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उम्मीदों को मिले नए पहिए: अबूझमाड़ के युवाओं ने साइकिल रिपेयरिंग सीखकर शुरू की आत्मनिर्भरता की नई राह

13-Jun-2026
रायपुर (शोर संदेश)अबूझमाड़-एक ऐसा क्षेत्र जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अपनी दुर्गमता के लिए भी जाना जाता है। लेकिन आज इस सुदूर अंचल की पहचान बदल रही है। यहाँ के युवा अब सिर्फ मुश्किलों से जूझ नहीं रहे, बल्कि अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भरता की एक नई इबारत लिख रहे हैं।      
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल (ITBP) की एक अनोखी और संवेदनशील पहल ने यहाँ के पाँच आदिवासी युवाओं की जिंदगी में उम्मीदों के नए पहिए लगा दिए हैं।
​अबूझमाड़ के दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों कस्तूरमेटा, कुतुल, बेड़माकोटि, पदमकोट और नेलांगुर में तैनात 41वीं वाहिनी ITBP ने स्थानीय युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए एक सराहनीय कदम उठाया।डीआईजी, सेक्टर मुख्यालय (भुवनेश्वर) के मार्गदर्शन और 41वीं वाहिनी के कमांडेंट बेनुधर नायक के निर्देशन में 14 दिवसीय आवासीय साइकिल रिपेयरिंग प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
​इस पूरी पहल की सबसे खास बात यह रही कि यह प्रशिक्षण पूरी तरह निःशुल्क था। पाँचों युवाओं के रहने, खाने-पीने से लेकर परिवहन तक की सारी व्यवस्था आईटीबीपी द्वारा की गई, ताकि युवाओं को सीखने में कोई परेशानी न हो।
​14 दिनों के इस सघन प्रशिक्षण में साइकिल प्रशिक्षक योगेश ने युवाओं को साइकिल की मरम्मत, रखरखाव और सर्विसिंग से जुड़ी बारीकियां सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से सिखाईं। लेकिन ITBP का मकसद सिर्फ साइकिल सुधारना सिखाने तक सीमित नहीं था।
​प्रशिक्षण के दौरान इन युवाओं का नजरिया व्यापक बनाने के लिए उन्हें जिले के विभिन्न आजीविका केंद्रों का भ्रमण कराया गया, जिसमें ​उद्यानिकी फार्म,नारियल-आम के बागान मत्स्य पालन केंद्र तथा ​पारंपरिक कुम्हार शिल्प केंद्र शामिल थे।
इस एक्सपोजर विजिट का उद्देश्य युवाओं को यह समझाना था कि वे अपने क्षेत्र में रहकर और कौन-कौन सी वैकल्पिक आजीविका गतिविधियों से जुड़ सकते हैं।
प्रशिक्षित युवाओं का कहना है कि अब हमें काम की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा, हमारे हाथ में हुनर भी है और काम शुरू करने का साधन भी। ​प्रशिक्षण के समापन पर युवाओं को सिर्फ सर्टिफिकेट नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की पूरी चाबी सौंपी गई। ITBP द्वारा सभी सफल प्रतिभागियों को कपड़ों का किट और साइकिल रिपेयरिंग टूल किट प्रदान किया गया। इस टूल किट की मदद से ये युवा अब अपने गांव लौटकर तुरंत अपना स्वरोजगार शुरू करने में सक्षम हो चुके हैं।
​समापन समारोह में जब ये युवा अपनी टूल किट थामे खड़े थे, तो उनके चेहरों पर भविष्य को लेकर एक नई चमक और गहरा आत्मविश्वास था। उन्होंने ITBP के प्रति आभार जताते हुए कहा कि इस प्रशिक्षण ने उनके भीतर यह भरोसा जगाया है कि वे भी अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं।
41वीं वाहिनी ITBP की यह मानवीय और विकासात्मक पहल यह साबित करती है कि सुरक्षा बल केवल सीमाओं और अंदरूनी क्षेत्रों की रक्षा ही नहीं कर रहे, बल्कि अबूझमाड़ के दुर्गम अंचलों में सामाजिक- आर्थिक विकास और कौशल उन्नयन की नई रोशनी भी फैला रहे हैं। ये युवा अब अपने क्षेत्र के दूसरे युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनेंगे।


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