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धान खरीदी में अब होगी पूरी पारदर्शिता: ‘तुहर टोकन मोबाइल एप’ से घर बैठे मिलेगी टोकन सुविधा

13-Nov-2025
रायपुर( शोर संदेश )। किसानों को धान विक्रय हेतु सुगम एवं बेहतर व्यवस्था प्रदाय किये जाने हेतु खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग द्वारा खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में ‘तुहर टोकन मोबाइल एप’ प्रारंभ किया गया है। इस एप के माध्यम से किसानों को घर बैठे धान विक्रय हेतु टोकन की व्यवस्था उपलब्ध होगी, जिससे समितियों में लंबी कतारों से मुक्ति मिलेगी।
यह मोबाइल ऐप गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है। इस ऐप में किसानों को सर्वप्रथम आधार आधारित ओटीपी के माध्यम से पंजीयन करना होगा। किसान प्रतिदिन सुबह 8.00 बजे से इस ऐप के माध्यम से टोकन हेतु आवेदन कर सकेंगे।
खाद्य सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले ने जानकारी दी कि धान खरीदी प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुविधा को ध्यान में रखते हुए, सीमांत कृषक (2 एकड़ या 2 एकड़ से कम भूमि) को अधिकतम 1 टोकन, लघु कृषक ( 2 से 10 एकड़ तक) को अधिकतम 2 टोकन तथा दीर्घ कृषक (10 एकड़ से अधिक) को अधिकतम 3 टोकन प्रदान किये जायेंगे।
नया टोकन बनाने हेतु समय-सीमा रविवार से शुक्रवार तक (प्रातः 8.00 बजे से सायं 5.00 बजे तक) निर्धारित की गई है। जारी टोकन आगामी 07 खरीदी दिवसों के लिए मान्य रहेंगे।
धान खरीदी केन्द्र की प्रतिदिन की खरीदी सीमा का 70 प्रतिशत हिस्सा मोबाइल एप के माध्यम से टोकन हेतु आरक्षित रहेगा। इस 70 प्रतिशत में से लघु एवं सीमांत कृषक हेतु 80 प्रतिशत तथा दीर्घ कृषक हेतु 20 प्रतिशत का आरक्षण किया गया है।
उदाहरण स्वरूप यदि किसी उपार्जन केन्द्र की प्रतिदिन की खरीदी सीमा 1000 क्विंटल है, तो मोबाइल ऐप हेतु आरक्षित 700 क्विंटल में से 560 क्विंटल लघु एवं सीमांत कृषकों हेतु तथा 140 क्विंटल दीर्घ कृषकों हेतु आरक्षित रहेगा।
शेष 30 प्रतिशत टोकन सोसाइटी स्तर पर भी किसानों हेतु उपलब्ध रहेंगे, जिससे सभी वर्ग के किसानों को धान विक्रय हेतु सहज और सुगम व्यवस्था प्राप्त हो सके।
खाद्य विभाग द्वारा विकसित ‘तुहर टोकन मोबाइल एप’ राज्य के किसानों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से सशक्त बनाते हुए खरीदी व्यवस्था में पारदर्शिता, समान अवसर और समय की बचत सुनिश्चित करेगा।

 

बिहान योजना से आत्मनिर्भरता की मिसाल: शकुन्तला शार्दुल ने सब्जी खेती से बदली जिंदगी

12-Nov-2025
रायपुर,  ( शोर संदेश )।  कभी दूसरों की खेतों में मजदूरी कर अपने परिवार का गुजारा करने वाली शकुन्तला शार्दुल आज अपने ही खेतों में मेहनत के बल पर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। उनकी यह कहानी इस बात की मिसाल है कि अगर अवसर और मार्गदर्शन मिले तो महिलाएँ अपने जीवन की दिशा बदल सकती हैं।
शकुन्तला वर्ष 2015 में अपने जिला कोण्डागांव के सिलेंदरी स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। समूह के माध्यम से उन्होंने पहली बार लोन लेकर सेंटरिंग प्लेट का व्यवसाय शुरू किया, लेकिन अपेक्षित लाभ न मिलने पर उन्होंने दिशा बदली। असफलता से निराश होने के बजाय शकुन्तला ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर सब्जी की खेती शुरू करने का निर्णय लिया। समूह से मिले ऋण की मदद से उन्होंने खेत में बोरवेल करवाया, जिससे सिंचाई की सुविधा प्राप्त हुई। शुरुआत में उन्होंने मटर, बरबटी और भिंडी की खेती की, जो काफी सफल रही और अच्छा मुनाफा मिला। इस सफलता से उत्साहित होकर शकुन्तला ने पुनः बिहान योजना से लोन लेकर ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगवाई। अब उन्होंने खेती को बड़े पैमाने पर विस्तार देते हुए बैंगन, टमाटर, भिंडी और मटर जैसी फसलों की बुआई शुरू की।
आज शकुन्तला की मेहनत का फल यह है कि उनकी खेती से प्रत्येक सीजन में अच्छा मुनाफा हो रहा है। पहले जहाँ परिवार को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ता था, वहीं अब वही परिवार आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बन चुका है। शकुन्तला के पति खेती में उनका पूरा सहयोग करते हैं और उनका बेटा पढ़ाई कर रहा है। उन्होंने बताया कि सब्जियों की खेती से उन्हें अब लगभग 15 हजार रुपए मासिक आय प्राप्त हो रही है।
बिहान योजना ने शकुन्तला शार्दुल जैसी हजारों ग्रामीण महिलाओं के जीवन में परिवर्तन की नई रोशनी जगाई है। इस योजना के माध्यम से महिलाएँ स्व-सहायता समूहों से जुड़कर छोटे-छोटे व्यवसाय, खेती, पशुपालन और हस्तशिल्प जैसे कार्यों के जरिए आर्थिक स्वावलंबन की ओर अग्रसर हो रही हैं। इससे न केवल उनकी आय बढ़ी है, बल्कि आत्मविश्वास और सामाजिक सम्मान भी हासिल हुआ है। शकुन्तला मुस्कुराते हुए कहती हैं कि “बिहान योजना ने हमें खुद पर विश्वास करना सिखाया है। अब हम न सिर्फ अपने घर की जिम्मेदारी निभा रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन गई हैं।”
 

धान की बालियों में लगी बीमारी, किसान चिंतित

10-Nov-2025
धमतरी। ( शोर संदेश )। अंचल में तैयार खरीफ धान फसल की कटाई-मिंजाई द्रुत गति से जारी है। कई किसानों की फसल अभी कटाई के लिए तैयार हो रही है। धान कटाई के समय फसल में लगी बीमारी से कई किसान चिंतित हैं। धान फसल में पेनिकल माईट फफूंदी बीमारी लग गई है। इससे फसल उत्पादन में नुकसान की आशंका किसान जता रहे हैं।
जिले में धान की फसल तेजी के साथ तैयार हो रही फसल में कीट व्याधियां होने से किसान परेशान हैं। कई जगह कीटनाशकों का भी असर नहीं हो रहा। धमतरी ब्लाक, कुरुद ब्लाक व मगरलोड ब्लाक में धान का उत्पादन आशा के अनुरूप दिखाई दे तो दे रहा है, लेकिन हाल के दौरान में कीट प्रकोप से उत्पादन घटने की आशंका है। अंचल में ज्यादातर किसानों ने धान की तेजी से बढ़ने वाली प्रजाति आई आर 64, 1001 , सांभा की बुआई की है। अधिकांश खेतों में इन्हीं किस्म के धान की रोपाई की हुई है। सैकड़ों खेतों में धान के पौधे लहलहा रहे हैं। गबोद अवस्था में मकड़ी फसल को अंदर से डंक मारकर बदरा कर दिया, इसका सीधा असर धान के उत्पादन पर पड़ेगा। किसानों का कहना है कि उनके धान फसल पर इस साल लाल मकड़ी ने हमला कर कई धान के पौधों को बदरा कर दिया है, इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा। कई प्रकार के कीटनाशक छिड़काव के बाद भी राहत नहीं मिली और धान बदरा हो गया। बीमारी कब हुआ और कहां से आया, यह पता नहीं चल पाया। धमतरी शहर से लगे हुए ग्राम भटगांव के कई खेत में यह बीमारी है। इससे चिंतित किसान संभावित नुकसान का आंकलन कर रहे हैं।
देमार डाही, छाती, सेमरा , सेनचुवा, बिजनापुरी , बोड़रा, कसही, हंकारा , अंगारा , खम्हरिया, जुनवानी, डोमा, गुजरा ,बिरेतरा , धौराभाठा , रावनगुडा , लिमतरा , पुरी , गोपालपुरी, काशिपुरी, सरसोंपुरी , बगदेही, भेंडरवानी , देवरी, सिहाद, चोरभटठी, भुसरेंगा , कन्हारपुरी , बगौद, कुर्रा , कोसमर्रा, भखारा सहित कई गांव के खेत में यह बीमारी दिखाई दे रही है। जिला प्रशासन ने अनावश्यक दवा छिड़काव न करने के साथ ही साथ कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेने कहा है। जानकारी के अनुसार बीजोत्पाद वाले रिसर्च हाईबि्रड किस्म के धान में यह बीमारी सबसे अधिक है, जैसे स्वर्णा, महामाया, शांभा, एमटीयू, 1001 जैसे अनेक धान के किस्म में देखा जा रहा है। आईआर-64 में यह कम होता है। इस बीमारी से बचने के लिए गबोद अवस्था शुरू होने से पहले खेतों में बीमारी के बिना लक्षण दिखे ही मकड़ीनाशक का छिड़काव करना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार आमतौर पर यह बीमारी सामान्य आंखों से दिखाई नहीं देता। सूक्ष्मदर्शी या मैग्नीफाई ग्लास से देखा जा सकता है। पौधों में दो प्रकार के मकड़ी पाया जाता है, एक मकड़ी लाभदायक है और लाल मकड़ी नुकसानदायक है। इस बीमारी के होने पर प्रति एकड़ आठ से 10 क्विंटल धान का उत्पादन कम हो सकता है।
कृषि विज्ञान केंद्र सांकरा-धमतरी के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डाॅ शक्ति वर्मा ने बताया कि प्रदेश के धमतरी, जांजगीर व कवर्धा क्षेत्र में यह बीमारी पिछले छह सालों से है, लेकिन कम था। अब बीमारी बढ़ने लगा है। लाल मकड़ी को केमिकल माइट कहते हैं। जब धान के पौधा गबोद अवस्था में होता है, तो मकड़ी पौधों में डंक मारकर पौधों के विकसित हो रहे दानों और बालियों का रस चूसकर बदरा कर देता है। ऐसे में पौधों से बदरंग बदरा धान की बालियां निकलती है, जो खराब रहता है। बीमारी होने पर कोई भी कीटनाशक व दवाईयां काम नहीं करते, ऐसे में कोई उपचार नहीं बचता।







 

बस्तर में कृषि क्रांति: 25 साल में फसल क्षेत्र 26% बढ़ा, बीज वितरण 10 गुना तक पहुँचा

08-Nov-2025
रायपुर, ( शोर संदेश )। वनों और पहाड़ियों की गोद में बसे बस्तर ने पिछले 25 वर्षों में एक ऐसी कृषि क्रांति देखी है, जिसने जिले की आर्थिक और सामाजिक तस्वीर ही बदल दी है। कभी जहां खेती-किसानी कठिनाईयों से घिरी थी, वहीं आज खेत लहलहा रहे हैं और किसानों के चेहरों पर खुशहाली की चमक दिखाई दे रही है। यह परिवर्तन बस्तर के मेहनतकश अन्नदाताओं की अथक मेहनत, राज्य सरकार की किसानोन्मुख नीतियों और कृषि विभाग के निरंतर प्रयासों का परिणाम है।
वर्ष 2000 में जिले का कुल फसल उत्पादन क्षेत्र 1.58 लाख हेक्टेयर था, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 2 लाख हेक्टेयर से अधिक हो गया है। यानी करीब 26 प्रतिशत की ऐतिहासिक वृद्धि। यह विस्तार बस्तर के उन दुर्गम इलाकों तक पहुँचा है, जहाँ कभी असमतल भूमि और पहाड़ी ढलानों पर खेती करना चुनौतीपूर्ण था। इस बदलाव के पीछे विभाग की योजनाओं, जल संरक्षण कार्यों और किसानों को समय पर तकनीकी सहायता का बड़ा योगदान रहा है।
वर्ष 2000 में जिले में 3,109 क्विंटल बीज किसानों को उपलब्ध कराए गए थे, जो अब बढ़कर 32 हजार 253 क्विंटल तक पहुँच चुके हैं। कृषि कार्यों में 10 गुना की अद्भुत वृद्धि को दर्शाता है। उच्च गुणवत्ता वाले, रोग-प्रतिरोधी बीजों की उपलब्धता ने किसानों की उत्पादकता को नई ऊँचाई दी है।          लोहंडीगुड़ा विकासखंड के ग्राम गुनपुर के किसान नकुल भारती ने बताया कि पहले अच्छे बीज के लिए शहर जाना पड़ता था, अब गाँव में ही आसानी से मिल जाता है। नई तकनीक और बीजों ने हमारी खेती का रूप ही बदल दिया है।
जहाँ वर्ष 2000 में सिंचाई की सुविधा केवल 3 हजार 669 हेक्टेयर भूमि तक सीमित थी, वहीं आज यह बढ़कर 24 हजार 280 हेक्टेयर तक पहुँच चुकी है। तालाबों के जीर्णाेद्धार, नहरों के विस्तार और ड्रिप एवं स्प्रिंकलर इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों ने सूखे इलाकों को भी हरा-भरा बना दिया है। इन प्रयासों से फसल चक्र मजबूत हुआ है और किसानों की जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता भी बढ़ी है। उप संचालक कृषि राजीव श्रीवास्तव ने बताया कि विभाग किसानों को प्रशिक्षण देकर उन्नत तकनीक अपनाने के लिए निरंतर प्रोत्साहित कर रहा है।
राज्य सरकार द्वारा किसानों को धान का वाजिब दाम दिलाने के लिए की गई नीति सुधारों से बस्तर के किसानों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन आया है। वर्ष 2000 में जहां धान का समर्थन मूल्य मात्र 510 रुपये प्रति क्विंटल था, जो अब बढ़कर 3,100 रुपये तक पहुँच चुका है। इसी प्रकार, ग्रेड-ए धान का मूल्य 540 रुपये से बढ़कर 3,100 रुपये हो गया है। यह छह गुना से अधिक की वृद्धि किसानों के जीवन में आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक बन चुकी है। ग्राम कलचा की महिला किसान जयंती बघेल ने मुस्कुराते हुए कहा कि पहले खेती से बस गुजारा चलता था, अब बच्चों की पढ़ाई और घर की जरूरतें पूरी हो रही हैं।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना जैसी योजनाओं ने बस्तर के किसानों को नई दिशा दी है। कृषि विभाग अब मिलेट्स, दलहन और तिलहन फसलों को बढ़ावा देने के साथ-साथ जैविक खेती पर भी जोर दे रहा है। पिछले 25 वर्षों में बस्तर का यह परिवर्तन केवल कृषि का विकास नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनर्जागरण की कहानी है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने किसानों के कल्याण को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी है। कृषि, जल संसाधन और सहकारिता विभागों के समन्वित प्रयासों से आज बस्तर आत्मनिर्भर, समृद्ध और हरित हो रहा है।
 

लखपति दीदी योजना से बस्तर की महिलाएँ बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

07-Nov-2025
रायपुर( शोर संदेश )  । बस्तर जिले की महिलाएँ आज लखपति दीदी योजना से स्वरोजगार से आत्मनिर्भरता की नई मिसाल गढ़ रही हैं। स्व सहायता समूह की सदस्य कलाबत्ती पोयाम, मंगतीन, कमली कश्यप, प्रमिला ठाकुर और शोभा बघेल ने अपने परिश्रम और संकल्प के बल पर “लखपति दीदी योजना” के अंतर्गत सफलता की नई ऊँचाइयाँ हासिल की हैं।
तोकापाल विकासखंड के ग्राम पंचायत भडिसगाँव की उजाला स्व सहायता समूह की सदस्य कलाबत्ती पोयाम और मंगतीन, जो पहले सीमित आय से परिवार का भरण - पोषण करती थीं, आज कृषि कार्य और पशुपालन से सालाना लाखों की आमदनी अर्जित कर रही हैं। समूह से जुड़कर बिहान योजना से जुड़ने के एक पश्चात सामुदायिक निवेश कोष और बैंक लिंकेज की राशि से कलाबत्ती पोयाम ने बतख पालन का और मंगतीन ने बकरी पालन पशुपालन को अतिरिक्त आय के साधन के रूप में विकसित किया। साथ ही आधुनिक खेती के तौर-तरीके अपनाए है अब उनकी मेहनत का परिणाम यह है कि उनके घर में आर्थिक समृद्धि आई है और वे अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई हैं।
वहीं मटकोट निवासी कमली कश्यप और प्रमिला ठाकुर ने कृषि कार्य, पशुपालन के साथ - साथ किराना दुकान संचालन के माध्यम से अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएं हैं। इन दोनों ने छोटे स्तर से शुरुआत की, लेकिन समूह की सहायता और लखपति दीदी योजना के मार्गदर्शन से आज वे स्थायी आय के साथ परिवार की मजबूत आर्थिक आधारशिला बन चुकी हैं। बिहान योजना से जुड़ने के एक पश्चात  सामुदायिक निवेश कोष और बैंक लिंकेज की राशि से कमली ने दो एकड़ में मक्का की खेती करते हुए 45 हजार का मुनाफा कमाया, उसी राशि से छोटा किराना की दुकान खोली, साथ में मुर्गी पालन का व्यवसाय भी कर रही। वहीं प्रमिला ठाकुर ने बिहान योजना से जुड़ने के एक पश्चात  सामुदायिक निवेश कोष और बैंक लिंकेज की राशि से कृषि कार्य और बतख पालन का कार्य के लिए सहयोग मिला।
ग्राम परचनपाल की शोभा बघेल ने अपने कौशल का उपयोग करते हुए सीसल जूट सामग्री निर्माण का कार्य शुरू किया। उनकी मेहनत और रचनात्मकता ने न केवल उन्हें आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि स्थानीय स्तर पर अन्य महिलाओं को भी रोजगार के अवसर दिए। उनके द्वारा तैयार उत्पाद अब स्थानीय बाजारों में लोकप्रिय हो रहे हैं।
इन सभी महिलाओं की यह यात्रा साबित करती है कि यदि अवसर और मार्गदर्शन मिले, तो ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएँ भी आर्थिक रूप से सशक्त होकर “लखपति दीदी” बनने की राह पर आगे बढ़ सकती हैं।लखपति दीदी योजना ने न केवल इन महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार किया, बल्कि उनके आत्मविश्वास और सामाजिक सम्मान को भी नई ऊँचाई दी है। आज ये महिलाएँ समाज में प्रेरणा की मिसाल हैं - आत्मनिर्भर भारत के सशक्त प्रतीक।







 

जूट खेती में छत्तीसगढ़ की नई पहल—किसानों की कमाई और रोजगार, दोनों में इजाफा

07-Nov-2025
रायपुर, ( शोर संदेश )  ।  छत्तीसगढ़ के किसान जूट के धागों से अपनी तरक्की की नई राह गढ़ेंगे। राज्य में जूट की खेती की संभावनाए तलाशने तथा इस फसल के क्षेत्र विस्तार के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में संचालित अखिल भारतीय जूट अनुसंधान परियोजना के तहत महती प्रयास किये जा रह है। जूट की फसल को बढ़ावा देने के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा आईआईटी भिलाई के तकनिकी सहयोग तथा आई.बी.आई.टी.एफ. के वित्त पोषण से यह परियाजना संचालित की जा रही है। विश्वविद्यालय द्वारा कृषि विज्ञान केंद्र धमतरी के सहयोग से धमतरी जिले में 4 एकड़ क्षेत्र में जूट की खेती कराई गई थी, जो अब कटने को तैयार है। इससे पूर्व जून और सितम्बर में कृषि विज्ञान केंद्र धमतरी, कृषि विज्ञान केंद्र रायपुर और कृषि विज्ञान केंद्र दंतेवाड़ा के माध्यम से कृषक प्रशिक्षण का आयोजन जून और सितम्बर में भी किया गया था। परियोजना के तहत लगाई गई जूट की फसल अब कटाई के लिए तैयार है जिससे किसानों को प्रति एकड़ लगभग पचास हजार रूपये की आय मिलने की उम्मीद है और किसानों के चेहरे पर खुशी देखते ही बनती है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक विस्तार सेवायें डॉ. एस.एस. टुटेजा के मार्गदर्शन में कृषि विज्ञान केंद्र धमतरी के प्रमुख डॉ. ईश्वर सिंह, वैज्ञानिक डॉ. दीपिका चंद्रवंशी और डॉ. प्रेम लाल साहू के सहयोग से कृषकों को जूट की खेती के लिए प्रेरित किया गया। विगत दिवस कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. प्रज्ञा पांडे एवं कृषि विज्ञान केन्द्र धमतरी के वैज्ञानिक डॉ. प्रेम लाल साहू द्वारा कृषकों के खेतों का भ्रमण किया गया तथा जूट की तैयार फसल का जायजा लिया गया। किसानों से चर्चा दौरान किसानों ने बताया कि जूट की फसल लगभग 100 दिन में तैयार हो जाती है। जूट की कटाई फूल आने से पहले की जाती है और फिर कटाई के बाद 15-20 दिनों तक जूट के पौधों को पानी में डुबोकर सड़ाया जाता है। इस प्रक्रिया से जूट के तने से रेशे अलग हो जाते हैं, जिन्हें धोकर निकाल लिया जाता है। अब किसान इसे गर्मी की फसल के रूप में उगाने की तैयारी कर रहे हैं। जूट के हरे डंठलो से 6-8 प्रतिशत रेशों की प्राप्ति होती है। 2025-26 सीज़न के लिए कच्चे जूट का न्यूनतम समर्थन मूल्य (डैच्) ₹5,650 प्रति क्विंटल है, जो पिछले विपणन सीज़न की तुलना में ₹315 प्रति क्विंटल ज्यादा है। जूट के रेशे को उनकी गुणवत्ता के आधार पर टोसा जूट रेशों में TD1 से TD5 ग्रेड में वर्गीकृत किया जाता है, जहां TD1 उच्चतम गुणवत्ता वाला और TD5 निम्नतम गुणवत्ता वाला होता है। ये ग्रेड विभिन्न कारकों द्वारा निर्धारित होते हैं। TD1 (सर्वोत्तम ग्रेड),TD2 (अच्छा ग्रेड), TD3 (औसत ग्रेड),TD4 (खराब ग्रेड),TD5 (निम्नतम ग्रेड) को दर्शाता है। औसत जूट उत्पादन और उपज औसत जूट की उपज खेती की पद्धतियों और विशिष्ट किस्मों पर निर्भर करती है, लेकिन सामान्यतः मानक और उन्नत विधियों का उपयोग करते हुए एक एकड़ जूट की खेती से 18-20 टन हरे पौधे और 0.8-1.0 टन कच्चा रेशा प्राप्त होता है। इससे किसानों को प्रति एकड़ लगभग पचास हजार रूपये की आय प्राप्त होती है। धमतरी और अन्य जिलों के किसान अब जूट की खेती को एक लाभकारी विकल्प के रूप में देख रहे हैं, जो उन्हें न केवल उनकी कृषि उत्पादकता बढ़ाने में मदद करेगा, बल्कि आर्थिक रूप से भी मजबूत बना सकता है।



 

लाख पालन बना ग्रामीण समृद्धि का आधार, किसानों की आमदनी में आई क्रांतिकारी बढ़ोतरी

07-Nov-2025
रायपुर, ( शोर संदेश )  । छत्तीसगढ़ में पलाश पेड़ों की भरमार है। पलाश पेड़ जिसे छत्तीसगढ़ी में परसा कहा जाता है, वो खेतों के मेड़ों में अक्सर पाए जाते हैं। इसके बावजूद इसका कोई व्यावसायिक उपयोग नहीं हो पा रहा था। परंतु अब मनेंद्रगढ़ वनमंडल ने इस दिशा में एक अनूठी पहल की है। पलाश के पेड़ लाख पालन के लिए अत्यंत उपयुक्त होते हैं क्योंकि इनमें रंगीनी लाख का पालन किया जा सकता है। अगर इन पलाश के पेड़ों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह किसानों को खेती के अलावा अतिरिक्त आय का साधन प्रदान कर सकता है। 
मनेंद्रगढ़ जिले के गांवों में पलाश पेड़ों की पर्याप्त उपलब्धता है। यहां पूर्व में लाख पालन कार्य होता रहा है, लेकिन समय के साथ मौसम की प्रतिकूलता और वैज्ञानिक पद्धतियों के अभाव में यह कार्य बंद हो गया था। ग्रामीणों से चर्चा करने पर ग्राम भौता, नारायणपुर, छिपछिपी और बुंदेली के कृषकों ने लाख पालन के प्रति गहरी उत्सुकता दिखाई। इस उत्साह को देखते हुए अक्टूबर-नवंबर 2023-24 में पहली बार भौता समिति के अंतर्गत भौता, नारायणपुर, छिपछिपी और बुंदेली गांवों में तथा जनकपुर के चांटी और जरडोल गांव के आसपास के क्षेत्रों में 34 कृषकों को 2.54 क्विंटल लाख बीहन (बीज) वितरित किए गए, जिनका 276 पेड़ों में संचरण कराया गया। इसके पश्चात जून-जुलाई 2024-25 में भौता और बेलबहरा समितियों के तीन ग्रामों में 0.74 क्विंटल बीहन 4 कृषकों के 80 पेड़ों में लगवाया गया।
अक्टूबर 2024-25 में 5 प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों ने भौता, बेलबहरा, माड़ीसरई, जनकपुर और जनुवा के अंतर्गत 9 ग्रामों के 126 कृषकों ने 3117 पलाश पेड़ों में बीहन लाख का संचरण किया। इसके बाद जुलाई 2025 में 10 प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों के 27 ग्रामों के 205 कृषकों द्वारा 2037 पलाश पेड़ों में 25.50 क्विंटल बीहन लाख का संचरण किया गया, जिसमें से 20.45 क्विंटल बीहन लाख जिले के ही कृषकों द्वारा उत्पादित किया गया, जबकि शेष 4.05 क्विंटल बलरामपुर से लाया गया। अक्टूबर 2025 तक यह प्रयास और बड़ा रूप ले चुका था, अब 37 ग्रामों के 400 कृषकों ने कुल 6 हजार पेड़ों में 60 क्विंटल बीहन लाख का संचरण किया। गौर करने योग्य बात यह है कि इस बार संपूर्ण बीहन लाख का उत्पादन मनेंद्रगढ़ के ही किसानों ने किया।
इस अभियान का लक्ष्य हर वर्ष उत्पादन को तीन गुना बढ़ाना है, जिससे अगले वर्ष तक यह पूरे ज़िले में फैल जाएगा। लाख पालन की सबसे बड़ी चुनौती बीहन लाख की उपलब्धता होती है, क्योंकि इसे दूसरे क्षेत्रों से लाकर लगाना कठिन कार्य है। लेकिन जिस गति से मनेंद्रगढ़ लाख उत्पादन में आगे बढ़ रहा है, भविष्य में यह संभव है कि पूरे छत्तीसगढ़ को बीहन लाख की सप्लाई यहीं से हो। वर्तमान में लाख उत्पादन में झारखंड पहले और छत्तीसगढ़ दूसरे स्थान पर है, वहीं छत्तीसगढ़ में मनेंद्रगढ़ जिला इस क्षेत्र में पहले स्थान पर है।
अगर इसका कॉस्ट- बेनिफिट एनालिसिस देखा जाए, तो जितना लाख बीज के रूप में पेड़ों में लगाया जाता है, उसका लगभग 2.5 गुना तक उत्पादन हो जाता है। इसका मतलब है कि किसानों को लगभग डेढ़ गुना का शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। कई किसान इस पहल से 30 से 40 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।
प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति भौता के ग्राम छिपछिपी के कृषक सर्वजीत सिंह ने 2023 के अक्टूबर-नवंबर में 40 किलो बीहन 45 वृक्षों में लगाया, जिसकी लागत 10,000 रुपए थी। 2024 के अक्टूबर-नवंबर में उन्होंने 150 किलो बीहन लाख 37,500 रुपए में बेचा और 2025 के जुलाई में 125 किलो लाख 31,250 रुपये में बेचा। दो साल में उनका कुल नेट प्रॉफिट 58,000 रुपए रहा। इसी प्रकार समिति भौता के ग्राम नारायणपुर के कृषक उदयनारायण ने 2024 के अक्टूबर-नवंबर में 60 किलो बीहन 70 वृक्षों में 15,000 रुपये की लागत से लगाया और 2025 के जुलाई में 150 किलो बीहन लाख 37,500 रुपये में विक्रय किया। एक वर्ष में ही उन्होंने 22,500 रुपए का नेट प्रॉफिट कमाया।

 

कोंडागांव में बिजली व्यवस्था मजबूत, किसानों को लो-वोल्टेज समस्या से मिलेगी राहत

06-Nov-2025
कोण्डागांव।  ( शोर संदेश ) । मुख्यमंत्री विद्युत अधोसंरचना विकास योजना के तहत कोण्डागांव जिले में विद्युत प्रणाली को सुदृढ़ करने की दिशा में एक और बड़ी सफलता दर्ज की गई है।
वन मंत्री एवं विधायक नारायणपुर केदार कश्यप, बस्तर विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष एवं विधायक कोंडागांव लता उसेंडी, विधायक केशकाल नीलकंठ टेकाम एवं कलेक्टर नुपुर राशि पन्ना के निर्देशानुसार, तथा कार्यपालक निदेशक (जगदलपुर) टी. के. मेश्राम और अधीक्षण अभियंता  एच. के. सूर्यवंशी के मार्गदर्शन में, कार्यपालन अभियंता कोंडागांव आर. एल. सिंहा के सतत प्रयासों से मुख्यमंत्री विद्युत अधोसंरचना विकास योजना के तहत कोंडागांव जिले में विद्युत प्रणाली को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
दिनांक 04.11.2025 को जिले के 33/11 केवी विश्रामपुरी उपकेंद्र के 3.15 MVA पावर ट्रांसफॉर्मर की क्षमता वृद्धि 5 MVA में कर दी गई है जिससे क्षेत्र के विद्युत उपभोक्ता विशेष कर कृषि उपभोक्ताओं को निर्बाध और गुणवत्ता पूर्ण विद्युत आपूर्ति की जा सकेगी। इसी कड़ी में जिले के 33/11 केवी उपकेंद्र मॉकडी, बीजापुर, किबाई बालेंगा, गिरोला एवं बोरगांव में स्थापित 3.15 MVA पावर ट्रांसफॉर्मर की क्षमता वृद्धि कर 5 MVA में परिवर्तन हेतु प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त कर ली गई है। साथ ही 33/11 केवी उपकेंद्र रांधना के 11 केवी बरकई एवं रांधना फीडर, 33/11 केवी बड़े डोंगर उपकेंद्र के 11 केवी भूमका फीडर, तथा 33/11 केवी उपकेंद्र फरसगांव के 11 केवी सोनाबेड़ा फीडर की क्षमता वृद्धि हेतु भी प्रशासकीय स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। इस कार्य से जिले में ओवरलोड एवं लो वोल्टेज की समस्या का प्रभावी समाधान होगा तथा उपभोक्ताओं को निरंतर एवं गुणवत्तापूर्ण विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी।

सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर साधारण किसान बने प्रगतिशील: महावीर पुषाम की सफल खेती की कहानी

29-Oct-2025
रायपुर, ( शोर संदेश ) महावीर पुषाम अब प्रगतिशील किसान के रूप में उभर कर आ रहे हैं। वे एक साधारण किसान हैं, जिन्होंने अपने कठिन परिश्रम, लगन और सरकारी योजनाओं के सही उपयोग से न सिर्फ अपनी खेती को लाभकारी बनाया, बल्कि अन्य किसानों को प्रेरित कर रहे हैं। महावीर पुषाम की मेहनत और विभागीय सहयोग से उनके खेतों में बड़ा बदलाव आया। उन्होंने बीज और खाद के संतुलित उपयोग पर ध्यान दिया। पहले जहाँ वे 2 एकड़ में तिल, 2 एकड़ में रामतिल और 1 एकड़ में मूंगफली उगाते थे, अब उन्होंने सही बीज, उन्नत खेती तकनीक और उचित खाद का प्रयोग किया। इस बदलाव से उत्पादन लागत में भी कमी आई, और कुल आय में वृद्धि हुई। 
गुणवतायुक्त बीज और संतुलित खाद के उपयोग से बढ़ी पैदावार
बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के विकासखण्ड रामचन्द्रपुर के ग्राम विमलापुर निवासी महावीर पुषाम कई वर्षों से खेती कर रहे हैं और लगभग पाँच एकड़ भूमि पर तिलहन और मूंगफली की फसल उगाते हैं। प्रारंभ में वे केवल अपनी पारंपरिक तकनीकों और अपने द्वारा संरक्षित बीजों का उपयोग करते थे। लेकिन समय के साथ उन्होंने समझा की पारंपरिक तरीके हर वर्ष बेहतर आय के साथ बढ़ोतरी नहीं ला सकते। महावीर की खेती में प्रारंभिक वर्षों में कई समस्याएँ थीं। वे बताते हैं कि उनके पास गुणवत्तायुक्त बीज नहीं थे और उन्होंने अपनी परंपरा के अनुसार बीजों का चयन किया। इससे उत्पादन सीमित था और कई बार फसल में घट-बढ़ होने लगी। तिल, मूंगफली और रामतिल की खेती में उन्हें केवल कुछ ही उत्पादन मिलता था, जिससे आय सीमित रहती थी। कृषि के आधुनिक तरीकों की जानकारी न होने के कारण लागत नियंत्रण और उत्पादन की गुणवत्ता पर भी प्रभाव पड़ता था और महावीर केवल 55 से 60 हजार रुपये की आय अर्जित कर पाते थे।
आय बढी और आर्थिक स्थिति हुई मजबूत 
महावीर अपने गांव और आसपास के किसानों से बात की और जानकारी जुटाई। उसी दौरान उन्हें कृषि विभाग की राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन योजना (एनएमईओ) के बारे में पता चला। कृषि विभाग से संपर्क करने के बाद उन्होंने योजना की विस्तार से जानकारी ली। विभाग ने उन्हें गुणवत्तायुक्त बीज, उन्नत कृषि तकनीकों और संतुलित खाद के उपयोग के बारे में मार्गदर्शन दिया। उनकी आमदनी पहले लगभग 55-60 हजार रुपये से बढ़कर करीब 1 लाख रुपये हो गई। इस सफलता ने न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया, साथ ही अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बना दिया।
नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर खेती को और अधिक लाभकारी बनाऊँगा
महावीर पुषाम का कहते हैं कि मैं कृषि विभाग की सभी योजनाओं का लाभ लेने के लिए इच्छुक हूं। मेरी कोशिश है कि मैं नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर खेती को और अधिक लाभकारी बनाऊँ और अपने अनुभव के माध्यम से अन्य किसानों को भी मार्गदर्शन दूं। महावीर कहते हैं सरकारी योजनाओं का सही जानकारी मिले तो कोई भी किसान अपने जीवन को बेहतर बना सकता है।

किसान हैं विकसित भारत की रीढ़, तिलहन उत्पादन से बढ़ेगी आत्मनिर्भरता : मंत्री टंकराम वर्मा

27-Oct-2025
रायपुर,  ( शोर संदेश )  छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में सारंगढ़ कृषि उपज मंडी प्रांगण में ‘‘तिलहन कृषक मेला सह सम्मेलन’’ का आयोजन किया गया। नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल के अंतर्गत कृषि कार्यालय द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राजस्व, आपदा प्रबंधन, पुनर्वास एवं उच्च शिक्षा मंत्री टंकराम वर्मा शामिल हुए।      
मंत्री वर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य पर अग्रसर हैं। इस दिशा में दलहन-तिलहन का अधिक उत्पादन देश को खाद्य तेल के आयात से मुक्ति दिलाएगा और आर्थिक आत्मनिर्भरता मजबूत करेगा।
इस अवसर पर मंत्री वर्मा ने कृषि, पशुपालन, उद्यानिकी एवं मत्स्य विभाग द्वारा लगाए गए प्रदर्शनी स्टॉलों का अवलोकन करते हुए हितग्राहियों, महिला स्व-सहायता समूहों और विभागीय अधिकारियों से उत्पादों एवं तकनीकों की जानकारी ली। उन्होंने किसानों को नई कृषि तकनीकें अपनाने, मृदा परीक्षण शिविरों में भाग लेने तथा कीटनाशकों के सुरक्षित उपयोग की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि सारंगढ़ क्षेत्र की मिट्टी तिलहन उत्पादन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। तिलहन नगदी फसल है, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में सरकार किसानों के लिए घोषित अधिकांश वादों को पूरा कर चुकी है, जिनमें भूमिहीन कृषकों को 10 हजार रुपये की सहायता राशि एक प्रमुख उपलब्धि है।
कार्यक्रम में जांजगीर-चांपा सांसद कमलेश जांगड़े, जिला पंचायत अध्यक्ष  संजय भूषण पांडेय एवं कलेक्टर डॉ. संजय कन्नौजे सहित अन्य जनप्रतिनिधियों ने भी किसानों को संबोधित किया। समारोह में उत्कृष्ट कार्य करने वाले किसानों और हितग्राहियों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया तथा अतिथियों को स्मृति चिह्न भेंट किए गए। 
इस अवसर पर पुलिस अधीक्षक आंजनेय वार्ष्णेय, अपर कलेक्टर प्रकाश सर्वे, पूर्व विधायक केराबाई मनहर तथा कृषि, मत्स्य, उद्यानिकी एवं पशुधन विभाग के अधिकारी उपस्थित थे।



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