नारायण सेन रायपुर (शोर संदेश) भक्त शिरोमणि नाई जाति के मुकुट श्री श्री सेन जी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1357 की वैशाख मास की कृष्ण पक्ष की 12वीं तिथि दिन रविवार को ब्रह्म योग, तुला लग्न, पूर्वा,आद्रप्रदा नक्षत्र में बांधवगढ़ में हुआ था | श्री सेन जी महाराज बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे, वह सत्संग प्रिय थे एवं साधु महात्माओं की सेवा करना उनका परम धर्म था इनका नाम माता-पिता द्वारा नंदा रखा गया प्यार से लोग इन्हें नंदा महाराज कहने लगे इनके पिता श्री चंद जी नाई थे एवं माताजी का नाम जीवनी थी इनकी पत्नी का नाम गजराबाई थी, इनके पिता श्री चंद आज से 700 वर्ष पहले रीवा रियासत की बुंदेलखंड में महाराज वीर सिंह के राजभवन में होने के कारण बचपन से ही महाराज सेन जी का अपने पिता के साथ राज परिवार के पारिवारिक एवं राजनैतिक व मांगलिक कार्यों से जुड़े रहने का सौभाग्य मिला, इनका जीवन सीधा-साधा व उच्च था, वे प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान ध्यान कर भगवान की पूजा व साधु संतों की सेवा व भजन कीर्तन में लग जाते थे कहा जाता है कि नंदा का मुख्य कार्य महाराज की मालिश करना, बाल एवं दाढ़ी करना था एक दिन जब वे संतों की सेवा एवं भजन मंडली में लीन होकर महाराज के पास जाना भूल गए तो भगवान स्वयं सेन महाराज का रूप लेकर वीरसिंह महाराज के भक्त के रूप में उपस्थित होकर महाराज की इतनी सेवा की, कि महाराज आनंद विभोर हो गए और इधर जब सेन महाराज को होश आया तो वह डरते हुए महाराज के पास उस दिन उपस्थित हुए तो पता चला कि कोई पहले ही महाराज की सेवा कर जा चुका हैं, सेन जी महाराज एवं राजा को बोध हुआ कि भगवान स्वयं आकर उन्हें दर्शन दिए तो महाराज वीर सिंह ने सेन जी महाराज के चरण पकड़ लिए और उनकी भक्ति के लिए राजा अपनी भूल का एहसास कर उनसे क्षमा याचना की एवं उन्होंने सेन जी महाराज को भगवान का सच्चा भक्त कहा| सेन जी महाराज परम विष्णु भक्त थे | महाराज वीर सिंह ने श्री सेन जी को गुरु पद से सम्मानित किया | गृहस्थ एवं सन्यास के समायोजक भक्त शिरोमणि श्री सेन जी का जीवन समाज के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है| गृहस्थ में रहकर उन्होंने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का जो अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है वह अन्यंत्र मिलना दुर्लभ है | उनके जीवन से हम सीख सकते हैं कि मानव के दैनिक कर्म और जाति कर्म, मोक्ष और ज्ञान प्राप्ति में कभी बाधक नहीं बनते हैं | श्री सेन जी ने गृहस्थ आश्रम की सन्यास आश्रम पर श्रेष्ठता प्रमाणित की और वैष्णव धर्म की मूल सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार कर व्यवहारिक रूप प्रदान किया उनके समकालीन संतो ने जहां दोहों, वा णीयों से धर्म परिवर्तन का चक्र चलाया जिनमें रैदास, नामदेव, पीपा, कबीर इत्यादि प्रमुख हैं किंतु सेन जी का जीवन उन वाणीयों की जीवंत प्रतिमूर्ति है | भक्त शिरोमणि श्री सेन जी की जीवन लीला युगो तक समाज में प्रासंगिक बनी रहेगी और हिंदूवादी विचारधारा में उनका योगदान अमूल्य एवं चि रंतर रहेगा| महाराज सेन जी ने निम्न उपदेश दिए थे : सद्गुणी बनो एवं अपना काम आप करो | विचारवान एवं परिश्रमी बनो | किसी से ईर्ष्या मत करो तथा दूसरों की सेवा को अपना धर्म समझो | प्राणी मात्र पर दया व स्नेह करो | मनुष्य भाग्य से नहीं, जाति से नहीं, धर्म से नहीं, बल्कि कर्म से महान होता है | साधु संतों एवं महापुरुषों की सेवा करना अपना धर्म समझो | सदा सत्य बोलो एवं किसी जीव पर अत्याचार ना करो | भयग्रस्त जीवन ना जिए एवं सुबह शाम भगवान की पूजा करो | धर्म-कर्म दया, दान, साधु, सत्कार एवं संयम की प्रतिमूर्ति ईश्वर के इस अनूठे भक्त को आज 8 मार्च को उनकी 721वी जयंती पर शोर संदेश परिवार की ओर से कोटि कोटि नमन, वंदन एवं साष्टांग प्रणाम |