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कोविड-19 से उत्पन्न छ: संकट

14-Jun-2020

रामचंद्र गुहा
आज़ादी के बाद से ही भारत कई मुश्किल दौर से गुज़रा है। भारत ने विभाजन की पीड़ा; 1960 के दशक का अकाल और युद्ध; 1970 के दशक में इंदिरा गांधी का आपातकाल; और 1980 के दशक के अंत एवं 1990 की शुरुआत में सांप्रदायिक दंगों का दर्द झेला है। हमारा देश एक बार फिर अब तक के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुज़र रहा है। कारण यह है कि कोविड-19 महामारी ने कम से कम छह अलग-अलग संकटों को जन्म दिया है।
सबसे पहला और सबसे प्रत्यक्ष संकट चिकित्सा सम्बंधी है। जैसे-जैसे वायरस संक्रमण के मामले बढ़ेंगे, हमारे पहले से कमज़ोर और अति-व्यस्त स्वास्थ्य तंत्र पर और अधिक दबाव पड़ेगा। ऐसे समय में, महामारी से निपटने के प्रबंधन पर अत्यधिक ध्यान देने का मतलब होगा कि अन्य प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएं उपेक्षित रह जाएंगी। टीबी, ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप और कई अन्य रोगों से पीड़ित करोड़ों भारतीयों को पता चल रहा है कि इलाज के लिए डॉक्टर व अस्पताल मिलना मुश्किल है, जो पहले उपलब्ध थे। इससे अधिक चिंता तो भारत में हर माह पैदा होने वाले लाखों शिशुओं की है। कई वर्षों की मेहनत से इन नवजात शिशुओं को खसरा, मम्स, पोलियो, डिप्थीरिया जैसी घातक बीमारियों के विरुद्ध टीकाकरण का एक संस्थागत ढांचा तैयार किया गया था। लेकिन हालिया ज़मीनी रिपोर्ट्स से पता चला है कि कोविड-19 की ओर अधिक ध्यान होने से राज्य सरकारें बच्चों के टीकाकरण कार्यक्रमों में पिछड़ रही हैं।
दूसरा और स्पष्ट संकट आर्थिक संकट है। महामारी ने कपड़ा, एयरलाइन्स, पर्यटन और आतिथ्य उद्यमों जैसे रोज़गार पैदा करने वाले उद्योगों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। इस तालाबंदी का अनौपचारिक क्षेत्र पर और भी अधिक प्रभाव पड़ा होगा। कई हज़ारों लाखों मज़दूरों, पथ-विक्रेताओं और दस्तकारों का रोज़गार छिन गया है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी का अनुमान है कि मार्च की शुरुआत में जो बेरोज़गारी दर 7 फीसदी थी वह अब 27 फीसदी से अधिक हो गई है। पश्चिमी युरोप के अमीर और बेहतर प्रबंधित देशों में बेरोज़गार लोगों को इस संकट से निपटने के लिए पर्याप्त वित्तीय राहत प्रदान की जा रही है। वहीं दूसरी ओर, हमारे गरीब और खराब ढंग प्रबंधित गणराज्य में राज्य द्वारा निराश्रित लोगों की थोड़ी ही सहायता की जाती है।
हमारे सामने तीसरा सबसे बड़ा संकट मानवीय संकट है। इस महामारी को परिभाषित करने वाली छवियां वे फोटो और वीडियो होंगे जिनमें प्रवासी मज़दूर अपने पैतृक गांव या कस्बों तक पहुंचने के लिए सैकड़ों मील की दूरी पैदल तय करते दिख रहे हैं। महामारी की गंभीरता को देखते हुए शायद एक अस्थायी राष्ट्रव्यापी तालाबंदी तो अनिवार्य थी लेकिन इसकी योजना ज़्यादा अकलमंदी से बनाई जानी चाहिए थी। हालात की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति यह जानता है कि लाखों भारतीय प्रवासी कामगार हैं जो एक बेहतर ज़िंदगी के लिए अपने परिवारों से दूर रहकर काम कर रहे हैं। पता नहीं यह तथ्य प्रधानमंत्री या उनके सलाहकारों की नज़रों में क्यों नहीं आया। यदि देश के नागरिकों को ट्रेनों और बसों की मौजूदा सुव्यवस्थित प्रणाली के साथ एक हफ्ते (न कि 4 घंटे) का समय दिया जाता तो वे सुरक्षा और सहजता से अपने घर पहुंच जाते।
जैसा कि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है, तालाबंदी की उपयुक्त योजना बनाने में विफलता ने जन स्वास्थ्य संकट को बढ़ाया है। बेरोज़गार श्रमिकों को मार्च के शुरू में ही अपने-अपने घर लौटने की अनुमति दी जानी चाहिए थी। उस समय वायरस के वाहकों की संख्या बहुत कम थी। लेकिन अब दो महीने के बाद केंद्र सरकार द्वारा ट्रेनों को दोबारा से शुरू करने से हज़ारों वायरस-वाहक अपने गृह-ज़िलों में वायरस ले जाएंगे।
वास्तव में यह मानवीय संकट एक व्यापक सामाजिक संकट का हिस्सा है जिसका देश आज सामना कर रहा है। कोविड-19 से काफी पहले से ही भारतीय समाज वर्ग और जाति के आधार पर बंटा ही था, धर्म को लेकर भी काफी पूर्वाग्रह से ग्रस्त था। महामारी और इसके कुप्रबंधन ने इन विभाजनों को और बढ़ावा दिया है। पहले से ही आर्थिक रूप से वंचित लोगों पर इन कष्टों का बोझ अनुपात से अधिक पड़ा है। इसी दौरान, सत्तारूढ़ दल के सांसदों (और चिंताजनक रूप से वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों) द्वारा कोविड-19 मामलों का धार्मिक चित्रण करने से भारत के पहले से ही कमज़ोर मुस्लिम अल्पसंख्यक और भी असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। एक ओर तो मुसलमानों पर दोषारोपण बेरोकटोक चलता रहा और इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री चुप रहे। खाड़ी देशों की तीखी आलोचना के बाद ही उन्होंने एक बयान जारी कर कहा कि यह वायरस किसी धर्म के बीच फर्क नहीं करता। लेकिन उस समय तक सत्तारूढ़ दल और उसके ‘पालतू मीडिया’ द्वारा फैलाया गया ज़हर आम भारतीयों की चेतना में गहराई से घर बना चुका था।
चौथा संकट पहले के तीन संकटों की तरह स्पष्ट तो नहीं है फिर भी यह काफी गंभीर हो सकता है। यह एक उभरता हुआ मनोवैज्ञानिक संकट है। बेरोज़गार और अपने घरों के लिए पैदल निकलने के लिए मजबूर लोगों में शायद ही छोड़े गए शहरों में वापस जाने का हौसला पैदा हो पाए। एक बड़ी चिंता स्कूली बच्चों और कॉलेज के छात्रों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव की है जिनका सामना आने वाले महीनों में उनको स्वयं करना है। आर्थिक असुरक्षा के कारण वयस्कों में भी अवसाद और अन्य मानसिक बीमारियों में वृद्धि हो सकती है। इसके परिणाम स्वयं उनके लिए और उनके परिवार के लिए काफी गंभीर हो सकते हैं।
पांचवां संकट भारत के संघीय ढांचे का कमज़ोर होना है। आपदा प्रबंधन अधिनियम के आधार पर केंद्र को स्वयं में अत्यधिक शक्तियों को केंद्रित करने की अनुमति मिल गई है। कम से कम महामारी के शुरुआती महीनों में, राज्यों को इतनी ज़रूरी स्वायत्तता भी नहीं दी गई कि अपने स्थानीय संदर्भों के अनुकूल सर्वोत्तम तरीकों से चुनौतियों से निपट सकें। केंद्र ऊपर से एक के बाद एक मनमाने और परस्पर विरोधी निर्देश जारी करता रहा। इस बीच, केंद्र द्वारा राज्यों को वित्तीय संसाधनों से वंचित रखा गया; यहां तक कि उनके हिस्से के जीएसटी संग्रहण के उनके हिस्से का भुगतान भी नहीं किया गया।
छठा संकट, जो पांचवे संकट से जुड़ा है, भारतीय लोकतंत्र का कमज़ोर होना है। इस महामारी की आड़ में बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) जैसे निष्ठुर कानूनों के तहत हिरासत में लिया जा रहा है। कई अध्यादेश पारित किए जा रहे हैं और संसद में चर्चा किए बिना ही महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिए जा रहे हैं। समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के मालिकों पर सरकार की आलोचना न करने का दबाव डाला जा रहा है। इसी बीच, राज्य और सत्तारूढ़ दल प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व को चमकाने में लगे हैं। आपातकाल के दौरान, एक अकेले देवकांत बरुआ ने कहा था कि ‘इंदिरा भारत है और भारत इंदिरा है’; लेकिन अब तो चाटुकारिता की होड़ लगी है।
भारतीय चिकित्सा तंत्र अत्यंत दबाव में रहा है; भारतीय अर्थव्यवस्था जर्जर स्थिति में है; भारतीय समाज विभाजित और नाज़ुक है; भारत का संघीय ढांचा पहले से कहीं अधिक कमज़ोर है। भारतीय राज्य तेज़ी से सत्तावादी बन रहा है। इन सबका मिला-जुला प्रभाव ही इसे देश के विभाजन के बाद का सबसे बड़ा संकट बना देता है।
एक देश के रूप में हम कैसे अपनी अर्थव्यवस्था, समाज और राजतंत्र के लिए इस कठिन समय में से बगैर किसी बड़े नुकसान के उबर सकते हैं? सबसे पहले तो, सरकार को उन समस्याओं के विभिन्न (और परस्पर सम्बंधित) आयामों को पहचानना होगा जिनका सामना वर्तमान में हमारा राष्ट्र कर रहा है। दूसरा, सरकार को 1947 में जवाहरलाल नेहरु और वल्लभभाई पटेल द्वारा लिए गए फैसलों से कुछ सीख लेना चाहिए। उन्होंने उस समय की चुनौतियों की गंभीरता को पहचानते हुए अपने वैचारिक मतभेदों को अलग रखकर बी. आर. अंबेडकर जैसे भूतपूर्व विरोधियों को भी कैबिनेट में शामिल किया था। इस तरह की एक राष्ट्रीय सरकार बनाना तो अब संभव नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री जानकार और समझदार विपक्षी नेताओं से सक्रिय परामर्श तो ले ही सकते हैं। तीसरा, प्रधानमंत्री को बिना सोचे-विचारे लिए गए नाटकीय असर वाले आकस्मिक फैसले लेने की बजाय अर्थशास्त्र, विज्ञान और सार्वजनिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञों का सम्मान करना चाहिए और उन पर भरोसा करना सीखना चाहिए। चौथा, केंद्र और सत्तारूढ़ दल को उन राज्यों को परेशान करने की अपनी इच्छा को पूरी तरह छोड़ देना चाहिए जहां उनका शासन नहीं है। पांचवां, केंद्र को सिविल सेवाओं, सशस्त्र बलों, न्यायपालिका और जांच एजेंसियों को सत्ता का हथियार बनाने के बजाय पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करनी चाहिए।
यह हमारे अतीत और वर्तमान पर एक व्यक्ति की समझ पर आधारित सुझावों की एक आंशिक सूची है। यह कोई साधारण संकट नहीं है, बल्कि शायद गणतंत्र के इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती है। इससे निपटने के लिए हमारे सारे संसाधनों और संवेदना की आवश्यकता होगी 


पुंछ में पाकिस्तान की तरफ से गोलीबारी

14-Jun-2020

दिल्ली (शोर सन्देश)। जम्मू-कश्मीर के पुंछ में पाकिस्तान की ओर से की जा रही गोलीबारी की चपेट में आकर भारत का एक जवान शहीद हो गया है। पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर उकसावे की कार्रवाई कर रहा है.पाकिस्तान ने पुंछ जिले के किरनी सेक्टर में शाहपुर के पास नियंत्रण रेखा पर फायरिंग की. इसकी चपेट में आकर एक जवान की मौत हो गई, जबकि दो गंभीर रूप से घायल हो गए। पाकिस्तान ने गोलियों और मोर्टार से भारतीय ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन भारत की ओर से पाकिस्तान को इसका भरपूर जवाब मिला. हालांकि गोलीबारी की चपेट में आकर एक सैनिक शहीद हो गया, जबकि दो घायल हो गए। नियंत्रण रेखा पर तैनात भारतीय सेना ने पाकिस्तान की इस हरकत का जोरदार जवाब दिया है. भारत की जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान के कई पोस्ट ध्वस्त हो गए हैं।

बता दें कि 12 जून को भी पाकिस्तान की सेना ने जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा से लगे दो सेक्टरों की अग्रिम चौकियों और गांवों में फायरिंग की थी और संघर्षविराम का उल्लंघन किया था। सेना के मुताबिक पाकिस्तान लगभग एक सप्ताह से नियंत्रण रेखा के पास से बिना किसी उकसावे के गोलीबारी कर रहा है। 


4 रुपये महंगा हुआ डीजल, दिल्‍ली में पेट्रोल 75 रुपये के पार

13-Jun-2020

दिल्ली (शोर सन्देश)। कोरोना संकट के बीच भारत में अनलॉक-1 का दौर चल रहा है। इस दौर में तेल कंपनियां लगातार पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा रही हैं। शनिवार को देश की राजधानी दिल्‍ली में पेट्रोल की कीमत 0.59 रुपये की बढ़ोतरी के साथ 75.16 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गई. वहीं, डीजल के भाव में 0.58 रुपये का इजाफा हुआ और यह 73.39 रुपये प्रति लीटर पर है।

दिल्‍ली के अलावा कोलकाता में शनिवार को पेट्रोल 77.05 रुपये के भाव पर था, जबकि डीजल की कीमत 69.23 रुपये प्रति लीटर हो गई है। वहीं मुंबई में पेट्रोल की कीमत 82.10 रुपये प्रति लीटर पर है, जबकि डीजल की कीमत 72.03 रुपये प्रति लीटर है। इसके अलावा चेन्नई में डीजल की कीमत 71.64 रुपये प्रति लीटर और पेट्रोल की कीमत 78.99 रुपये प्रति लीटर हो गई है। बता दें कि सिर्फ एक हफ्ते में पेट्रोल 3.90 रुपये महंगा हो गया है। वहीं, अगर डीजल की बात करें तो इसकी कीमत में चार रुपये का इजाफा हुआ है। 


देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या तीन लाख के पार, 8884 की मौत, छत्तीसगढ़ में 31 नए संक्रमित मिले

13-Jun-2020

दिल्ली (शोर सन्देश)। देश में कोरोना मरीजों के आंकड़े में जबरदस्त उछाल दर्ज की गई है। शनिवार को करीब 13 हजार नए मामले सामने आए और करीब 400 लोगों की मौत हो गई. स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से शुक्रवार को अपडेट के मुताबिक, अब देश में कुल मरीजों की संख्या 3 लाख 08 हजार 993 हो गई है, जिसमें 8,884 लोग जान गंवा चुके हैं।

छत्तीसगढ़ में कोरोना संक्रमित आठ मरीजों को उपचार के बाद डिस्चार्ज किया गया। अभी रायपुर एम्स में 132 कोरोना संक्रमित मरीजों का उपचार जारी है। विगत 24 घंटे (रात्रि 08 बजे तक) में 13 कोविड-19 पॉजीटिव टेस्ट हुए हैं। इसमें राजनंदगांव और रायपुर से 4-4, जशपुर और बलौदा बाजार के दो-दो और धमतरी का एक सैंपल शामिल है। कल ही 31 नए मरीजों की पुष्टि हुई है। 


अहमदाबाद बना कोरोना का डेथस्पॉट

13-Jun-2020

दिल्ली (शोर सन्देश)। कोरोना का कहर पूरे देश में जारी है. लेकिन कुछ राज्य ऐसे हैं जहां कोरोना का असर कुछ ज्यादा ही देखने में आ रहा है। गुजरात भी कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में शामिल है। लॉकडाउन के बाद अनलॉक के फेजे में हर दिन कोरोना के केस बढ़ते ही जा रहे हैं. अहमदाबाद में भी कोरोना के मामलों में तेजी से और चिंताजनक रूप से बढ़ोतरी हो रही है।
देश में कोलकाता के साथ-साथ अहमदाबाद में भी कोरोना की मृत्यु दर ज्यादा है. कोलकाता में मृत्यु दर जहां 9 प्रतिशत है। वहीं अहमदाबाद में फिलहाल डेथ रेट 7.1% हो चुकी है। अहमदाबाद इन दिनों कोरोना का डेथस्पॉट बना हुआ है। अहमदाबाद में हर 100 मामलों में से 7 लोगों की मौत दर्ज की गयी है. अहमदाबाद को इसलिए भी कोरोना का डेथस्पॉट माना जा रहा है क्योंकि मृत्यु दर जहां पिछले महीने तक 5% थी, वहीं अब यह बढ़कर 7.1% हो गई है. जिसका अर्थ है कि मौत के मामलों में यह शहर तेजी से आगे बढ़ रहा है।
गुजरात में कोरोना के मृत्यु दर की बात करें तो यह 9.16% है। पिछले 84 दिनों में कोरोना से गुजरात में कुल 1385 मौतें हुई है, जबकि इसमें से 1117 मौतें अकेले अहमदाबाद में हुई हैं। पिछले 10 दिनों की बात की जाए तो गुजरात में 309 लोगों की कोरोना की वजह से मौत हुई है, जिसमें 250 लोगों की मौत अकेले अहमदाबाद में हुई है।

अहमदाबाद में अधिक चिंता की बात यह है कि प्रति मिलियन यहां 1797 लोग कोरोना ग्रस्त हैं, तो वहीं मुंबई में 3316, चेन्नई में 3229 के बावजूद देश के शीर्ष शहरों में मृत्यु दर सबसे अधिक है. अहमदाबाद में प्रति मिलियन लोगों में 128 मौतें हुई हैं, जबकि मुंबई में 113, दिल्ली में 43 और चेन्नई में 31 मौतें हुई हैं। 


गुजरात में 92 शेरों की मौत

13-Jun-2020


दिल्ली (शोर सन्देश)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब 10 जून को एशियाई शेरों की आबादी (2015 और 2020 के बीच 151) में 29 प्रतिशत की ऐतिहासिक वृद्धि का जश्न मना रहे थे, तब ही पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा बनाई गई एक समिति की रिपोर्ट में बताया गया कि जनवरी से लेकर अब तक गुजरात के गिर लॉयन लैंडस्केप (जीएलएल) में 92 एशियाई शेरों की मौत हो चुकी है।
कुछ शेर आपस में लड़ कर मर गए और कई कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) की वजह से मर गए। मंत्रालय से जुड़े एक सूत्र जिनके पास रिपोर्ट है ने डाउन टू अर्थ को बताया कि जसधर रेसक्यू सेंटर में समिति को दो शेर दिखाए गए, जो सीडीवी से पीड़ित थे।
92 में से 36 शेरों की मौत मई में हुई, जबकि अप्रैल में 24, मार्च में 10, फरवरी में 12 और जनवरी में 10 शेरों की मौत हुई थी। डाउन टू अर्थ के पास इसके आंकड़े हैं। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि मरने वालों में 19 शेर, 25 शेरनियां, 42 शावक और 6 अज्ञात शेर शामिल हैं। इनमें से सबसे अधिक 59 शेरों की मौत गिर के ईस्ट डिवीजन, धारी में हुई, जहां 2018 में सीडीवी का प्रकोप हुआ था।
दिलचस्प बात यह है कि सितंबर 2018 में जब सीडीवी का प्रकोप हुआ था, उस महीने 26 शेरों की मौत हुई थी, जबकि मई में उससे अधिक शेरों की मौत हुई।
एशियाई शेरों के विशेषज्ञ एवं भारतीय जैवविविधता एवं स्वास्थ्य सेवाओं के आंकड़े उपलब्ध कराने वाली गैर लाभकारी संस्था मेटास्ट्रींग फाउंडेशन के सीइओ रवि चेल्लम के अनुसार, गिर लॉयन लैंडस्कैप में शेरों की मृत्यु दर का कोई बेसलाइन डाटा उपलब्ध नहीं है। मार्च 2018 में गुजरात सरकार ने कहा था कि दो साल में 184 शेरों की मौत हो गई। इस बार पांच महीनों में 92 की मौत हुई है, जबकि 60 की मौत सिर्फ अप्रैल और मई में हुई है।
हालांकि, गुजरात वन विभाग ने सीडीवी की उपस्थिति से इनकार किया है। जूनागढ़ वन्यजीव सर्कल के मुख्य वन संरक्षक डीटी वासवदा ने कहा कि गिर में यहां कोई सीडीवी नहीं है। हमने अप्रैल में बेबेसिया और सीडीवी के लिए बड़ी संख्या में नमूनों का परीक्षण करने के लिए भेजा, लेकिन अभी तक परिणाम नहीं मिले हैं। उन्होंने कहा कि सीडीवी का मुद्दा गुजरात सरकार के खिलाफ मीडिया द्वारा उछाला गया है। इसमें कोई सच्चाई नहीं है।

मंत्रालय ने 29 मई को एक समिति का गठन किया। इसमें राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के सहायक महानिरीक्षक, मंत्रालय के वन्यजीव प्रभाग के संयुक्त निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान के प्रतिनिधि और भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली के एक पशु चिकित्सक शामिल है। 


देश में 24 घंटे में करीब 11 हजार नए मामले, 396 लोगों की मौत

12-Jun-2020

दिल्ली (शोर सन्देश)। देश में कोरोना मरीजों के आंकड़े में जबरदस्त उछाल दर्ज की गई है. शुक्रवार को करीब 11 हजार नए मामले सामने आए और करीब 400 लोगों की मौत हो गई। स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से शुक्रवार सुबह जारी अपडेट के मुताबिक, अब देश में कुल मरीजों की संख्या 2 लाख 97 हजार 535 हो गई है, जिसमें 8498 लोग जान गंवा चुके हैं।

पिछले 24 घंटे में 10 हजार 956 नए मामले सामने आए हैं और 396 लोगों की मौत हो चुकी है. एक दिन में कंफर्म केस और मौत का यह सबसे बड़ा आंकड़ा है. कोरोना से अब तक 1 लाख 47 हजार 195 लोग ठीक हो चुके हैं। अब देश में एक्टिव केस की संख्या 1 लाख 41 हजार 842 है।
कोरोना के सबसे अधिक केस महाराष्ट्र से सामने आए हैं. यहां कुल मरीजों का आंकड़ा 97 हजार 648 हो गया है। जिसमें से 3590 लोगों की मौत हो चुकी है. महाराष्ट्र में कोरोना से अब तक 46 हजार से अधिक लोग ठीक हो चुके हैं, जबकि करीब 48 हजार एक्टिव केस है।
देश में कोरोना का कहर दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। प्रदेश छत्तीसगढ़ में अब तक कोरोना के कुल 96 हजार 230 संभावित व्यक्तियों की सेंपल जांच की गई है। अभी तक के 93 हजार 903 लोगों के परिणाम निगेटिव प्राप्त हुए हैं। 1 हजार 520 की जांच जारी है।


एक पति की दर्द भरी दास्ता,आखिर में चली गई जान

11-Jun-2020

दिल्ली में कोरोना से 8 माह की गर्भवती महिला की मौत, पढिए पूरी कहानी कोरोना मृतक के पति राजीव की जुबानी
दिल्ली (शोर सन्देश)। लापरवाही ने सिर्फ मेरी पत्नी की जान ही नहीं ली, बल्कि उसके पेट में आठ महीने से सांस ले रहे मेरे बच्चे की भी जान ले ली। बीते 9 दिनों ने मेरी पूरी जिंदगी बदलकर रख दी है। सबकुछ खत्म हो गया।’ यह कहते-कहते राजीव का गला भर आया। कुछ देर के लिए फोन पर दोनों ओर से चुप्पी रही। फिर बोले, 28 मई को पता चला कि मोनिका को टाइफाइड हो गया है। हीमोग्लोबिन भी कम हो गया था। तब आठ महीने की प्रेग्नेंट थी। राजीव दिल्ली के शहादरा में रहते हैं और पत्नी का इलाज गाजियाबाद के यशोदा अस्पताल में चल रहा था। राजीव कहते हैं कि डॉक्टर के कहने पर मैंने 29 मई को उसका कोरोना टेस्ट करवाया। 30 मई की शाम रिपोर्ट पॉजिटिव निकली। अस्पताल वालों ने कहा कि हमारे यहां कोरोना का इलाज नहीं होता, आप किसी और अस्पताल में चले जाइए। मैंने एक-एक अस्पताल में फोन लगाना शुरू किया। दिल्ली सरकार ने जो लिस्ट दी थी, उसमें सभी अस्पताल के नंबर थे।
रात में 1 बजे तक मैं फोन लगाता रहा, लेकिन सभी अस्पताल एडमिट करने से मना करते रहे। जहां फोन लगाता, सिर्फ यही जवाब मिल रहा था कि हमारे यहां बेड फुल हो चुके हैं, आप कहीं और भर्ती करवा दीजिए। कहीं कुछ बात नहीं बनी तो 30 तारीख की रात 1 बजे मैं अपने छोटे भाई के साथ पत्नी को लेकर गुरु तेग बहादुर अस्पताल (जीटीबी) पहुंचा।
अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर बोले सैम्पल दीजिए यहां फिर से कोरोना की जांच होगी। सैम्पल के लिए हम दूसरे वॉर्ड में गए। वहां जाकर पता चला अभी तो तीन दिन के सैम्पल पेंडिंग हैं। सैम्पल लेने वाले ने कहा अभी सैम्पल लेकर रखने की भी जगह नहीं बची है। मैंने कहा कि आप ये लिखकर दे दो ताकि मैं डॉक्टर को दिखा दूं और वे मेरी पत्नी को एडमिट कर लें। उनका लिखा कागज लेकर हम दोबारा वार्ड में पहुंचे तो डॉक्टर ने कहा कि आप पेशेंट को एलएनजेपी अस्पताल ले जाइए, क्योंकि यहां तो जगह नहीं है।
ये करीब रात 3 बजे के की बात है। थक हारकर हम पत्नी को लेकर वापस घर आ गए। रात साढ़े तीन से सुबह 7 बजे तक मैं अलग-अलग प्राइवेट अस्पतालों में फोन लगाता रहा। लगा कि कोशिश करूं तो कहीं जगह मिल जाए। लेकिन हर जगह यही जवाब मिला कि बेड खाली नहीं है। किसी किसी अस्पताल ने तो ये भी कहा कि अभी हमें कोरोना के इलाज करने का अप्रूवल सरकार से नहीं मिला। एक अस्पताल से पूछा तो बोले कि आपने पहले हमारे यहां इलाज नहीं करवाया है, इसलिए अब यहां भर्ती नहीं कर पाएंगे।
मैक्स अस्पताल से पता चला कि एक बेड खाली हुआ है। कहा कि आप आ जाइए। तारीख थी 31 मई, सुबह साढ़े नौ बजे थे। पत्नी को लेकर मैं वहां पहुंचा। उन्होंने सारी जानकारी ली। मैंने बताया कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। हीमोग्लोबिन भी कम है। आठ महीने का गर्भ है। यह सब सुनने के बाद एक सीनियर डॉक्टर आए और बोले, सॉरी हम आपके पेशेंट को नहीं ले सकते, क्योंकि बेड नहीं है। जब मैंने बोला कि मुझे फोन पर बताया था कि बेड है, इसलिए ही मैं आया। तो उन्होंने मानने से इनकार कर दिया।
यहां से हम मोनिका को एलएनजीपी अस्पताल ले आए। दो घंटे औपचारिकताएं चलती रहीं। फिर कुछ देर बाद उसे कॉमन रूम में शिफ्ट कर दिया। हैरानी की बात ये थी कि अगले चौबीस घंटे पत्नी का कोई ट्रीटमेंट ही नहीं हुआ। हां, रात में एक बार कोई आया उसने बच्चे के दिल की धड़कन देखी और चला गया।
मैंने डॉक्टर से कहा भी कि पत्नी को कोई देखने नहीं आया। उसका इलाज नहीं हो रहा। तो बोले कि हम प्रोसीजर के हिसाब से काम कर रहे हैं। आप हमें मत बताइए। उसे दो बार एक से दूसरे वार्ड में शिफ्ट किया, इस दौरान वह अपना सामान खुद यहां से वहां ले जा रही थी। कॉमन वार्ड में पंखा नहीं था और काफी गंदगी थी। इसी बीच मैंने एक दूसरे प्राइवेट हॉस्पिटल में दस हजार रुपए एडवांस जमा कर दिए और उन्हें कहा कि एक भी बेड खाली हो तो प्लीज मुझे बताइएगा।
एक जून की रात को उसकी तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई। फिर उसे आईसीयू में शिफ्ट कर दिया। वहां एसी लगा था तो उसे थोड़ी राहत मिली। अगले दिन उसकी तबियत थोड़ी ठीक हुई। रात को उसका फोन आया की बहुत तेज प्यास लगी है और कोई पानी नहीं दे रहा। वह कह रही थी कि उससे बेड से उठा नहीं जा रहा। तब मैं घर पर था। अस्पताल को फोन किया तो किसी ने बात नहीं सुनी। रात को दस बजे मैं पत्नी को पानी देने अस्पताल पहुंचा।
अस्पताल जाकर इन्चार्ज को बताया भी कि मैं शहादरा से वहां सिर्फ पत्नी को पानी पिलाने आया हूं। उन्होंने मुझे तो अंदर नहीं जाने दिया, लेकिन पत्नी के पलंग तक पानी पहुंचा दिया। तब तक उसे प्यास से तड़पते तीन घंटे हो चुके थे। 3 तारीख का दिन यूं ही निकल गया। उसके अगले दिन यानी 4 जून को शाम को डॉक्टर ने उसे एक इंजेक्शन लगाया। मैंने उससे वीडियो कॉल पर बात की तो वो ठीक लग रही थी।
12 बजे मैं घर लौट आया। रात को 3 बजे मेरे पास फोन आया कि आपकी पत्नी की हालत बहुत बिगड़ गई है, उसे वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर रहे हैं। 4 बजे तक मैं अस्पताल पहुंच गया। अस्पताल वाले बोले कि कितनी देर की जिंदगी है कह नहीं सकते। सुबह आठ बजे बताया कि हम आपकी वाइफ को बचा नहीं सके। मैंने पूछा मेरा बच्चा? तो बोले मां और बच्चे दोनों की मौत हो गई। दोपहर 12 बजे मेरी पत्नी की बॉडी एम्बुलेंस में रखकर अस्पताल वाले श्मशान घाट ले गए।
राजीव और मोनिका की ढाई साल पहले ही शादी हुई थी। ये उनका पहला बच्चा था। बच्चे को लेकर कई सपने देखे थे, लेकिन अस्पताल की इस लापरवाही ने उनका सबकुछ खत्म कर दिया। फिलहाल राजीव और उनका परिवार क्वारैंटाइन है। उनके सैम्पल जांच के लिए गए हैं। अब तक रिपोर्ट नहीं आई है।


डॉ त्रेहान के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग मामले में केस दर्ज

11-Jun-2020

दिल्ली (शोर सन्देश)। गुरुग्राम स्थित मेदांता मेडिसिटी अस्पताल के प्रबंध निर्देशक और मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. नरेश त्रेहान की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। प्रवर्तन निदेशालय ईडी ने डॉ. नरेश त्रेहान के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग मामले में केस दर्ज किया है। ईडी ने डॉ. त्रेहान और 15 अन्य लोगों के खिलाफ मेदांता अस्पताल के लिए जमीन आवंटन के संबंध में पीएमएलए के तहत प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट दर्ज की है। 


देश में पिछले 24 घंटे में 9985 कोरोना के नए मामले

10-Jun-2020

दिल्ली (शोर सन्देश)। देश में कोरोना मरीजों का आंकड़ा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। पिछले 24 घंटे के अंदर 9985 नए मामले सामने आए हैं और 274 लोगों की मौत हो गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से बुधवार को अपडेट के मुताबिक, कुल मरीजों का आंकड़ा 2 लाख 76 हजार को पार कर गया है और 7745 लोगों की मौत हो चुकी है।
खास बात है कि एक्टिव मरीजों की संख्या से ठीक होने वाले मरीजों की संख्या अधिक हो गई है. कोरोना से अब तक 1 लाख 35 से अधिक लोग ठीक हो चुके हैं, जबकि देश में एक्टिव केस की संख्या 1 लाख 33 हजार 632 है. कोरोना से सबसे अधिक महाराष्ट्र और दिल्ली प्रभावित हैं। इन दोनों प्रदेशों में कुल मरीजों की संख्या 1 लाख 20 हजार से अधिक है।
दिल्ली में कोरोना के मामले अब 31 हजार के पार हो गए. इस वायरस ने राजधानी में कुल 905 लोगों की जान ले ली. 24 घंटे में ही दिल्ली में साढ़े 13 सौ से ज्यादा नए केस आ गए, जबकि एक दिन में 7 लोगों की कोरोना ने ले ली जान। वहीं मुंबई में कोरोना के मामले 51 हजार से ज्यादा हो गए. यहां अब तक 17 सौ से ज्यादा की मौत हो चुकी है।  



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