं भूरा माहू जैसी प्रमुख बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी है। अनुकूल परिस्थितियों में इसकी औसत उपज 60 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है
एमटीयू 1156, जिसे वर्ष 2015 में राइस रिसर्च स्टेशन मरूतेरू द्वारा विकसित किया गया, मध्यम अवधि की उच्च उपज देने वाली किस्म है। इसके दाने लंबे, पतले तथा उच्च प्रसंस्करण गुणवत्ता वाले होते हैं, जिससे टूटने की संभावना कम रहती है। यह किस्म 115 से 120 दिनों में पक जाती है तथा तना मजबूत होने से फसल गिरने की संभावना कम रहती है। यह भी ब्लास्ट एवं भूरा माहू रोगों के प्रति प्रतिरोधी है। इसकी औसत उपज 60 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पाई जाती है।
विक्रम टीसीआर किस्म उच्च पैदावारी के लिए विकसित की गई है, जिसकी उत्पादन क्षमता 60 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म 125 से 130 दिनों में पकती है, कम पानी की आवश्यकता होती है तथा कीट-व्याधियों के प्रति प्रतिरोधी है।
विकासखण्ड धमतरी के ग्राम झिरिया में कृषक धमेन्द्र कुमार चन्द्राकर के खेत में नई किस्म एमटीयू 1156 का प्रदर्शन प्लॉट तैयार किया गया। उप संचालक कृषि द्वारा निरीक्षण कर कृषकों को आवश्यक समसामयिक सलाह प्रदान की गई।
कृषक चन्द्राकर ने बताया कि इस किस्म की खेती आसान है तथा कीट-व्याधि का प्रकोप कम होने से कृषि लागत में कमी आती है। यह उच्च उपज देने वाली फसल है तथा प्रति एकड़ 28 से 30 क्विंटल तक उपज मिलने की संभावना है।

धान खरीदी के लिए किसानों का एग्रीस्टैक पोर्टल में पंजीयन 31 अक्टूबर तक

08-Oct-2025
  रायपुर  ।  ( शोर संदेश ) खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग द्वारा खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी हेतु किसानों का एग्रीस्टैक पोर्टल में पंजीयन आवश्यक है। खाद्य सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले ने जानकारी दी कि एग्रीस्टैक पोर्टल भारत सरकार द्वारा विकसित एक यूनिफाइड एग्रीकल्चर डेटाबेस है, जिसमें किसानों का भूमि एवं आधार लिंक्ड पंजीयन किया जाता है। पंजीकरण उपरांत किसानों को एक यूनिक फार्मर आईडी (Unique Farmer ID) प्राप्त होती है। यह आधार लिंक्ड डेटाबेस शासन की विभिन्न योजनाओं के लाभ केवल वास्तविक पात्र किसानों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के तहत किसानों को सीधे भुगतान किया जाता है। अतः शासन की मंशा है कि सभी पात्र किसान सुशासन एवं पारदर्शिता के साथ इस योजना का वास्तविक लाभ प्राप्त करें। गत वर्ष राज्य के 25.49 लाख किसानों ने धान विक्रय किया था। एग्रीस्टैक में आधार-आधारित पंजीयन और ई-केवाईसी की व्यवस्था से संपूर्ण प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता, सटीकता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित होगा। एग्रीस्टैक पोर्टल डिजिटल क्रांति की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा, जो छत्तीसगढ़ में धान खरीदी व्यवस्था को पारदर्शी, सटीक और किसान हितैषी बनाएगा। एग्रीस्टैक पोर्टल से संबंधित किसी भी जानकारी या सहायता के लिए टोल फ्री नंबर 1800-233-1030 पर संपर्क किया जा सकता है।
वर्तमान वर्ष में अब तक 21.47 लाख किसानों ने एग्रीस्टैक पोर्टल पर पंजीकरण कर लिया है। शेष किसान अपने निकटतम सहकारी समिति या निर्धारित केंद्र में जाकर 31 अक्टूबर 2025 तक अपना पंजीयन करा सकते हैं। इस संबंध में सभी समितियों और जिला कलेक्टरों को पूर्व में आवश्यक निर्देश जारी किए जा चुके हैं।
उल्लेखनीय है कि इस वर्ष राज्य के 20 हजार ग्रामों में से 13 हजार 879 ग्रामों में डिजिटल क्रॉप सर्वे किया गया है। इस डिजिटल क्रॉप सर्वे और मैनुअल गिरदावरी की रिपोर्टों का 2 से 14 अक्टूबर 2025 तक ग्राम सभाओं में पठन किया जा रहा है। इसके लिए प्रत्येक पंचायत में मुनादी कर सूचना दी गई है और सर्वे सूची का पंचायत भवनों में प्रदर्शन (चस्पा) भी किया गया है। इसकी सतत निगरानी जिला कलेक्टर, खाद्य अधिकारियों तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा की जा रही है। यह पहल “डिजिटल एग्रीकल्चर और गुड गवर्नेंस” की दिशा में राज्य का एक सशक्त और दूरदर्शी कदम है।

डबरी ने खोले समृद्धि के द्वार, दुलार सिंह का सपना हुआ साकार

07-Oct-2025
रायपुर, ।  ( शोर संदेश ) जांजगीर-चांपा जिले की ग्राम पंचायत जाटा के बहेराडीह के दुलार सिंह खेत में एक डबरी बनाने से ही खेती और पशुपालन में होने वाली बढ़ौत्तरी का सजीव उदाहरण बन गए हैं। दुलार सिंह ने यह डबरी भी मनरेगा योजना के माध्यम से बनवाई है। ग्रामीण जीवन का आधार सदैव कृषि और पशुपालन रहा है, परंतु इन दोनों ही कार्यों की आत्मा जल है । यदि जल की व्यवस्था सुदृढ़ हो जाए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था स्वयं सशक्त हो जाती है। इसी सोच को दुलार सिंह ने साकार रूप दिया है।
डबरी निर्माण होने से पूर्व दुलार सिंह को अपने खेतों की सिंचाई हेतु जल की कमी रहती थी, जिससे सीमित फसल ही ले पाते थे। इसके अलावा बतख पालन, मछली पालन एवं धान की खेती की सिंचाई करने के लिए हमेशा पानी की कमी को महसूस करते आ रहे थे, ऐसे में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के माध्यम से ग्राम पंचायत जाटा में दुलार सिंह के खेत पर डबरी निर्माण कार्य स्वीकृत किया गया। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत ग्राम जाटा के किसान श्री दुलार सिंह द्वारा अपनी निजी भूमि पर डबरी निर्माण कार्य कराया गया। इस कार्य के लिए  2.14 लाख की प्रशासकीय राशि स्वीकृत की गई इसका कार्य प्रारंभ हुआ और जून 2024 को पूर्ण हुआ। इसमें कुल 380 मानव दिवसों के सृजन से 37 श्रमिक परिवारों को 92,577 की मजदूरी प्राप्त हुई। इससे न केवल रोजगार सृजन हुआ बल्कि जल संरक्षण और कृषि उत्पादन में भी वृद्धि हुई। अब डबरी में वर्षा जल का संचयन होने से वर्षभर खेतों की सिंचाई सुचारू रूप से हो रही है। इसके साथ ही उन्होंने मत्स्य पालन एवं पशुपालन शुरू किया, जिससे अतिरिक्त आमदनी का स्रोत भी बना।
दुलार सिंह बताते हैं कि मनरेगा योजना के अंतर्गत डबरी निर्माण से अब मेरी खेती सिंचित हो रही है। इससे धान के साथ-साथ मेढ़ पर सब्ज़ियाँ भी उगा पा रहा हूँ। डबरी में रोहू एवं पंगास मछली 2 कि.ग्रा. मछली के बीज डाले गये है। आगामी माह में मछली 01 किलो होने के बाद इन्होने बाजार में बिक्री करेंगे, जिससे आमदनी प्राप्त होगी। दुलार सिंह अपने निर्मित डबरी के मेंड़ पार पर हल्दी एवं तिल का फसल लगाया हुआ है, जिसे वह हल्दी एवं तिल को अपने घर के लिये उपयोग करेंगे। मत्स्य पालन और पशुपालन से घर की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। ग्राम पंचायत सरपंच एवं रोजगार सहायक ने बताया कि इस कार्य से गांव के अन्य किसानों को भी प्रेरणा मिली है। ग्रामीण अब अपनी भूमि पर जल संरक्षण संरचनाएँ बनवाने हेतु आगे आ रहे हैं। इस डबरी निर्माण कार्य ने न केवल श्री दुलार सिंह के जीवन में स्थायी आजीविका का आधार तैयार किया है, बल्कि यह मनरेगा के उद्देश्य रोजगार के साथ स्थायी संपत्ति निर्माण का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन गया है।

बरबट्टी की खेती से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे केराबहार के किसान खुलेश्वर पैंकरा

04-Oct-2025
रायपुर।  ( शोर संदेश )  किसान पारंपरिक खेती से हटकर अब वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाते हुए अधिक मुनाफा देने वाली फसलों की ओर अग्रसर हो रहे हैं। इससे न केवल उनकी आमदनी में वृद्धि हो रही है, बल्कि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता की दिशा में भी कदम बढ़ा रहे हैं। इसी कड़ी में रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड के ग्राम केराबहार निवासी खुलेश्वर पैंकरा ने अपनी मेहनत और लगन से 0.5 एकड़ भूमि में बरबट्टी की खेती कर अच्छा उत्पादन प्राप्त किया है।
किसान पैंकरा बताते हैं कि उन्होंने उद्यान विभाग के सहयोग से आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग करते हुए बरबट्टी की फसल ली। परिणामस्वरूप बरबट्टी की बाजार दर 50 रुपए प्रति किलो होने से उन्हें 70,000 रुपए की सकल आय प्राप्त हुई। खेती में कुल लागत 20,000 रूपये आई, जिसके बाद उन्होंने 50,000 रुपए का शुद्ध लाभ अर्जित किया।
उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की मंशा के अनुरूप जिला प्रशासन द्वारा किसानों की आर्थिक उन्नति और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक खेती के साथ-साथ बागवानी एवं आयमूलक फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है। रायगढ़ कलेक्टर के निर्देशन एवं उद्यान विभाग की सहायक संचालक के मार्गदर्शन में इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों के सकारात्मक परिणाम अब देखने को मिल रहे हैं। किसान खुलेश्वर पैकरा की यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि किसान समय पर फसल चयन, उचित तकनीक और मेहनत को अपनाए, तो सीमित संसाधनों में भी समृद्धि हासिल की जा सकती है। पैंकरा को बरबट्टी की खेती से जहां आर्थिक लाभ मिला, वहीं इस फसल ने मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और जैविक खेती को प्रोत्साहन देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  पैंकरा बताते हैं कि वे इस वर्ष भी बरबट्टी की खेती कर रहे हैं और आने वाले समय में फसल का क्षेत्रफल बढ़ाने के साथ-साथ वे आसपास के किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करने की योजना बना रहे हैं।

कौशल विकास से किसानों की आय और आत्मनिर्भरता में बढ़ोतरी

01-Oct-2025
नई दिल्ली ( शोर संदेश )। देश को सशक्त बनाने के लिए किसानों का सशक्त होना बहुत जरूरी है। इसलिए किसानों को सशक्त बनाना भारत की कृषि रणनीति की आधारशिला बनकर उभरा है। भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और लगभग आधी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। इसलिए समावेशी और टिकाऊ विकास के लिए किसानों के कौशल और क्षमताओं को मज़बूत करना ज़रूरी है। आज किसानों के समक्ष चुनौतियाँ ऋण या इनपुट तक पहुँच से कहीं अधिक हैं; इनमें जलवायु परिवर्तन के साथ तालमेल बिठाना, मृदा स्वास्थ्य का प्रबंधन, मशीनीकरण को अपनाना और बेहतर बाज़ार अवसर हासिल करना शामिल है।
भारत सरकार ने इसे समझते हुए कौशल विकास और प्रशिक्षण को अपने ग्रामीण विकास एजेंडे के केंद्र में रखा है। पिछले एक दशक में, किसानों को व्यावहारिक ज्ञान, व्यावसायिक कौशल और आधुनिक तकनीकों से परिचित कराने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसान केवल किसान ही न बनें, बल्कि नवप्रवर्तक, निर्णयकर्ता और कृषि-मूल्य श्रृंखला में सक्रिय योगदानकर्ता भी बनें।
कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) जैसे संस्थानों और कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए), ग्रामीण युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण (एसटीआरवाई), कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन (एसएमएएम), और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) जैसी योजनाओं ने मजबूत प्रशिक्षण मंच तैयार किए हैं, जबकि बागवानी, पशुधन, मृदा प्रबंधन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्र-विशिष्ट हस्तक्षेप ढाँचों में कौशल को एकीकृत कर रहे हैं। कुल मिलाकर, ये प्रयास स्पष्ट दृष्टिकोण को रेखांकित करते हैं: उत्पादकता बढ़ाने, आय बढ़ाने और लचीले कृषि क्षेत्र के निर्माण के लिए कौशल संवर्धन के माध्यम से किसानों को सशक्त बनाना अत्यंत आवश्यक है।
कौशल संवर्धन को सीधे किसानों तक पहुँचाने के लिए मज़बूत संस्थागत ढाँचा बनाया गया है, जिसमें कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा स्थापित, केवीके जिलों में अग्रणी विस्तार केंद्रों के रूप में कार्य करते हैं। ये स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक प्रशिक्षण, प्रदर्शनों और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के माध्यम से अनुसंधान और अभ्यास के बीच की खाई को पाटते हैं। 2021 और 2024 के बीच, केवीके ने 58.02 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया, और हर साल उनकी पहुँच लगातार बढ़ रही है—2021-22 में 16.91 लाख किसान, 2022-23 में 19.53 लाख और 2023-24 में 21.56 लाख किसान। अकेले 2024-25 में, फरवरी 2025 तक, 18.56 लाख अतिरिक्त किसानों को भी प्रशिक्षित किया गया। ये आँकड़े फसल प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य, पशुपालन और संबद्ध गतिविधियों में व्यावहारिक कौशल के साथ किसानों को सशक्त बनाने में केवीके नेटवर्क की निरंतरता और व्यापकता को दर्शाते हैं। स्थानीय वास्तविकताओं पर आधारित प्रशिक्षण और वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर, केवीके किसानों की क्षमता बढ़ाने के लिए सबसे प्रभावी मंचों में से एक बन गए हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि वैज्ञानिक ज्ञान क्षेत्र-स्तरीय सुधारों और दीर्घकालिक लचीलेपन में परिवर्तित हो।
इसके पूरक के रूप में, कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (आत्मा) ने राज्यों को विस्तार प्रणालियों को पुनर्जीवित करने में सहायता की है। कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (आत्मा) के रूप में लोकप्रिय ‘विस्तार सुधारों के लिए राज्य विस्तार कार्यक्रमों को समर्थन’ पर यह केंद्र प्रायोजित योजना पीएमकेवीवाई कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय पूरे देश में कार्यान्वित कर रहा है। कृषि विस्तार पर उप-मिशन (एसएम एई) के घटक के तहत यह योजना देश में विकेन्द्रीकृत किसान-अनुकूल विस्तार प्रणाली को बढ़ावा देती है। इसका उद्देश्य विस्तार प्रणाली को पुनर्जीवित करने के लिए राज्य सरकार के प्रयासों का समर्थन करना और किसानों, कृषि महिलाओं और युवाओं को कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के विभिन्न विषयगत क्षेत्रों में नवीनतम कृषि तकनीकों और अच्छी कृषि पद्धतियों को किसान प्रशिक्षण, प्रदर्शन, प्रदर्शन यात्राओं, किसान मेलों आदि जैसे विभिन्न हस्तक्षेपों के माध्यम से उपलब्ध कराना है।
लगभग 32.38 लाख किसानों को 2021-22 में एटीएमए के तहत प्रशिक्षित किया गया। यह संख्या 2022-23 में बढ़कर 40.11 लाख और 2023-24 में 36.60 लाख हो गई। 2024-25 के आँकड़े अभी संकलित किए जा रहे हैं, लेकिन 30 जनवरी 2025 तक लगभग 18.30 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया जा चुका था। कुल मिलाकर, 2021 से 2025 तक लगभग 1.27 करोड़ किसान इस योजना से लाभ उठा चुके हैं।
कृषि में उभरते अवसरों के लिए युवा पीढ़ी के किसानों को तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया गया है। ग्रामीण युवाओं के कौशल प्रशिक्षण (एसटीआरवाई) कार्यक्रम को ग्रामीण युवाओं और किसानों को कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में लगभग सात दिनों का अल्पकालिक, कौशल-आधारित प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसका उद्देश्य उनके ज्ञान को उन्नत करना, वेतन और स्व-रोज़गार को बढ़ावा देना और गाँवों में कुशल जनशक्ति का समूह तैयार करना है। हाल ही में, इस कार्यक्रम को आत्मा कैफेटेरिया के अंतर्गत शामिल कर लिया गया है, जिससे राज्य-आधारित विस्तार प्रयासों के साथ घनिष्ठ एकीकरण सुनिश्चित होता है।
एसटीआरवाई बागवानी, डेयरी, मत्स्य पालन और पशुपालन जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करता है। यह महिला किसानों सहित 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के ग्रामीण युवाओं पर लक्षित है। पिछले चार वर्ष में, इस योजना ने लगातार अपनी पहुँच का विस्तार किया है। 2021-22 में, 10,456 ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित किया गया, जो 2022-23 में बढ़कर 11,634 और 2023-24 में 20,940 हो गए। इससे 2021 और 2024 के बीच प्रशिक्षित युवाओं की संचयी संख्या 43,000 से अधिक हो गई। चालू वर्ष में भी यह गति जारी रही है, 31 दिसंबर 2024 तक 8,761 अतिरिक्त युवाओं को प्रशिक्षित किया गया है। प्रतिभागियों को व्यावहारिक कौशल से लैस करके और उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करके, यह कार्यक्रम कुशल और आत्मनिर्भर किसानों की नई पीढ़ी का निर्माण कर रहा है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत कर सकते हैं।
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के घटक के रूप में कार्यान्वित किए जा रहे कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन (एसएमएएम) का उद्देश्य छोटे और सीमांत किसानों तथा कम कृषि बिजली उपलब्धता वाले क्षेत्रों में कृषि यंत्रीकरण की पहुँच का विस्तार करना है। इसके उद्देश्यों में छोटी जोत और उच्च स्वामित्व लागत की चुनौतियों का समाधान करने के लिए कस्टम हायरिंग सेवाओं को बढ़ावा देना, प्रदर्शनों, क्षमता निर्माण और आईईसी गतिविधियों के माध्यम से जागरूकता पैदा करना, और देश भर में निर्दिष्ट केंद्रों पर प्रदर्शन परीक्षण और प्रमाणन के माध्यम से गुणवत्ता आश्वासन सुनिश्चित करना शामिल है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कृषि मशीनीकरण उप-मिशन (एसएमएएम) ने 2021 से 2025 तक चार साल की अवधि के दौरान कुल 57,139 किसानों को प्रशिक्षित किया है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना ने फसल नियोजन और उर्वरक प्रयोग के बारे में सूचित निर्णय लेने के लिए किसानों की सहायता करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 24 जुलाई 2025 तक, देश भर में 25.17 करोड़ से अधिक मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किए जा चुके हैं, साथ ही 93,000 से अधिक किसान प्रशिक्षण, 6.8 लाख प्रदर्शन और हजारों जागरूकता अभियान चलाए गए हैं। इन प्रयासों ने किसानों के बीच संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को बढ़ावा दिया है। इससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार हुआ है और कृषि उत्पादकता में स्थायी वृद्धि हुई है।
किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के गठन और संवर्धन ने सामूहिक स्तर पर किसानों की क्षमता निर्माण के लिए नए मंच तैयार किए हैं। 10,000 पंजीकृत एफपीओ के साथ, किसानों को कृषि-व्यवसाय प्रबंधन, बाज़ार संपर्क और ई-नाम व जीईएम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग पर डिजिटल मॉड्यूल और वेबिनार के माध्यम से नियमित प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
सरकार ने कौशल विकास को प्रमुख राष्ट्रीय योजनाओं में भी शामिल किया है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई 4.0) (2022-26) में कृषि को प्राथमिकता क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया है। यह कृषि और संबद्ध क्षेत्रों को भारत के प्रमुख कौशल ढाँचे में एकीकृत करती है।
मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण केंद्रों, कौशल हब और पीएम कौशल केंद्रों के माध्यम से किसानों और ग्रामीण युवाओं को अल्पकालिक पाठ्यक्रमों (300-600 घंटे), पूर्व शिक्षा की मान्यता और विशेष परियोजनाओं में प्रशिक्षित किया जाता है।
पीएमकेवीवाई योजना के अंतर्गत, 2015 में शुरुआत से लेकर 30 जून, 2025 तक 1.64 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया गया है और 1.29 करोड़ से अधिक लोगों को प्रमाणित किया गया है।
पीएमकेवीवाई की तरह, एकीकृत बागवानी विकास मिशन (एमआईडीएच), राष्ट्रीय गोकुल मिशन (आरजीएम) और प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (पीएमकेएसवाई) जैसे क्षेत्र-विशिष्ट हस्तक्षेपों में क्रमशः बागवानी, पशुधन और खाद्य प्रसंस्करण में क्षमता निर्माण के लिए समर्पित घटक हैं।
एकीकृत बागवानी विकास मिशन (एमआईडीएच) केन्द्र प्रायोजित योजना है। इसका उद्देश्य बागवानी क्षेत्र के समग्र विकास पर केंद्रित है, जिसमें फल, सब्जियां, जड़ और कंद फसलें, मशरूम, मसाले, फूल, सुगंधित पौधे, नारियल, काजू, कोको और बांस शामिल हैं।
मानव संसाधन विकास (एचआरडी) कार्यक्रम के अंतर्गत 2014-15 से 2023-24 तक विभिन्न बागवानी गतिविधियों के तहत 9.73 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया गया है।
देशी गोजातीय नस्लों के विकास और संरक्षण के लिए दिसंबर 2014 से राष्ट्रीय गोकुल मिशन (आरजीएम) कार्यान्वित किया जा रहा है। इसे 2400 करोड़ रुपये के बजट परिव्यय के साथ 2021-26 की अवधि के लिए राष्ट्रीय पशुधन विकास योजना के अंतर्गत जारी रखा जा रहा है।
आरजीएम के अंतर्गत, ग्रामीण भारत में बहुउद्देशीय कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियनों (मैत्री) को किसानों के घर पर गुणवत्तापूर्ण कृत्रिम गर्भाधान सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित और सुसज्जित किया जाता है और अब तक देश में 38,736 मैत्री प्रशिक्षित और सुसज्जित हैं।
प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना व्यापक योजना है। इसका उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए आधुनिक बुनियादी ढांचे का विकास करना और खेत से लेकर खुदरा दुकानों तक निर्बाध आपूर्ति श्रृंखला बनाना है।
प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के सात प्रमुख घटकों में से एक “मानव संसाधन एवं संस्थान” है। यह अनुसंधान एवं विकास, प्रचार गतिविधियों, कौशल विकास और संस्थानों के सुदृढ़ीकरण पर केंद्रित है। इस घटक के अंतर्गत कौशल विकास का उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए क्षेत्र-विशिष्ट कुशल कार्यबल तैयार करना है, जिसमें निम्न-स्तरीय कर्मचारी, संचालक, पैकेजिंग और असेंबली लाइन कर्मचारी से लेकर गुणवत्ता नियंत्रण पर्यवेक्षक तक शामिल हैं। इस प्रकार, इस क्षेत्र की विविध मानव संसाधन आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकेगा और इसके सतत विकास को बढ़ावा मिलेगा।
पीएम-किसान संपदा योजना की विभिन्न घटक योजनाओं के अंतर्गत 30 जून, 2025 तक 1601 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनमें से 1133 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। इससे देश के 34 लाख से अधिक किसान लाभान्वित हुए हैं।
कौशल विकास अब भारत के कृषि परिदृश्य में गहराई से समाया हुआ है। कृषि विज्ञान केंद्रों और एटीएमए के राज्य-आधारित कार्यक्रमों में व्यावहारिक प्रशिक्षण से लेकर पीएमकेवीवाई, एसएमएएम, आरजीएम और पीएमकेएसवाई के अंतर्गत क्षेत्र-विशिष्ट कौशल विकास तक, ये पहल किसानों और ग्रामीण युवाओं को ज्ञान, आत्मविश्वास और व्यावहारिक क्षमताओं से लैस कर रही हैं।
क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करके, सरकार न केवल किसानों को बेहतर तरीके अपनाने में सक्षम बना रही है, बल्कि उन्हें उद्यमी, कृषि-व्यवसाय में अग्रणी और ग्रामीण विकास के प्रमुख वाहक बनने के लिए सशक्त भी बना रही है। ये सभी प्रयास मिलकर विकसित भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप कुशल, आत्मनिर्भर और लचीले कृषक समुदाय की नींव रख रहे हैं।
 

धान की फसल में ड्रोन तकनीक का सफल प्रयोग, किसानों ने दिखाया उत्साह

30-Sep-2025
रायपुर ( शोर संदेश )  आधुनिक तकनीक से खेती को सरल, सुरक्षित और लाभकारी बनाने की दिशा में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र महासमुंद द्वारा ग्राम धनसुली में निकरा परियोजना अंतर्गत धान की फसल में कृषि ड्रोन तकनीक का सफल प्रदर्शन किया गया।
कार्यक्रम के दौरान किसानों को ड्रोन द्वारा कीटनाशक छिड़काव की प्रक्रिया का प्रत्यक्ष प्रदर्शन कराया गया तथा इसके संचालन से संबंधित तकनीकी पहलुओं की विस्तृत जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि ड्रोन तकनीक से कम समय, कम लागत और कम श्रम में अधिक क्षेत्र में छिड़काव संभव है। इससे किसानों को न केवल समय की बचत होगी, बल्कि उत्पादन क्षमता भी बढ़ेगी।
प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख तथा निकरा परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. आर.एल. शर्मा ने कृषि में ड्रोन तकनीक के उपयोग और भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. रवीश केशरी ने तकनीकी दृष्टि से ड्रोन के उपयोग के लाभ गिनाए। वहीं कृषि विभाग की ग्रामीण कृषि विकास विस्तार अधिकारी कल्पना साहू तथा निकरा परियोजना के वरिष्ठ अनुसंधान अध्येता तरुण प्रधान ने किसानों को प्रशिक्षण के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया।
ग्राम धनसुली के किसानों ने इस नवाचारपूर्ण तकनीक में विशेष रुचि दिखाई और सक्रिय रूप से प्रशिक्षण में भाग लिया। किसानों ने कहा कि ड्रोन तकनीक से खेती के कार्य अधिक आसान और समयबद्ध होंगे। ड्रोन तकनीक के इस सफल प्रदर्शन ने साबित किया है कि कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक नवाचारों का समावेश किसानों की आय वृद्धि और कृषि के आधुनिकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।


 

 


दानवती आर्माे बनीं लखपति दीदी

29-Sep-2025
रायपुर । ( शोर संदेश )  गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले के देवरीखुर्द गांव की दानवती आर्माे ने अपने कठिन परिश्रम और नवाचार से एक ऐसी मिसाल कायम की है, जो पूरे जिले की महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। कभी महज़ 90 डिसमिल भूमि पर सब्ज़ी की खेती से शुरुआत करने वाली दानवती आज 7 एकड़ भूमि में आधुनिक पद्धति से खेती कर रही हैं। तुलसी महिला स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष के रूप में वे न केवल स्वयं आर्थिक रूप से सक्षम बनीं, बल्कि अनेक ग्रामीण महिलाओं को भी स्वरोजगार उपलब्ध कराकर आत्मनिर्भर बना रही हैं।
दानवती आर्माे ने खेती को पारंपरिक पद्धति से आगे बढ़ाते हुए ड्रीप सिंचाई प्रणाली और मल्चिंग तकनीक को अपनाया। इससे जल संरक्षण के साथ उत्पादन क्षमता भी बढ़ी। लौकी और तोरई जैसी सब्जियों की उन्नत खेती के अलावा उन्होंने बकरी पालन और मछली पालन जैसे आय के वैकल्पिक स्रोत विकसित किए, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और मजबूत हुई।
बिहान योजना से जुड़ने के बाद दानवती को तकनीकी जानकारी, विपणन कौशल और बैंक से ऋण सुविधा प्राप्त हुई। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और वे योजनाबद्ध तरीके से कृषि और आजीविका के अन्य कार्यों को आगे बढ़ाने लगीं। दानवती के साथ काम करने वाली महिलाएं बताती हैं कि दानवती दीदी से जुड़कर हमने न केवल खेती और उद्यमिता सीखी, बल्कि आत्मनिर्भर जीवन जीने का नजरिया भी पाया। महतारी वंदन योजना और बिहान जैसी योजनाओं ने इन महिलाओं को आर्थिक मजबूती दी है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में महिलाओं को सशक्त बनाने का जो अभियान चल रहा है, वह ग्रामीण जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला रहा है। अब गांव की साधारण महिलाएं भी लखपति दीदी बनकर आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ रही हैं। 











 

मंगली दीदी बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल, टमाटर की खेती से बदली जिंदगी

26-Sep-2025
रायपुर,शोर संदेश ) आदि कर्मयोगी अभियान और छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में नई ऊर्जा भरी है। कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड के छोटे से गाँव अंगवाही की मंगली दीदी ने इसी योजना का लाभ उठाकर टमाटर उत्पादन के जरिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी है। महज 50 हजार के ऋण से शुरू हुआ उनके स्वरोगार के सफर ने मंगली दीदी को महिलाओं की प्रेरणास्रसेत बना दिया है।
छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन का लक्ष्य स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उनकी आजीविका को स्थायी रूप से बेहतर बनाना और गरीबी को कम करना है। यह मिशन ग्रामीण गरीब परिवारों को वित्तीय सेवाओं, कौशल विकास और स्वरोजगार के अवसरों उपलब्ध  कराता है, ताकि वे स्वावलंबी बन सकें। बिहान से जुड़ने के बाद मंगली दीदी ने स्व-सहायता समूह के माध्यम से 50 हजार रुपए का ऋण लेकर टमाटर की खेती शुरू की। जैविक खाद और आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर उन्होंने अब तक 200 कैरेट टमाटर का उत्पादन किया और लगभग 80 हजार रुपए की आमदनी अर्जित की है। उन्होंने बताया कि आने वाले दिनों में उत्पादन दोगुना होने की उम्मीद है, जिससे आमदनी 1.80 लाख रुपए से अधिक पहुँच सकती है। इस तरह मंगली दीदी कि किस्मत टमाटर की लालिमा से बदलने लगी है।
मंगली दीदी ने बताया कि ग्राफ्टेड पौधों और जैविक खाद की बदौलत उनके टमाटर की बेहतर गुणवत्ता के कारण स्थानीय बाजार में अच्छी कीमत मिल पा रही हैं। यही वजह है कि आज मंगली दीदी गाँव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं और “लखपति दीदी” अभियान की सशक्त मिसाल भी है। उनका अगला लक्ष्य अन्य सब्ज़ियों की खेती करना और अधिक से अधिक महिलाओं को इस कार्य से जोड़ना है ताकि गाँव की सभी महिलाएं आत्मनिर्भर बन सके।










 

किसानों को उन्नत व किफायती उर्वरक तकनीकों से जोड़ने अभियान तेज

21-Sep-2025
रायपुर,।  ( शोर संदेश ) नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे नैनो उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। किसानों के बीच इनके इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए जागरूकता शिविर, वेबिनार, क्षेत्रीय प्रदर्शन, किसान सम्मेलन और क्षेत्रीय भाषाओं में फिल्में बनाई जा रही हैं ।  नैनो यूरिया के पत्तियों पर छिड़काव को आसान बनाने के लिए किसान ड्रोन, बैटरी चालित स्प्रेयर जैसे नए उपकरण भी किसानों तक पहुंचाए जा रहे हैं। ग्राम स्तर के उद्यमियों को प्रशिक्षण देकर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कस्टम हायरिंग छिड़काव सेवाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है।
किसानों को उन्नत और किफायती उर्वरक तकनीक से जोड़ने के लिए जिले में नैनो यूरिया छिड़काव का प्रदर्शन कृषि विभाग के अधिकारियों और विशेषज्ञों द्वारा किसानों के खेत में पहुंचकर किया जा रहा है। कलेक्टर और कृषि विभाग रायगढ़ के मार्गदर्शन में किसानों के लिए यह जागरूकता कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके तहत विकासखंड रायगढ़ में किसानों के खेतों में ट्रायल के रूप में नैनो यूरिया का प्रदर्शन किया गया। 
ग्राम कोड़तराई में कृषक परमेश्वर पटेल, झारगुड़ा में कृषक हरकेश्वर पटेल तथा पंझर में कृषक नरेन्द्र पटेल के धान की फसल पर एक-एक एकड़ भूमि में नैनो यूरिया छिड़काव का प्रदर्शन किया गया। आने वाले दिनों अन्य किसानों के खेतों में भी यह प्रदर्शन किया जाएगा। इस दौरान हितग्राही किसान के साथ गांव के अन्य किसानों को भी इस प्रदर्शन के अवलोकन में शामिल किया जाता है। 
उप संचालक कृषि ने बताया कि यह पहल न सिर्फ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को कम करेगी, बल्कि किसानों की उत्पादन लागत घटाकर अधिक लाभ दिलाने में भी सहायक सिद्ध होगी। इस दौरान किसानों को नैनो यूरिया के प्रयोग की विधियों एवं लाभों की विस्तृत जानकारी दी गई। किसान ड्रोन, मोटर, बैटरी, नेपसेक स्प्रेयर के माध्यम से नैनो यूरिया का छिड़काव कर सकते हैं। कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी, क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, इफको के प्रतिनिधि और स्थानीय कृषकगण उपस्थित रहे। 
किसानों ने समझा नैनो यूरिया छिड़काव का तरीका कहा -यह किफायती और सुविधाजनक 
प्रदर्शन के दौरान उपस्थित किसानों ने नैनो यूरिया के छिड़काव का तरीका समझा। बेसल डोज के बाद फर्स्ट और सेकंड स्प्रे के लिए नैनो यूरिया के उपयोग के संबंध में श्री परमेश्वर पटेल ने कहा कि यह पारंपरिक यूरिया की तुलना में काफी सस्ता है। यह कम मात्रा में भी बेहतर परिणाम देता है। बॉटल में पैकेजिंग होने के कारण खेतों तक लाने ले जाने ले जाने व छिड़काव में सुविधाजनक है। इसके छिड़काव से पौधों पर असर जल्दी और एक समान दिखता है। पौधों की बढ़वार भी संतुलित होती है।
उप संचालक कृषि रायगढ ने बताया कि अभी चिन्हांकित स्थानों में नैनो यूरिया के छिड़काव का प्रदर्शन चल रहा है। आगामी नवंबर और दिसंबर में यह प्रदर्शन अभियान पूरे जिले में व्यापक स्तर पर चलाया जाएगा। इसके लिए सभी आरएईओ अपने प्रभार क्षेत्र के गांवों में किसानों को नैनो यूरिया छिड़काव का प्रदर्शन कर उपयोग की विधि और फसल को होने वाले लाभ से अवगत कराएंगे। इसके साथ ही आगामी विकसित कृषि संकल्प यात्रा के अंतर्गत इसकी जानकारी किसानों को दी जाएगी।






 



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