नई दिल्ली। (शोर संदेश) पिछले एक दशक में भारत ने रक्षा क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन दर्ज किया है। यह बदलाव केवल सैन्य आधुनिकीकरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्वदेशी अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, रक्षा उत्पादन और वैश्विक रणनीतिक साझेदारियों के विस्तार के माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक सुदृढ़ीकरण के रूप में सामने आया है। भारत ने अपनी रक्षा क्षमताओं को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाते हुए एक विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार और उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी पहचान मजबूत की है।
27 मार्च 2019 को भारत ने मिशन शक्ति के तहत अंतरिक्ष में एक उपग्रह को सफलतापूर्वक नष्ट कर अपनी एंटी-सैटेलाइट क्षमता का प्रदर्शन किया। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया, जिनके पास ऐसी रणनीतिक क्षमता उपलब्ध है। इसके बाद 11 मार्च 2024 को मिशन दिव्यास्त्र के अंतर्गत लंबी दूरी की ऐसी मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया, जो मल्टीपल वॉरहेड प्रणाली से लैस है और एक साथ कई लक्ष्यों पर प्रहार करने में सक्षम है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आकाश एयर डिफेंस मिसाइल प्रणाली, ब्रह्मोस मिसाइल, एंटी-ड्रोन सिस्टम और एयरबोर्न सर्विलांस प्लेटफॉर्म जैसी स्वदेशी रक्षा प्रणालियों ने भारतीय सशस्त्र बलों की परिचालन क्षमता को महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान किया। 23 अगस्त 2025 को डीआरडीओ ने एक उन्नत वायु रक्षा प्रणाली का सफल परीक्षण किया, जिसमें मिसाइल इंटरसेप्टर, कम दूरी की वायु रक्षा हथियार प्रणाली और लेजर आधारित तकनीकों का एकीकृत उपयोग शामिल था।
स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान को फरवरी 2019 में अंतिम परिचालन मंजूरी प्राप्त हुई और भारतीय वायु सेना द्वारा 83 विमानों की खरीद को स्वीकृति दी गई। फरवरी 2021 में अर्जुन एमके-1ए मुख्य युद्धक टैंक भारतीय सेना में शामिल किया गया, जिससे स्वदेशी बख्तरबंद क्षमता को नई मजबूती मिली। वर्ष 2022 में रक्षा क्षेत्र के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित 75 तकनीकों का विकास किया गया। इनमें निगरानी, साइबर सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स, स्वायत्त प्रणालियां और युद्धक्षेत्र सहायता जैसी क्षमताएं शामिल हैं।
भारत ने अगली पीढ़ी की लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों के लिए उन्नत प्रणोदन तकनीकों के विकास में भी महत्वपूर्ण प्रगति की है। 9 जनवरी 2026 को डीआरडीओ ने स्क्रैमजेट कनेक्ट पाइप टेस्ट सुविधा में 12 मिनट से अधिक समय तक सक्रिय रूप से शीतित स्क्रैमजेट फुल-स्केल कंबस्टर का सफल दीर्घकालिक ग्राउंड परीक्षण किया। इसे हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक के विकास की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। भविष्य की उच्च गति वाली मिसाइल तकनीकों के विकास को समर्थन देने के लिए हैदराबाद में अत्याधुनिक हाइपरसोनिक विंड टनल सुविधा भी स्थापित की गई है।
भारत के रक्षा क्षेत्र में हुआ यह परिवर्तन अनुसंधान, नवाचार और रणनीतिक क्षमताओं के सतत विकास के प्रति उसकी मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है। युद्धक्षेत्र के लिए तैयार प्रणालियों से लेकर भविष्य की उन्नत प्रौद्योगिकियों और सहयोगात्मक नवाचार नेटवर्क तक, देश ने दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया है। इन उपलब्धियों ने भारत की उस क्षमता को और सशक्त बनाया है, जिसके माध्यम से वह बदलती वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का आत्मविश्वास के साथ सामना कर सकता है और अपनी घरेलू तकनीकी तथा औद्योगिक शक्ति के आधार पर आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था को साकार कर सकता है।
पिछले दशक में भारत की रक्षा कूटनीति राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक प्रभाव और वैश्विक सहभागिता का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरी है। रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए भारत ने प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ रक्षा साझेदारियों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। आज रक्षा सहयोग केवल सैन्य आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी, रक्षा उद्योग सहयोग, सह-विकास और संयुक्त निर्माण जैसे महत्वपूर्ण आयाम भी शामिल हो चुके हैं।
क्वाड, शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) और आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस (एडीएमएम-प्लस) जैसे मंचों के माध्यम से भारत समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। ये प्रयास भारत के बढ़ते रणनीतिक आत्मविश्वास, वैश्विक जिम्मेदारियों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता और एक विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार के रूप में उसकी मजबूत होती पहचान को प्रतिबिंबित करते हैं।
पिछले एक दशक में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुआ है। 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (एलईएमओए), 2018 में कम्युनिकेशंस कम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट (सीओएमसीएएसए) और 2020 में बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बीईसीए) जैसे समझौतों ने दोनों देशों के रक्षा संबंधों को संस्थागत मजबूती प्रदान की। अमेरिका द्वारा भारत को ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ का दर्जा और एसटीए-1 की मान्यता दिए जाने से उच्च तकनीक एवं रक्षा उपकरणों तक भारत की पहुंच और सुदृढ़ हुई।
वर्ष 2023 में आईसीईटी पहल और 2025 में ट्रस्ट पहल के माध्यम से दोनों देशों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर निर्माण, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और अन्य उभरती रणनीतिक तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग को नई दिशा दी। अक्टूबर 2025 में भारत और अमेरिका ने कुआलालंपुर में दस वर्षीय रक्षा साझेदारी फ्रेमवर्क पर हस्ताक्षर किए, जिससे संयुक्त सैन्य अभ्यासों, रक्षा औद्योगिक सहयोग और हिंद-प्रशांत सुरक्षा सहयोग को नई गति मिली।
वैश्विक भू-राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग मजबूत बना हुआ है। दिसंबर 2024 और दिसंबर 2025 में आयोजित अंतर-सरकारी आयोग की बैठकों में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को और गहरा करने की प्रतिबद्धता दोहराई। दोनों देशों के बीच सहयोग अब पारंपरिक खरीद-बिक्री से आगे बढ़कर संयुक्त अनुसंधान, सह-विकास, सह-उत्पादन और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर केंद्रित हो रहा है, जो आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती प्रदान कर रहा है।
27 जनवरी 2026 को आयोजित भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के दौरान सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर किए गए। यह समझौता समुद्री सुरक्षा, साइबर रक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और अंतरिक्ष क्षेत्र सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग का व्यापक ढांचा प्रदान करता है।
भारत और फ्रांस के बीच रक्षा संबंध भारत की सबसे मजबूत रणनीतिक-औद्योगिक साझेदारियों में शामिल हैं। राफेल लड़ाकू विमान सौदे और प्रोजेक्ट-75 के तहत स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के निर्माण ने इस सहयोग को नई मजबूती दी है। जनवरी 2025 में छठी और अंतिम कलवरी-श्रेणी पनडुब्बी भारतीय नौसेना में शामिल की गई। वहीं 26 राफेल-मरीन लड़ाकू विमानों की खरीद को मंजूरी मिलने से दोनों देशों के रक्षा संबंध और मजबूत हुए हैं।
भारत और जापान के बीच विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। 2020 में हुए एसीएसए समझौते ने दोनों देशों की सेनाओं के बीच लॉजिस्टिक सहयोग को नया आयाम दिया। जिमेक्स नौसैनिक अभ्यास दोनों देशों की समुद्री साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।
भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच रक्षा संबंध अब व्यापक रणनीतिक साझेदारी में परिवर्तित हो चुके हैं। जनवरी 2026 में दोनों देशों ने रक्षा उद्योग सहयोग, विशेष अभियानों और आतंकवाद-रोधी प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए लेटर ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर किए।
व्यापक रणनीतिक साझेदारी के बाद भारत और ऑस्ट्रेलिया के रक्षा संबंधों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। अक्टूबर 2025 में कैनबरा में आयोजित पहली रक्षा मंत्रिस्तरीय वार्ता ने समुद्री सुरक्षा, संयुक्त अभ्यासों और रक्षा उद्योग सहयोग को और मजबूत करने का मार्ग प्रशस्त किया।
एससीओ में शामिल होने के बाद भारत ने आतंकवाद-रोधी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए इस मंच का प्रभावी उपयोग किया है। जून 2025 में किंगदाओ में आयोजित बैठक में भारत ने आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति को दोहराते हुए सामूहिक कार्रवाई का आह्वान किया।
नवंबर 2025 में कुआलालंपुर में आयोजित एडीएमएम-प्लस बैठक में भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। एक्ट ईस्ट नीति के तहत वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया के साथ रक्षा सहयोग भी उल्लेखनीय रूप से मजबूत हुआ है।
वर्ष 2017 में पुनर्जीवित और 2021 में नेताओं के शिखर सम्मेलन स्तर तक उन्नत किए गए क्वाड में भारत एक प्रमुख स्तंभ के रूप में उभरा है। 2025 में आयोजित क्वाड-एट-सी मिशन और मालाबार अभ्यास ने समुद्री सुरक्षा सहयोग को नई दिशा दी।
सागर दृष्टि और महासागर सिद्धांत के आधार पर भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक विश्वसनीय सुरक्षा प्रदाता के रूप में उभरा है। निरंतर नौसैनिक उपस्थिति, समुद्री अभ्यासों और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों ने इस भूमिका को और सुदृढ़ किया है।
पिछले 12 वर्षों में भारत की रक्षा यात्रा केवल सैन्य आधुनिकीकरण की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे राष्ट्र के उदय का प्रतीक है जो अपनी स्वदेशी क्षमताओं के बल पर अपने रणनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है। युद्धपोतों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन, मिसाइल प्रणालियों और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र, स्टार्टअप्स तथा एमएसएमई की बढ़ती भागीदारी तक, देश ने एक व्यापक और नवाचार-आधारित रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया है।
भारत आज हिंद-प्रशांत और उससे आगे एक आत्मविश्वासी और विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार के रूप में उभर रहा है। उसकी रक्षा कूटनीति अब तकनीकी सहयोग, समुद्री सुरक्षा, औद्योगिक साझेदारी और रणनीतिक पहुंच के समन्वित मॉडल पर आधारित है। 2047 की ओर बढ़ते हुए भारत की रक्षा तैयारियां नवाचार, मजबूती और आत्मनिर्भरता से प्रेरित रहेंगी। पिछले दशक में तैयार यह मजबूत आधार भारत को केवल वैश्विक सुरक्षा परिवर्तनों पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि उन्हें आकार देने में सक्षम एक सक्रिय शक्ति के रूप में स्थापित करता है।